पूर्वोत्तर भारत में तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा महत्व त्रिपुरा का है। इसका सबसे प्रमुख कारण तो यही है कि त्रिपुरा को वामपंथ का अभेद्य किला माना जाने लगा है। 25 साल से यहां लगातार मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी (माकपा) की सरकार है। इसमें से 20 साल से लगातार माणिक सरकार मुख्यमंत्री बने हुए हैं। माणिक सरकार के बारे में देश दुनिया में यही छवि बनी हई है कि देश के सबसे ईमानदार राजनेताओं में से एक हैं। उनका न अपना घर है और न ही बैंक बैलेंस। यहां तक कि उनकी पत्नी रिक्शा में बैठकर खुद सब्जी खरीदने जाती हैं। दूर दराज का राज्य होने के चलते अधिकांश लोगों को जमीनी हकीकत का पता ही नहीं है।

त्रिपुरा जाकर यह दिखाई दिया कि मुख्यमंत्री माणिक सरकार की इस बनावटी बेदाग छवि की आड़ में राज्य की बदहाली को ढंका जा रहा है। कड़वा सच यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद त्रिपुरा के लोग अभावग्रस्त जीवन जीने को मजबूर हैं। यह गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाला देश का सबसे पहला राज्य है और यहां 67 प्रतिशत लोग बीपीएल की श्रेणी में आते हैं। इस गरीबी, बेकारी और बदहाली का सबसे बड़ा कारण वहां की राजनीतिक व्यवस्था को ही बताया जा रहा है। धलाई जिले के कलाई गांव में, जहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने विजय संकल्प रैली की, में एक परचून की दुकान चलाने वाले विजय पाल ने इसका कारण बताया। उन्होंने कहा कि सरकार के पास नौकरियां नहीं हैं, जो हैं वह उसके कार्यकर्ताओं के लिए हैं। डिग्री मिलने और योग्यता होने के बावजूद आपको नौकरी तभी मिलेगी जब आप माकपा के काडर हों। इतना ही नहीं, तहबाजारी की दुकानें हों या कोई भी ठेका लेने का काम, इस सबके लिए माकपा का काडर होना जरूरी है। माणिक सरकार राज्य की जनता के लिए नहीं, माकपा काडर के लिए सरकार चला रहे हैं। जो इसके खिलाफ बोलता है, उसको माकपाई लोग ठीक कर देते हैं। इस बार भाजपा ने लोगों के मन से यह डर निकालने का काम किया है। इसलिए परिवर्तन भी हो सकता है।  

यहां यह जान लेना जरूरी है कि पिछले लगातार तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा के किसी उम्मीदवार को सफलता नहीं मिली थी। अधिकांश की या कहें, अमूमन सबकी जमानत ही जब्त होती थी। 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 50 उम्मीदवार खड़े किए और 49 की जमानत जब्त हुई। तब यह चमत्कार ही है कि वहां की जनता इस बार न केवल भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर माकपा को चुनौती देती देख रही है, बल्कि चलो पल्टाएं के नारे के साथ उसके पीछे एकजुट है। इस स्थिति को लाने के लिए भाजपा ने न केवल जमीनी स्तर पर काम किया है बल्कि बाकी दलों को भी एक तरह से साफ किया है। त्रिपुरा की पूरी की पूरी कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को भाजपा ने हजम जैसा कर लिया है। त्रिपुरा में भाजपा के प्रभारी सुनील देवधर इसमें कुछ गलत नहीं मानते। वे कहते हैं कि यहां दो ही पक्ष हैं। एक माकपा और दूसरा जो माकपा के विरोध में है। कोई और विकल्प न होने के चलते लोग कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस के झंडे तले एकजुट होकर चुनौती देने का प्रयास करते थे। लेकिन कांग्रेस ने हमेशा अंदरखाने माकपा से सेटिंग कर लोगों को धोखा देने का काम किया। इस बार भाजपा ने लोगों के मन में यह विश्वास पैदा किया है कि वह माकपाई कुशासन और गुंडाराज से उनको मुक्ति दिला सकती है।

