वारा पूंजी के इस दौर में बाजार ने हर चीज को प्रभावित किया है। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सांस्थानिक, सामाजिक, राजनीतिक और यहां तक आर्थिक स्तर पर भी बाजार हावी है और ऐसा लगता है कि खुद बाजार भी अब बाजार के भरोसे ही चल रहा है। हमारी संवेदनाएं, पारस्परिक संबंध, भाषाएं और बोलियां आदि वे मानवीय पूंजी हैं, जो इंसान को इंसान बनाए रखने के लिए जरूरी हैं, लेकिन इन्हें भी बाजार ने नहीं छोड़ा। ऐसे में हमारा साहित्य भला कैसे बचा रह जाता? और हम उसे कहां तक बचाने की कोशिश कर पाते हैं? किसी को किसी चीज से बचाने की कोशिश की पहली शर्त तो यह है कि उससे खुद भी प्रभावित रहा जाए। ऐसे में जहां हर चीज बाजार से संचालित हो, वहां साहित्य का इससे बचे रह पाना मुश्किल तो है ही।

यह आज की बात नहीं है, एक जमाने से ही साहित्य का पालनपोषण महाजनी सभ्यता करती रही है। ये मौजूदा साहित्योत्सव उसी महाजनी व्यवस्था के भूमंडलीकरण का बाजार बनकर उभरे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि साहित्य का इससे प्रचारप्रसार होता है, लेकिन बाजार ऐसा करता है, इस पर यकीन करना मुश्किल है। जहां सामाजिकसांस्कृतिक सरोकार से जुड़े स्वस्थ विचार, संवाद, वादविवाद आदि हो, वहां साहित्य और संस्कृति का किसी बाजार या प्रचार से विस्तार हो ही नहीं सकता। और जहां बाजार होता है, वहां यह सब संभव नहीं है। अरे भाई! जो आयोजक ऐसे आयोजनों को कराएगा, वह तो हर हाल में चाहेगा कि आयोजन उसके हिसाब से हो। फिर बाजार को भी क्या दोष देना, वह तो अपना काम ईमानदारी से कर ही रहा है!

हर एक दो महीने के अंतराल पर देश में कहीं कहीं एक साहित्योत्सव आयोजित किया जा रहा है। इस तरह के आयोजनों में साहित्य से मुखरित प्रतिरोध की आवाज ग्लैमर, कैमरे की चमकदमक, सेलेब्रिटीज के आगे गुम हो जाती है। सवाल यह हैकि इन साहित्योत्सवों में साहित्य कितना है?

बीते कुछ वर्षों से देशभर में साहित्य के बड़ेबड़े उत्सवों के आयोजन होने लगे हैं। तकरीबन हर बड़े शहर में साहित्योत्सव आयोजित हो रहे हैं, जिन्हेंलिटरेचर फेस्टिवलयालिट फेस्टकहा जाता है। भारत में साहित्योत्सव की शुरूआत जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से हुई थी और साल 2000 के बाद से देश के बाकी हिस्सों में भी ऐसे साहित्योत्सवों का आयोजन होने लगा। इनमें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल, जागरण संवादी, लिटरेरिया कोलकाता, टीओआई लिट फेस्ट, दिल्ली लिटरेचर फेस्टिवल, जश्नरेख्ता, लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल, एएमयू लिटरेरी फेस्टिवल, गोवा आर्ट एंड लिटरेचर फेस्टिवल, अहमदाबाद इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल, तमिलनाडु लिट फॉर लाइफ, और हैदराबाद लिटरेरी फेस्टिवल आदि शामिल हैं। इनके अलावा देश के कई हिस्सों में अन्य भाषाओं में भी साहित्योत्सवों का आयोजन होता है, और ज्यादातर में समानता ही देखी गयी है। कई लिट फेस्ट तो देश से बाहर विदेशों में भी आयोजित होते हैं। दो दिवसीय, तीन दिवसीय या पांच दिवसीय इन साहित्योत्सवों में साहित्य पर कम, उसके बाजार पर ज्यादा चर्चाएं होती हैं। दूसरी ओर, साहित्यकारों के लिए ये उत्सव एक प्रकार से छुट्टियां मनाने की तरह होते हैं। अक्सर इन उत्सवों में अंग्रेजी भाषा को तरजीह देकर बाकी भारतीय भाषाओं को दोयम दर्जे के रूप में देखा जाता है, क्योंकि भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य बाजार को मजबूती नहीं दे सकतीं। हालांकि जब इन भाषाओं के विस्तार की बात होती भी है, तो उसे सबसे पहले रचनाशीलता या सामाजिक सरोकार से नहीं, बल्कि बाजार से ही जोड़कर देखा जाता है कि उसकी सेलेबिलिटी क्या है। यह एक भारी विडंबना है। 

