प्रदेश में 26 नवंबर को जींद व जसिया में हुई रैलियों ने जातिगत समीकरणों को एक तरह से हवा दे दी है। भले ही प्रदेश में विधानसभा चुनाव दूर है, फिर भी सभी पार्टियों ने मिशन 2019 शुरू कर दिया है। गैर जाट व जाट के बीच हुई इन रैलियों के कई मायने निकाले जा रहे हैं। भाजपा व इनलो ने रैलियों में शिरकत करके अपनी मजबूती दिखाने का प्रयास किया, तो कांग्रेस ने रैलियों से दूरी बनाकर एक बड़ा राजनीतिक फैसला लिया है। कांग्रेस का तो यहां तक कहना है कि इन रैलियों में शिरकत न करने का जो फैसला लिया था, उसके दूरगामी परिणाम होंगे।

आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने दोनों हाथों में लड्डू रखे। जसिया में जाटों की रैली व जींद में गैर जाट की रैली में केंद्र सरकार के दो मंत्रियों ने शिरकत की। इससे साफ है कि भाजपा न तो जाटों को नाराज करना चाहती है और न ही गैर जाट को। राजनीतिक पंडितों का तो मानना है कि प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव जाट व गैर जाट के बीच होगा। औरइसलिए अधिकतर पार्टियों ने अभी से मिशन 2019 शुरू कर दिया है। 

जसिया व जींद की रैलियां प्रदेश में जातिगत समीकरणों को हवा दे गईहैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि 2019 मेंविधानसभा चुनावों में जाट व गैर जाट के बीच की राजनीति सतह पर आ जाएगी।

प्रदेश में पिछले एक दशक से अधिक समय से जाट आरक्षण का मुद्दा अहम बना हुआ है। इसी मुद्दे को लेकर पार्टियां खूब खेल खेल रही हैं। 2014 में कांग्रेस ने जाटों को रिझाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आरक्षण की पटकथा लिखी और जाटों सहित पांच जातियों को आरक्षण देने की घोषणा की। जैसे ही सत्ता परिवर्तन हुआ और जाट आरक्षण का मामला अदालत में जा लटका।इसको लेकर जाट आरक्षण आंदोलन सरकार पर हावी होता गया और इस मामले की गूंज केंद्र सरकार तक जा पहुंची।  

इसी बीच भाजपा सरकार ने जाटों को रिझाने के लिए कोई कसर नहीं छोडी और कहा है कि उन्हें आरक्षण दिया जाएगा। 2016 में आरक्षण आंदोलन को लेकर जो तांडव हुआ, उसमें 31 लोगों की बलि चढ़ गई। इसमें जाटा आरक्षण आंदोलन को लेकर कई पार्टियां आमने-सामने हो गई, जहां कांग्रेस ने भाजपा पर प्रदेश में भाईचारा बिगाड़ने का आरोप लगाया।वहीं भाजपा ने इस मामले में सीधे-सीधे कांग्रेस को दोषी ठहराया। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक सलाहकार सहित तीन लोगों के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज करके मामले को अगल ही रूप दिया गया। 

भाजपा ने सीधे-सीधे पूर्व मुख्यमंत्री पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि कांग्रेस के लोगों की शह पर ही आंदोलन हिंसक हुआ। हालांकि आरक्षण हिंसा मामले को लेकर गठित किए गए आयोग प्रकाश सिंह ने सरकार पर ही सवाल उठाए। जिसको लेकर सरकार बैकफुट पर आई और जिन अधिकारियों के खिलाफ जाट आरक्षण आंदोलन हिंसा के मामले में कार्रवाई की गई थी, उन्हें बहाल करना पड़ा। हालांकि जाट आरक्षण हिंसक मामले में सरकार की खूब किरकरी हुई। अभी तक यह मामला लोगों के जेहन में बना हुआ है। जाट आरक्षण हिंसक मामले में भाजपा के सांसद राजकुमार सैनी पर भी मामले को तूल देने के आरोप लगाए, लेकिन सैनी ने गैर जाटों के साथ खड़े होकर अलग ही दम भरा। इसके बाद से ही सांसद राजकुमार सैनी व जाट नेता यशपाल मलिक दूसरे पर जातिगत टिप्पणी करने लगे। हालांकि अब एक साल बाद मामला कुछ ठंडा पड़ा, तो अब इन रैलियों ने गैर जाट व जाट की राजनीति को फिर से गरमा दिया है।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा नेजाट आरक्षण की पटकथा लिखी और जाटों सहित पांच जातियों को आरक्षण देने की घोषणा की। जैसे ही सत्ता परिवर्तन हुआ और जाट आरक्षण का मामला अदालत में जा अटका।

भले ही दोनों रैली सफल हुई हो, लेकिन इसके कई मायने निकाले जा रहे है। पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा ने रैली में शिरकत न करके पिछले आरक्षण आंदोलन की कड़वाहट को कम करने का प्रयास किया, तो भाजपा ने दोनों रैलियों में शामिल होकर यह संदेश दिया कि पार्टी 36 बिरादरी के साथ है। हालांकि इनेलो ने रैली में शामिल होकर यह साबित किया है कि पार्टी के नेताओं के सामने राजनीति बाद में है, पहले उनका समाज है। जसिया रैली से जाट नेता यशपाल मलिक का भी कद बढ़ा है, अभी तक यह सवाल बना था कि बाहरी प्रदेश से आकर कोई जाट नेता किसी बड़े दल का कैसे नेतृत्व कर रहा है?  

रैली से पहले जिस तरह से विरोध हो रहा था, उससे कहीं न कहीं यह माना जा रहा था कि जसिया में होने वाली जाटों की रैली कुछ खास नहीं होगी, लेकिन भीड़ ने साबित कर दिया कि जाट समाज भी एकजुट है। उनके लिए यह जरूरी नहीं है कि उनका नेतृत्व प्रदेश या फिर बाहरी प्रदेश का जाट लीडर कर रहा है। अब तो समय ही बता पाएगा कि आखिर जाट व गैर जाट की रैलियां प्रदेश की राजनीति में क्या बदलाव लाती है? 

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