युद्ध शब्द के अंदर विनाश की कहानी छिपी होती है। इसलिए इसका जब भी जिक्र होता है, तो इंसान की रूह तक कांप उठती है। युद्ध के तरीके, हथियार और मैदान अलगअलग हो सकते हैं, लेकिन सभी में इंसान और इंसानियत को बचाने और मिटाने की कोशिश होती है। देश के पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार असम भी वर्तमान समय में इंसानी जान बचाने के लिए जल युद्ध लड़ रहा है। इस युद्ध में एक ओर पानी वाली सेना है तो दूसरी ओर इंसान खड़ा है। हालांकि इंसान पर पानी की सेना भारी पड़ रही है, बावजूद इंसान अपनी हार मानने को तैयार नहीं है। इंसान इस लड़ाई को जीतने की जद्दोजहद में कई दशकों से जुटा हुआ है, लेकिन कुछ ऐसे तत्व हैं जो इस जंग को समाप्त नहीं होने देना चाहते। जैसे मुहम्मद गोरी और पृथ्वी राज चौहान की लड़ाई में जो किरदार जयचंद ने निभाया था, कुछ ऐसी गद्दारी समाज के ठेकेदार बन संगठन निभा रहे हैं।

इस लड़ाई से निपटने के लिए सरकारें काफी लंबे समय से कोशिशें कर रही हैं, लेकिन जयचंद सरीखे कुछ संगठन इस लड़ाई को जारी रखने के लिए बीच में खड़े हो जाते हैं। जिसके चलते जल युद्ध कभी खत्म होने वाली लड़ाई बन गया है। असम के जल प्रलय को कम या समाप्त किया जा सकता है, इसके लिए पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश में नदियों पर बांध बनाने की आवश्यकता है। इसकी कोशिशें भी जारी हैं। ऐसे में बांधों के बनने से असम के अस्तित्व पर खतरा होने का डर दिखाकर बांधों को बनने से रोका जा रहा है,जिसके चलते प्रत्येक वर्ष सैकड़ों लोगों की मौत और करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान होता रहा है। केंद्र और राज्य सरकरें उसकी भरपाई में जुटी रहती हैं।

असम में जल प्रलय के बीच इस तरह के कथानकों का वैसे तो कोई मतलब नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। असम पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार होने के साथ ही निकासी वाला द्वार भी है। पूरा पूर्वोत्तर पहाड़ों की गोद में बसा है। इस भूभाग में देश के अन्य हिस्सों की तुलना काफी अधिक बरसात होती है। पड़ोसी देश चीन से भी बहकर आने वाला पानी असम के रास्ते ही समुद्र में समाता है। ऐसे में असम में बाढ़ की त्रास्दी को आसानी से समझा जा सकता है। एक तरह से कहें तो असम नदियों की गोद में बसा हुआ है। प्रत्येक वर्ष नदियां बरसात के समय अपना रौद्र रूप दिखातीं हैं। इसको रोकने या सीमित करने के लिए नदियों पर बड़े पैमाने पर बांध बनाने की आवश्यकता है, जो समस्या का समाधान के साथ ही उन्नति का मार्ग भी खोलेगा। लेकिन जब भी इसकी कोशिशें होती हैं, तो कुछ संगठन असम की तबाही का मुद्दा उठाते हुए इसका विरोध करने लगते हैं। आम राज्यवासियों को आज तक यह बात समझ में नहीं आई या यूं कहें कि कोई भी उनके भले के लिए यह बताने की जहमत नहीं उठा पाया कि क्या सही है और क्या गलत है। सरकारें भी वोट के जरिए सत्ता के सिंघासन पर पहुंचने के लिए इस जल युद्ध को समाप्त करने में दिलचस्पी नहीं दिखातीं। जिसके चलते लड़ाई बदस्तूर जारी है।

