माजवादी कुनबे में सत्ता की लड़ाई के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसे सत्ता हस्तांतरण के रूप में देखा जा रहा था। हाल ही में जिस तरह से जिला पंचायत अध्यक्ष और सांसद तेजप्रताप के मामा विजय प्रताप के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, उसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि सत्ता की लड़ाई कहीं से थमी है, अब बड़े लोगों से निकलकर यह छोटे स्तर तक जा पहुंची है।

क्या सपा नेता मुलायम सिंह का तिनकातिनका जोड़कर एक किया गया कुनबा अब दरकने लगा है? यह सवाल यूं तो उनके पुत्र तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा उनके चचेरे भाई प्रो. रामगोपाल के साथ मिलकर अलग राह बनाने के समय से ही चर्चा में गया था, किन्तु समझा जा रहा था कि बड़ों के बीच आई यह दरार परिवार के निचले पायदान की सत्ता का लाभ उठाने वाले परिवार के सदस्यों की राह की बाधा नहीं बनेगी, किन्तु ताजा घटनाक्रम बता रहा हैं कि परिवार के विभाजन की यह दरार अब निचले पायदान तक पहुंच गयी है।

एक जुझारू नेता के रूप में अपनी लम्बी राजनीतिक पारी खेलने वाले मुलायम सिंह ज्योंज्यों सत्ता की देहरी की ऊंचाइयां चढ़ते गये, अपने परिवार कार्यकतार्ओं को हर संभव लाभ दिलाते रहे। यही मुलायम की सफलता का राज भी रहा। करीब चार दशक के राजनीतिक जीवन में मुलायम ने अपने परिवारीजनों को ही नहीं, अपने सभी वफादारों को उनकी वफादारी का इनाम उनका राजनीतिक कद बढ़ाकर दिया। सभी जानते हैं कि राजनीतिक रूप सेसैफई परिवारके नाम से विख्यात मुलायम सिंह परिवार में इस समय करीब दो दर्जन ऐसे लोग हैं, जो सांसद, विधायक, एमएलसी, जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे लालबत्तीधारी पद संभाले हैं। इनमें मुलायम सिंह से रक्त संबंध रखने वाले पहली पीढ़ी से लेकर तीसरी पीढ़ी तक के लोग हैं ही, वे भी हैं जिनका थोड़ा बहुत इस सैफई परिवार से रिश्ता रहा है।

अपने परिवार के साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह को जब उनके तत्कालीन मुख्यमंत्री पुत्र द्वारा ही जबरन पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका में रख पार्टी पर अपना अधिकार कर लिया, तो यह उनके लिए बड़े झटके के रूप में था। इस दौरान प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे से लेकर कांग्रेस से गठबंधन जैसे मसलों पर मुलायम उनके भाई शिवपाल का अनेक बार अपमान भी हुआ, किन्तु शिवपाल की कसमसाहट के बावजूद पुत्रमोह के चलते मुलायम सिंह खामोश रहे। चुनावों में पार्टी को हुई पराजय के बाद वह मैनपुरी में मुखर भी हुए, किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस बीच पार्टी परिवार में घटे दृश्य अदृश्य घटनाक्रम ने सिर्फ पितापुत्र के बीच की दूरियां बढ़ाईं, बल्कि दोनों के अनुयायियों के बीच की खार्इं भी गहरी कर दी। फिर भी समझा जा रहा था कि सैफई परिवार की यह आंतरिक कलह कम से कम जमीनी स्तर पर तो मुखर नहीं होगी। बीते दिनों प्रदेश के फिरोजाबाद मैनपुरी जिलों के घटनाक्रमों ने इस मिथक को भी तोड़ दिया। दोनों जिलों में हुए ताजा घटनाक्रम के संकेतों को देखें तो स्पष्ट दिख रहा है कि मुलायम परिवार की यह लड़ाई महज सियासी रहकर पारिवारिक बिखराव की लड़ाई बनती जा रही है।

सैफई परिवारया कहें मुलायम कुनबे के इस ताजा टकराव की शुरूआत फिरोजाबाद जिले से उस समय हुई जब यहां की जिला पंचायत के अध्यक्ष तथा सांसद तेजप्रताप यादव के रिश्ते के मामा विजय प्रताप यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। इस प्रस्ताव पर सांसद धर्मेन्द्र यादव के बहनोई तथा मैनपुरी की जिला पंचायत अध्यक्ष संध्या यादव के पति अनुजेश के भी हस्ताक्षर थे। स्वाभाविक था कि पार्टी अनुजेश को इस हरकत की सजा उन्हें पार्टी से निकालकर देती, ऐसा हुआ भी, किन्तु मामला यहीं नहीं रुका। इसके जवाब में 07 जुलाई को मैनपुरी के समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष खुमानसिंह वर्मा के खास तथा मैनपुरी के विधायक राजकुमार यादव के नेतृत्व में वहां के 32 में से 23 सदस्यों ने जिला पंचायत अध्यक्ष संध्या यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जिलाधिकारी यशवंत राव को सौंपा। इस प्रस्ताव के कई हस्ताक्षरकर्ता जहां सांसद धर्मेन्द्र यादव के खास माने जाते रहे हैं, वहीं इस पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रो. रामगोपाल के भांजे बिल्लू यादव की पत्नी मीनाक्षी भी शामिल हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि मैनपुरी के जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर शिवपाल अपने करीबी राहुल यादव को लाना चाहते थे। किन्तु धर्मेन्द्र यादव की सफल पैरवी के चलते यहां उनकी जुड़वां बहिन संध्या यादव को मौका मिला और वे निर्विरोध अध्यक्ष चुनी गईं, किन्तु अन्दर ही अन्दर स्पष्ट दो गुट साफ दिखने लगे थे। यही कारण रहा कि फिरोजाबाद की घटना ने दूसरे गुट को मौका दिया और जवाब में मैनपुरी में भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। फिलहाल फिरोजाबाद मैनपुरी जिलों के जिलाधिकारी इन अविश्वास प्रस्तावों की जांच करा रहे हैं। इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि इन प्रस्तावों का क्या हश्र होगा। इस सियासी गतिविधि ने मुलायम सिंह केसैफई परिवारकी रार को सड़को तक अवश्य ला दिया।

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