 

वरिष्ठ साहित्यकार रविभूषण कहते हैं– ‘इन उत्सवों की प्रायोजक कंपनियां वही हैं, जो एक तरफ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करती हैं और दूसरी तरफ उत्सवों का आयोजन कर उनके कृत्यों के विरोध में बोलने वाली साहित्यिक आवाजों को आमंत्रित करके उनका मुंह बंद कर देती हैं। पूरे देश में यह काम सुविचारित, सुनियोजित तरीके से चल रहा है, जिसका उद्देश्य मनुष्य की प्रगतिशीलता, उसकी पक्षधरता और मानवीय संवेदनाओं को आवाज देने वाले साहित्य को कुंद करना है। दरअसल, हमारा अधिकांश साहित्य जीवन और समाज के पक्ष में है, पर्यावरण और प्रकृति के पक्ष में है, जबकि जीवन, समाज, पर्यावरण और प्रकृति का नाश करने वाली कॉरपोरेट शक्तियां बाजार का मानक तैयार कर साहित्य की वास्तविक धार और चेतना को कुंद कर रही हैं। जाहिर सवाल है, टाटा का काम नमक बनानाबेचना है, तो वह साहित्यिक आयोजन क्यों कर रहा है? दरअसल, कंपनियां अपने साहित्यिक आयोजन में साहित्यकारों को आमंत्रित करके उन्हें अनुग्रहित करती हैं, और अपने एजेंडे को सेट कर देती हैं, ताकि उनके खिलाफ मुखर साहित्यिक आवाजों को महत्वहीन बनाया जा सके। साहित्य का काम उत्सव मनाना नहीं है, बल्कि सरकार के सामने एक वैचारिक विपक्ष खड़ा करना है। यह विपक्ष खड़ा ही होने पाए, इसलिए सत्ता और बाजार का गठजोड़ साहित्योत्सवों के जरिये साहित्य को दिशाहीन करने की कोशिश करता है और कुछ हद तक इसमें वह सफल भी है।

साहित्य का काम उत्सव मनाना नहीं है, बल्कि सरकार के सामने एक वैचारिक विपक्ष खड़ा करना है। यह विपक्ष खड़ा ही होने पाए, इसलिए सत्ता और बाजार का गठजोड़ साहित्योत्सवों के जरिये साहित्य को दिशाहीन करने की कोशिश करता है।

तकरीबन सभी साहित्योत्सवों में एक बात समान रूप से दिखती है, वो यह कि आयोजकों का इनमें साहित्यधर्मिता पर कम, उत्सवधर्मिता पर ज्यादा फोकस रहता है। चूंकि मामला बाजार का है, इसलिए आयोजकों की यह मजबूरी भी है। जहां दर्जन, दो दर्जन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां आयोजन को स्पांसर कर रही हों, जहां बड़े मीडिया घराने इसके बैकबोन बने हों, वहां इस बात पर चर्चा होना लाजमी है कि जो साहित्य बिकेगा, वही टिकेगा। यही वजह है कि तकरीबन हर साहित्योत्सव में साहित्य की अच्छी किताबों के बजाय ज्यादा से ज्यादा प्रतियां बिकने वाली किताबों की चर्चा गर्म रहती है। जाहिर है, इन उत्सवों के आयोजन में प्रकाशकों की भी एक बड़ी भूमिका होती है, जिनके लिए यह जरूरी तथ्य है कि वे ज्यादा बिकने वाली किताबों के प्रकाशक बनें। कहां तो ऐसे साहित्योत्सवों का उद्देश्य यह होना चाहिए कि जिनसे सामाजिक सरोकार वाले साहित्य का विस्तार हो, लेकिन कहां उद्देश्य यह रखा जाता है कि इसका बाजार बढ़े। इसीलिए ऐसे उत्सवों में समाजमूलक और जीवन मूल्यों से जुड़े विचार वाले साहित्य गायब पाए जाते हैं।

