गड़ू किसी आदमी का नाम तो हो सकता है, मगर  किसी पेड़ का नहीं। अगर यही नाम किसी पेड़ का हो तो यकीन करना मुश्किल हो जाता है। हिमाचल प्रदेश के  मंडी जिला के दुर्गम क्षेत्र  चौहारघाटी के काणग गांव में  करीब 100 साल से भी पुराना अखरोट का पेड़ इसी नाम से पुकारा जाता है। आसमान की ओर सर उठाए और चारों तरफ  अपनी विशालता का आभास करवाता बरगद से भी विशालकाय यह पेड़ आज गांव के करीब दस परिवारों की सांझी विरासत बन गया है। 

झगड़ू अखरोट की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर इसे काट दिया जाए तो कम से कम पचास ट्रक लकड़ी के अकेले इसी पेड़ से निकल जाएंगे। जमीन से करीब तीसचालीस फुट ऊंचे इस पेड़ के तने का व्यास करीब आठदस मीटर है। इसकी टहनियां चारों ओर दूरदूर तक फैली है। इसका सर आसामान की ओर और जड़ें पाताल में है। इस पर सैंकड़ों , हजारों नहीं बल्कि लाखों की तादाद में अखरोट लगते हैं।

 

राजा के दरबार के पहुंचा था मामला 

इस विशालकाय अखरोट के पेड़ के मालिकाना हक को लेकर मामला राजा के दरबार तक पहुंच गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि सौ साल पूर्व किसी बुजुर्ग ने अपनी जमीन पर यह पेड़ लगाया था। तब उसे नहीं मालूम था कि उसके द्वारा लगाया जा रहा यह अखरोट का पौधा इतना विशालकाय होगा और इसकी विशालकाया ही परिवारों के बीच झगड़े का कारण बनेगी। लगाने के बाद यहां की आबोहवा इसे इतनी रास आई कि कई सालों बाद जब यह पेड़ अपने विशालकाय रूप में आया तो आसपास के लोगों के खेतों की ओर फैलने लगा। जिससे इसके अधिकार को लेकर कई परिवारों में झगड़ा शुरू हो गया। क्योंकि जहां तक भी इसकी टहनियां फैली हुई थी। वहां के जमीन मालिकों का कहना था कि उनकी जमीन के ऊपर फली टहनियों के अखरोट उनके हिस्से में आने चाहिए। मगर जिसकी जमीन पर यह पेड़ था उसे इस बात पर ऐतराज था। 

यह रियासत के जमाने की बात है। राजाओं का शासन था और झगड़ू पेड़ का मामला राजा की अदालत में चला गया। इस पर करीब 25 साल तक मुकदमा चला। कोई भी पक्ष मानने को तैयार नहीं था। अंत में राजा की अदालत ने फैसला सुनाया कि अखरोट के पेड़ की टहनियां जिसके खेत पर हैं। वहां से अखरोट तोडऩे का अधिकार भी उनका है। जिसके खेत में यह पेड़ है , वह अपने खेत के ऊपर से ही अखरोट निकाल सकता है। राजा के इस फरमान के बाद सब लोग अपनेअपने हिस्से के अखरोट लेने लगे।

राजाओं का शासन था और झगड़ू पेड़ का मामला राजा की अदालत में
चला गया। इस पर करीब 25 साल तक मुकदमा चला। कोई भी पक्ष मानने को
तैयार नहीं था। अंत में राजा की अदालत ने फैसला सुनाया।


पारिश्रमिक
के रूप में 400 अखरोट 

यह पेड़ इतना विशालकाय है कि इस पर चढऩा ही अपने आपमें जोखिम भरा है। जो व्यक्ति पेड़ पर चढक़र अखरोट निकालेगा उसे पारिश्रमिक के रूप में 400 अखरोट दिए जाएंगे। आज भी यह व्यवस्था कायम है। इसके बावजूद भी किसी ने इस पेड़ को तेजाब से खत्म करने का भी प्रयास किया पर इस पर कोई असर नहीं हुआ। स्थानीय निवासी सुभाष ठाकुर, लाल सिंह ठाकुर, हरीराम ठाकुर, शेर सिंह ठाकुर, नेत्र सिंह, दिवान और सरवण आदि ने बताया कि इस पेड़ की जड़ें करीब पचास मीटर नीचे रोपा नाले तक है। वहीं पर इसके तने के बीच करीब आठ फुट गहरा गड्ढा बन गया है। जिसमें सारा साल पानी भरा रहता है। जिससे यह पेड़ कभी भी सूखता नहीं है। आज भी काणग गांव के करीब दस परिवारों की यह सांझी विरासत का प्रतीक यह पेड़ बना हुआ है।

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