असम के 24 जिले बाढ़ की चपेट में हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 44 लोग चालू माह के दौरान पानी में फंस कर अपनी जान गंवा बैठे हैं। जबकि मीडिया रिपोर्ट में यह आंकड़ा 46 तक बताया जा रहा है। वर्तमान राज्य सरकार 48 घंटे में मरने वालों के परिजनों को 4-4 लाख रुपए का मुआवजा देने की बात कहकर पूर्व की सरकारों से राहत राशि बांटने में तेजी दिखाने का दम भर रही है, लेकिन यह सरकार भी समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए कोई ठोस रणनीति बना रही है, ऐसा तो दिखता नहीं। असम की बाढ़ में केवल इंसान ही बदहवास नहीं हुआ है, वन्य जीव पालतू पाशु भी हैं जिनकी जान पर बन आई है। वे अपनी लाचारी, बेबसी का इजहार इंसानों की तरह नहीं कर पाते। अगर वे भी बोल पाते तो सड़कों पर अपनी समस्याओं को लेकर धरनाप्रदर्शन आंदोलन करते दिखते। लेकिन वे ऐसा कर अपनी जान बचाने के लिए ऊंचाई वाले इलाकों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हैं। कहते हैं कि किसी के लिए भी अपना घर छोड़ना सबसे ज्यादा दुखदाई होता है, बावजूद जान बचाने के लिए आवास को छोड़ने के लिए वन्यजीव मजबूर हुए हैं। पलायन के दौरान वन्य जीवों की जान और भी जोखिम भरे हालात में फंस जाती है। क्योंकि अवैध शिकारी घात लगाकर बैठे रहते हैं, जबकि जंगल से निकल कर वन्य जीव जब इंसानी इलाकों में पहुंचते हैं तो एक अलग तरह का युद्ध छिड़ जाता है। इंसान और वन्य जीव दोनों अपनी जान बाचने के लिए एकदूसरे पर हमला कर देते हैं। इस आपाधापी में अगर कोई वन्य जीव सड़कों को पार करने की कोशिश करता है तो वाहनों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठता है। कुल मिलाकर जल युद्ध के छिड़ने से इंसानों के साथ ही वन्य जीवों की जान पर भी बन आई है। असम आपदा प्रबंधन की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार 24 जिलों की लगभग 18 लाख जनता बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित हुई है। जबकि काजीरंगा राष्ट्रीय अभयारण्य में एक सींग वाले दो गैंडों के साथ कुल 25 वन्य जीवों की बाढ़ के पानी में डूबने तथा सड़क पार करते समय वाहनों की चपेट में आने से मौत हो चुकी है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 3,79,257 बड़े पशु, 2,23,585 छोटे पशु तथा पोल्ट्री फामों के 3,65,301 पशु प्रभावित हुए हैं। मिली जानकारी के अनुसार बाढ़ के पानी में कुल 276 बड़े पशु बह गए, जबकि 1,376 पोल्ट्री फार्मों के जानवर बाढ़ के पानी में समा गए।

असम सरकार द्वारा बाढ़ में अपना सबकुछ गंवाने वालों के लिए खोले गए कुल 231 राहत शिविरों में कुल 97,077 लोग आश्रय लिए हुए हैं। प्रभावितों के अनुसार ये नाकाफी हैं। कारण अभी भी दूरदराज के इलाकों में लोग अपनी बचीखुची संपत्ति को बचाने के लिए अपने घरों को छोड़कर बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में उनको भोजन, शुद्ध पेयजल, चिकित्सा सेवा मिलनी मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गई है। कुछ इलाकों में तो अभी भी राहत पहुंचाने वाली एजेंसियों की पहुंच नहीं हो पाई है, कारण उनके बारे में किसी के पास कोई जानकारी नहीं है। बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, जिला प्रशासन, पुलिस के साथ ही अन्य एजेंसियां 16 जिलों में राहत बचाव कार्य चलाते हुए 7,814 लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थानों में पहुंचाया है।


बाढ़
पर सियासत

असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) के प्रदेश अध्यक्ष रिपुन बोरा ने राज्य की भाजपा गठबंधन सरकार पर प्रयलयंकारी बाढ़ से निपटने के लिए पूर्व में कोई तैयारी नहीं करने का आरोप लगाते हुए पूरी तरह से व्यर्थ करार दिया है। उन्होंने कहा है कि बाढ़ में फंसे लोगों को निकालने, राहत राशि वितरित करने के मामले में सोनोवाल सरकार पूरी तरह से विफल रही है। साथ ही प्रभावित इलाकों में शुद्ध पेयजल, बच्चों का आहार दवाइयों की पर्याप्त कमी बताया है। उन्होंने राज्य सरकार की ओर से तत्काल जारी 62 करोड़ रुपए को नाकाफी बताया है। इस संबंध में एपीसीसी ने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन प्रेषित किया है। कांग्रेस ने केंद्र पर असम के साथ भेदभाव बरतने का भी आरोप लगाया है। रिपुन बोरा ने कहा है कि बिहार और कश्मीर की बाढ़ को देखने लिए प्रधानमंत्री तुरंत चले जाते हैं, जबकि राहत पैकेज का भी ऐलान करते हैं, वहीं असम के मामले में ऐसा नहीं दिखता है। कांग्रेस ने 12 जुलाई को लखीमपुर और माजुली में दो ट्रक राहत सामग्री भेजकर सियासी चाल चली। कांग्रेस के राहत सामग्री वाली राजनीति के पीछे असल में मुख्यमंत्री सवार्नंद सोनोवाल को घेरना था। क्योंकि माजुली से मुख्यमंत्री चुन कर आए हैं, जबकि लखीमपुर संसदीय क्षेत्र का ही माजुली विधानसभा हिस्सा है। ऐसे में कांग्रेस ने दोनों जिलों में राहत सामग्री भेजकर मुख्यमंत्री पर सीधे तौर पर राजनीतिक हमला किया है।

 