बाजार का सरोकार मुनाफे से है, जबकि साहित्य का सरोकार समाज में हर स्तर पर संवाद का एक खुला मंच प्रदान करने से है। बाजार को इससे कतई मतलब नहीं है कि हमें कैसे साहित्य रचना की जरूरत है या समाज या लोकतंत्र विरोधी तमाम शक्तियों के खिलाफ साहित्यिक आवाज उठाने की जरूरत है, बल्कि बाजार को सिर्फ इस बात से मतलब है कि उसे मुनाफा हो रहा है या नहीं। बाजार को इससे कोई मतलब नहीं कि गालिब, शेक्सपियर या सूरदास की चर्चा हो रही है या नहीं, बल्कि उसे इस बात से मतलब है कि साहित्य की मार्केट वैल्यू क्या है? ऐसी परिस्थिति में अगर बाजार के मुनाफाखोर, राजनीतिक गठजोड़ और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन वाले रवैये के खिलाफ कोई बात कहनी हो, तो क्या यह मुश्किल नहीं है कि ऐसे मंचों पर ऐसा कर पाना असंभव है? अगर आप गौर करें, तो इस असंभव को यथावत भी रखा जाता है, किन्हीं उत्सवों में फिल्मी हस्तियों का तड़का लगाकर, किन्हीं में कव्वाली या संगीत का कार्यक्रम पेश कर, तो किन्हीं में किसी नेता को बिठाकर।

टाटा का काम नमक बनानाबेचना है, तो वह साहित्यिक आयोजन क्यों कर रहा है?
दरअसल, कंपनियां अपने साहित्यिक आयोजन में साहित्यकारों को आमंत्रित
करके उन्हेंअनुग्रहित करती हैं, और अपने एजेंडे को सेट कर देती हैं।

हाल ही में संपन्न हुए दसवें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कुछ साहित्यकारों से किनारा ही कर लिया गया, यह कहकर कि वे मार्क्सवादी साहित्यकार हैं और सरकार विरोधी हैं। और उनकी जगह एंट्री हुई संघ के कुछ बुद्धिजीवियों की। जाहिर है, यह भी बाजार का ही दबाव है, क्योंकि हमारी सरकारें खुद पूंजीवादी सरकारें हैं, जो कभी नहीं चाहेंगी कि साहित्योसवों में शोषित और वंचित समाज की संवेदनाओं और मानवाधिकारों की कोई बात करे। सत्ता और साहित्य के इस संबंध पर प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैंसत्ता और साहित्य का सम्बंध सचमुच जटिल है, इतना जटिल कि कई बार साहित्य को स्वयं सत्तासीन हो जाने का भ्रम हो जाता है। यह भ्रम तब होता है, जब साहित्य को सत्ता अपने पहलू में बिठाने को तैयार हो जाती है और साहित्य भी भूलने लगता है कि उसका काम तो सत्ता के आमनेसामने रहने का है। इसलिए ऐसे आयोजनों को ग्लैमराइज करके साहित्य के नाम पर लोगों का ध्यान भटकाने का काम किया जाता है।

देश के तमाम हिस्सों में साहित्यिक संस्थाएं और अकादमियां साहित्यिक आयोजन करती हैं, वादविवाद और संवाद स्थापित करती हैं और साहित्यकारों की जन्मशती मनाने से लेकर तमाम सामाजिक सरोकारों पर अपनी खुली राय रखती हैं। लेकिन वे बाजार द्वारा पोषित नहीं होतीं, इसलिए बाजारू मीडिया उन आयोजनों की ओर ध्यान नहीं देता। हालांकि यहां भी साहित्यिक मठाधीशी चलती ही है, जो साहित्य के लिए ठीक नहीं है, फिर भी उनमें एक मर्यादा होती है कि वे सृजनशीलता और सामाजिक सरोकार की कुछ बात तो करते हैं। इस ऐतबार से मौजूदा साहित्योत्सवों में साहित्यधर्मिता जैसी चीज नजर नहीं आती, अगर कुछ नजर आती है, तो सिर्फ उत्सवधर्मिता, जो बाजार का ही प्रसार करती है। उत्सव चाहे जिस किसी चीज का हो, उससे बाजार को ही फायदा पहुंचता है।

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