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के बारे में जो धारणा बनी है, दरअसल वह भ्रमजाल ही है। तथाकथित ईमानदार मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य निरंतर बदहाल है। माकपा सरकारी
कर्मचारियों में भी अपने कॉडर के बल पर चुनाव जीतती रही।

त्रिपुरा में अगर कोई राजनीतिक परिवर्तन होता है तो उसके सूत्रधार सुनील देवधर ही कहे जाएंगे। पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को देश के अन्य राज्यों से जोड़ने के लिए माय होम इंडिया नामक संगठन चलाने वाले सुनील देवधर पिछले तीन साल से राज्य में डेरा जमाए हुए हैं। उनके नेतृत्व में भाजपा ने माकपा सरकार की एक एक कारगुजारी को जनता के सामने लाने का काम किया। उसमें भी दो मुद्दे ऐसे हैं जिसने माकपा काडर को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। पहला मुद्दा यह है कि सारे देश में सातवां वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो चुका है, पर त्रिपुरा में अभी भी चौथा वेतन आयोग ही लागू है। भाजपा ने वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आती है तो पहले ही दिन सातवां वेतन आयोग की सिफारिश लागू कर देगी। इस घोषणा ने माकपा नेतृत्व में बेचैनी पैदा कर दी है। त्रिपुरा के सरकारी कर्मचारियों में माकपा ने अपना काडर नीचे तक जमा रखा है। यह उसके हर प्रकार के कामों में साथ देता है, खासकर चुनावों में इलेक्शन डूयटी के दौरान उनकी भूमिका खासी महत्व की होती है। भाजपा ने वहीं चोट की है।

दूसरा मुद्दा शिक्षकों की भर्ती में हुई धांधली का है। त्रिपुरा में 10,323 एक ऐसी संख्या है जो सबको मालूम है। इन 10,323 शिक्षकों की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध करार दिया है और 31 दिसम्बर, 2017 से उनकी सेवाएं समाप्त मानी गई हैं। हांलाकि वे इस शिक्षा सत्र तक काम करते रहेंगे। शिक्षकों की इस बर्खास्तगी के लिए सीधे तौर पर माणिक सरकार ही जिम्मेदार है। सुनील देवधर कहते हैं कि यह हरियाणा के शिक्षक भर्ती घोटाले जैसा है। जैसे उस मामले में ओम प्रकाश चौटाला को जेल हुई, वैसे ही माणिक सरकार को भी जेल भेजना चाहिए। इतना ही नहीं, माणिक सरकार रोज वैली घोटाले में भी लिप्त हैं। उन्होंने इसीलिए सीबीआई से रोज वैली चिटफंड कंपनी की जांच नहीं कराई। इस आधार पर भाजपा माणिक सरकार को बेदाग नहीं महाभ्रष्ट बता रही है।

माणिक सरकार की इन्हीं कारगुजारियों और त्रिपुरा के हालात को सामने लाने के लिए भाजपा ने न केवल राज्य भर में अभियान चलाया बल्कि माणिक सरकार को देश भर में बेनकाब करने का भी प्रयास कर रही है। चुनावी अभियान के बीच देश की राजधानी नई दिल्ली में इसीलिए एक पुस्तक प्रकाशित की गई। इस पुस्तक का शीर्षक ही रखा गया- माणिक सरकार, दृश्यम और सत्यम (त्रिपुरा के लाल आतंक की कहानी)। पुस्तक के लोकार्पण समारोह में उपस्थित भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कहा कि सच यही है कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री जैसे दिखने का प्रयास करते हैं, वैसे वे हैं नहीं। एक संभ्रम फैलाया गया है, इस बार के चुनावों में भाजपा उस भ्रमजाल को तोड़ देगी।

ये होंगे प्रमुख मुद्दे :-

– राज्य में लागू चौथे वेतनमान की जगह सातवें वेतनमान की सिफारिशें लागू होना

– 10,323 शिक्षकों की भर्ती का रद्द किया जाना

– केवल माकपा कॉडरों को ही नौकरी व ठेके आदि दिया जाना

– माकपा कॉडरों की हिंसा और भय पैदा करने वाली राजनीति

– जनजातियों के साथ किया जा रहा सौतेला व्यवहार

– राज्य का औद्योगिक विकास ठप्प हो जाना

– महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंसा की बढ़ती घटनाएं

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