ब्रह्मपुत्र के पानी में काजीरंगा का 73 फीसदी हिस्सा जलमग्न

राज्य में जल तांडव से राष्ट्रीय अभयारण्य काजीरंगा भी पूरी तरह से जलमग्न है। काजीरंगा का 73 फीसदी हिस्सा बाढ़ के पानी में पूरी तरह से डूब गया है। उल्लेखनीय है कि काजीरंगा अभयारण्य विश्व में एक सींग वाले गैंडों के लिए विख्यात है। जबकि यहां पर शेर, तेंदुआ, हाथी, जंगली भैंस, हिरण के साथ ही सैकड़ों प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। विश्व भर के पर्यटकों का ध्यान काजीरंगा अपनी ओर आकर्षित करता है, लेकिन वर्तमान समय में यह अभयारण्य अपनी बेबसी पर आंसू बहा रहा है।  असम की वन मंत्री प्रमीला रानी ब्रह्म ने बरसात से पहले यह दावा किया था कि अभयारण्य में वन्य जीवों को बाढ़ के दौरान आश्रय देने लिए ऊंचेऊंचे टीले बनाए जाएंगे, लेकिन उनका दावा सिर्फ दावा ही बनकर रह गया। वन्य जीव अपनी जान बचाने के लिए काजीरंगा से निकलकर पड़ोसी जिले कार्बी आंगलांग के ऊंचाई वाले पहाड़ों की ओर कूच कर रहे है। इस दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग को पार करने के दौरान वाहनों की चपेट में आकर छोटे जानवरों की मौत हो रही है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार दो गैंडे समेत कुल 25 जीवों की मौत हो चुकी है। मुख्यमंत्री सोनोवाल और केंद्रीय मंत्री किरण रिजीजू के अलावा वन मंत्री प्रमीला रानी ब्रह्म भी काजीरंगा का दौरा कर हालात का जायजा ले चुकी हैं। मुख्यमंत्री सोनोवाल प्रतिदिन अपने मंत्रिमंडल उच्चाधिकारियों के साथ बैठकर बाढ़ की समीक्षा करने में जुटे हुए हैं, बावजूद इसके स्थितियां अनुकूल नहीं हैं। इस समस्या का स्थायी समाधान नदियों पर बांध बनाए बिना कभी भी नहीं होने वाला है।

बाढ़ पर केंद्र की नजर

असम में आई बाढ़ पर केंद्र सरकार लगातार नजरें बनाए हुए है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री सवार्नंद सोनोवाल को फोन कर राज्य में आई बाढ़ के हालात का जायजा लिया। साथ ही उन्होंने बाढ़ से निपटने के लिए केंद्र द्वारा हर संभव मदद का भरोसा दिया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल असम समेत अरुणाचल मणिपुर में आई बाढ़ के हालात का जायजा लेने पहुंचा। यह प्रतिनिधिमंडल तीनों राज्यों के बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का आंकलन कर केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट देगा। वहीं केंद्रीय मंत्री जितेंद्र प्रसाद सिंह, गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी असम की बाढ़ को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। साथ ही राज्यवासियों को हर संभव सहायता देने का भरोसा भी दिया है। जबकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने असम के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा से टेलीफोन पर बात कर राहत शिविरों में रह रहे लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने पर जोर दिया। कुल मिलाकर केंद्र सरकार असम की बाढ़ पर लगातार नजर बनाए हुए है।

उल्फा (स्वाधीन) ने भी बाढ पर साधा निशाना

मुख्यमंत्री सोनोवाल के कामकाज को लेकर प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) स्वाधीन (स्व) के सेनाध्यक्ष परेश बरुवा ने भी निशाना साधा है। परेश बरुवा ने मुख्यमंत्री से पूजापाठ छोड़कर राज्य के बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए काम करने का आह्वान किया है। उल्फा (स्व) ने कहा है कि पूजापाठ से बाढ़ की समस्या का समाधान नहीं होगा। साथ ही बाढ़ पीड़ितों को राहत भोजन पहुंचने के लिए हेलिकाप्टर का प्रयोग नहीं करने को लेकर भी तंज कसा है। इसके अलावा परेश बरुवा ने बुद्धिजीवी वर्ग को भी सरकार के विरूद्ध आवाज नहीं उठाने के लिए आड़े हाथों लिया है। साथ ही हाल ही में संपन्न हुए अंबुवासी मेले को लेकर भी परेश बरुवा ने कटाक्ष करते हुए अंबुवासी मेले के आयोजन और उस पर खर्च होने वाले पैसे को लेकर सवाल पूछा है। बरुवा ने धार्मिक आस्था पर चोट करते इस आयोजन को बेबुनियाद करार दिया है। उल्लेखनीय है कि उल्फा (स्व) अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए समयसमय पर विवादित बयान देकर सनसनी फैलाने की कोशिश करने में जुटा रहता है। 

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