प्रधानमंत्री की सक्रियता के आगे कई बार राष्ट्रपति तक के अधिकार और दायित्व आमजन की समझ में नहीं आते। ऐसे में उपराष्ट्रपति पद की गरिमा और कार्य निर्वहन को जानना बहुत रोचक हो जाता है।

राष्ट्रपति के ठीक बाद अथवा यूं कहें कि करीबकरीब एक साथ ही देश में उपराष्ट्रपति पद की निर्वाचन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्राय: देखने में आता है कि राष्ट्रपति के मुकाबले उपराष्ट्रपति की सक्रियता काफी कम होती है। सच तो यह है कि राज्यसभा के सभापति के तौर पर उपराष्ट्रपति दिखाई दें, तो देश में उनकी मौजूदगी का भी अहसास हो। फिर भी राष्ट्रपति के साथ उपराष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति उन्हें भी काफी खास बना देती है। इसे समझने के लिए पहले इन पदों की निर्वाचन प्रक्रिया पर ध्यान देना होगा। कहा जाता है कि इन पदों के लिए पूरा देश अप्रत्यक्ष ढंग से मतदान प्रक्रिया में शामिल होता है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनने के लिए उनके मतदाताओं पर नजर डाली जाय तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। ये दोनों एक निर्वाचकमंडल के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा चुने जाते हैं। फर्क यह है कि राष्ट्रपति को चुनने के लिए संसद के दोनों सदनों और देश की विधानसभाओं के सदस्य मतदान करते हैं। इसके विपरीत उपराष्ट्रपति पद के लिए सिर्फ संसद के दोनों सदनों के सदस्य ही वोट डालते हैं। राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के मनोनीत सदस्य, राज्य विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य शामिल नहीं किये जाते। इसके विपरीत उपराष्ट्रपति पद के लिए संसद के मनोनीत सदस्य भी मतदान प्रक्रिया में शामिल होते हैं। इन चुनावों में पूरे देश की भागीदारी की अवधारणा को ये मतदाता ही मूर्त रूप देते हैं क्योंकि यह देश के विभिन्न हिस्सों से सीधे अथवा अप्रत्यक्ष ढंग से चुनकर आते हैं। इस तरह देशभर के प्रतिनिधित्व से चुना गया उपराष्ट्रपति भी कई मायनों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तरह महत्वपूर्ण पद है। 

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद की गरिमा को हमारा संविधान बखूबी रेखांकित करता है। भारतीय संविधान के भागपांच के अध्यायएक (अनुच्छेद-52 से 78 तक) के अंतर्गत संघीय कार्यपालिका का उल्लेख किया गया है। भारत की संघीय कार्यपालिका राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद से मिलकर बनती है। संविधान के अनुच्छेद-73 के अधीन संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक है, जिनके बारे में संसद कानून बना सकती है और उन समस्त  अधिकारों के प्रयोग तक है जो किसी अंतरराष्ट्रीय संधि अथवा समझौते के आधार पर भारत सरकार को प्राप्त हैं।

अमेरिकी प्रथा का अनुसरण

संघीय कार्यपालिका अथवा कार्यकारिणी में उपराष्ट्रपति दरअसल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच का पद है। संविधान के अधिकृत अग्रताअधिपत्र में राष्ट्रपति के बाद सर्वोच्च स्थान उपराष्ट्रपति को ही दिया गया है। इसके बावजूद अजीब तो यह है कि हमारा संविधान उपराष्ट्रपति को कोई विशेष अधिकार प्रदान नहीं करता। संविधान के अनुच्छेद-63 में भारत की संघीय कार्यपालिका में उपराष्ट्रपति पद की व्यवस्था है।

अनुच्छेद-64 में उनको राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में मान्यता हो तो उपराष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति शून्य के करीब दिखाई देती है। राज्यसभा का सभापतित्व भी अमेरिकी प्रथा का अनुसरण है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति के रूप में राज्यसभा की कार्यवाहियों का सभापतित्व करते हैं। इस रूप में वह लोकसभा अध्यक्ष की ही तरह राज्यसभा के सभी मामलों से संबद्ध कायों का निर्वहन करते हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति का भी मुख्य कार्य उच्च सदन की अध्यक्षता करना है। भारतीय संविधान के अनुसार उपराष्ट्रपति को कार्यपालिका सम्बन्धी औपचारिक कार्य नहीं सौंपे गए हैं, फिर भी व्यवहार में मंत्रिमंडल के समस्त निर्णयों की सूचना राष्ट्रपति के साथ उन्हें भी दी जाती है।

परम्पराएं बनाती हैं महत्वपूर्ण

उपराष्ट्रपति के कार्यों के बारे में संविधान भले ही मौन हो, पर परम्परागत कार्य उन्हें महत्वपूर्ण बना देते हैं। उपराष्ट्रपति अनेक औपचारिक कार्य सम्पन्न करने लगे हैं। वह विभिन्न देशों के राजदूतों तथा विदेशों के विशिष्ट व्यक्तियों आदि से मुलाकात किया करते हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तरह उपराष्ट्रपति भी विदेश यात्राओं के दौरान उच्च अधिकार प्राप्त प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हैं। इस दौरान देशों के बीच द्विपक्षीय समझौतों पर उनके हस्ताक्षर भी होते हैं। अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक समारोहों तथा राजकीय यात्राओं में उपराष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया करते हैं। उपराष्ट्रपति का यह भी दायित्व होता है कि जब कभी उन्हें राष्ट्रपति का त्यागपत्र प्राप्त हो, इसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष तक तुरंत पहुंचाएं।

राज्यसभा के होते हैं सभापति 

आम तौर पर उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करते हैं। राज्यसभा के सभापति का कार्य लोकसभा के अध्यक्ष की ही तरह हुआ करता है। वह सदन में अपना मत रखन के लिए सदस्यों को समय का निर्धारण करते हैं। विधेयकों पर बहस और बहस की समाप्ति पर राज्यसभा के सभापति के तौर पर वह मतदान भी कराते हैं। विधेयक पर मतों की स्थिति समान होने पर वह अपना निर्णायक मत दे सकते हैं। विधेयक राज्यसभा द्वारा पारित होने पर सभापति के तौर पर उपराष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी आवश्यक हैं। राज्यसभा के सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा भी उपराष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में है। इसी तरह सत्र के दौरान सदस्य के किसी आपत्तिजनक कार्य पर वह उसके लिए सजा भी तय कर सकेत हैं। यह सत्र के किसी कालखंड अथवा सम्पूर्ण स्तर के लिए निलंबन भी हो सकता है।

राष्ट्रपति के रूप में दिखती है गरिमा

आम तौर पर देखने में आता है कि देश के राष्ट्रपति भी केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुरूप ही चलते हैं। विभिन्न राष्ट्रीय पर्वों पर देश के नाम राष्ट्रपति का संदेश सुनकर तो साफ लगता है कि वे सरकार की योजनाओं का ही वाचन कर रहे हैं। दरअसल, संघीय कार्यपालिका के प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति का यह प्रचलित रूप है। वैसे तो राष्ट्रपति को संविधान द्वारा विस्तृत कार्यकारी, विधायी, न्यायिक, राजनयिक एवं आपातकालीन शक्तियां हासिल हैं। इन शक्तियों का वह स्वयं या उनके नाम से उनके अधीनस्थ अधिकारी प्रयोग करते हैं। राष्ट्रपति को आत्यंतिक वीटो, निलम्बनकारी वीटो एवं जेबी वीटो की बड़ी शक्ति भी हासिल है। राष्ट्रपति की इन शक्तियों का उल्लेख इसलिए समीचीन है कि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति भी इन सभी अधिकारों का प्रयोग करते हैं।

जब बन जाते हैं राष्ट्रपति

संविधान के अनुच्छेद-65 में उपराष्ट्रपति के राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने का विवरण है।  अनुच्छेद 65(1) में व्यवस्था है कि राष्ट्रपति की मृत्यु, पद छोड़ने अथवा हटाए जाने या किसी भी दूसरे कारण से राष्ट्रपति पद रिक्त हो जाय है तो नया राष्ट्रपति निर्वाचित होने तक उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।

उपराष्ट्रपति जब राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, तब वह राज्यसभा के सभापति के कार्यों का निर्वहन नहीं करते। जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेंगे, उन्हें राष्ट्रपति की सम्पूर्ण शक्तियां और उन्मुक्तियां उपलब्ध होंगी। उन्हें राष्ट्रपति पद के वेतनभत्ते तथा विशेषाधिकार भी प्राप्त होते हैं। हां, उपराष्ट्रपति केवल छह महीने तक ही राष्ट्रपति का पद संभाल सकते हैं।

राष्ट्रपति के देश में मौजूद नहीं रहने, उनके गंभीर रूप से अस्वस्थ होने अथवा किसी अन्य कारण से उनके अपने कार्य निष्पादन में असमर्थ होने पर उपराष्ट्रपति उनके कार्यों का  निर्वहन करते हैं। हालांकि संविधान यह साफ नहीं करता कि राष्ट्रपति को कब अनुपस्थित अथवा उनके अपने कृत्यों के निर्वहन में असमर्थ माना जाय। सच यह है कि 20 जून, 1960 के पहले संविधान के इस उपबंध का कोई उपयोग नहीं किया गया। वैसे तब के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1958 में अपनी विदेश यात्रा के लिए लंबे समय तक देश के बाहर रहे। जून1960 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 15 दिन की सोवियत यात्रा के दौरान पहली बार डॉ. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के तौर पर कार्य करने का अवसर मिला। दूसरा अवसर, मई 1961 में आया था। तब भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ही राष्ट्रपति थे। वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गये थे। कुछ दिनों के पश्चात उन्होंने स्वयं यह सुझाव दिया कि इस बीच उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन उनका कार्यभार संभालें। इस तरह अपने कर्तव्यों के निर्वहन में असमर्थ होने और पुन: सक्षम होने की अवधारणा भी राष्ट्रपति खुद ही तय करते हैं।

जब दोनों हों!

स्थिति ऐसी भी सकती है जब मृत्यु, पदत्याग, हटाए जाने के कारण राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों के पद रिक्त हो जायं। ऐसी स्थिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनकी भी गैरमौजूदगी में उच्चतम न्यायालय के ज्येष्ठतम न्यायाधीश राष्ट्रपति के कृत्यों का  निर्वहन करते हैं। यह व्यवस्था नया राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति के निर्वाचित होने तक के लिए है। सन् 1969 में राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् ऐसी स्थिति आई थी। राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए उपराष्ट्रपति  वी.वी. गिरि ने भी इस्तीफा दे दिया था।   तब मुख्य न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्ला ने 20 जुलाई, 1969 से राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन किया था।

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