मेघों के देश में चुनावी बयार पूरे जोर से बह रही है। राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी बिसात बिछाकर पासे फेंक रही हैं। राज्य की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस जहां अपना गढ़ बचाने की जद्दो-जहद कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी भारत के स्वीट्जरलैंड में पहली बार कमल खिलाने के लिए बेताब दिख रही है। भाजपा ने राज्य में अपने चुनाव प्रचार का अभियान काफी पहले से ही शुरू कर दिया है। वहीं कांग्रेस अभी तक अपनी रणनीतियों को बनाने में ही जुटी हुई है। इसका कारण कांग्रेस को छोड़कर बड़ी संख्या में उसके वर्तमान विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष पीए संगमा की पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) का दामन थाम चुके हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए भी कुछ राहत वाली बात यह है कि भाजपा के कुछ ऐसे नेता जिनको अपना टिकट कटता दिखा वे कांग्रेस शामिल हो गए हैं, लेकिन वे कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचाएंगे यह कहना अभी काफी कठिन कार्य है। कुल मिलाकर ईसाई बहुल राज्य में अछूत समझी जाने वाली पार्टी भाजपा बड़ी तेजी से अपनी पैठ बनाती जा रही है। भाजपा पूरे दम के साथ राज्य में पहली बार सरकार बनाने का दावा कर रही है। राजनीतिक दृष्टिकोण से इसका विश्लेषण करें तो यह साफ नजर आ रहा है कि वर्तमान में कांग्रेस काफी पिछड़ चुकी है।

उल्लेखनीय है कि जिस फार्मूले पर चुनावी रणनीति बनाकर कांग्रेस पार्टी असम के चुनाव में मुंह की खा चुकी है, उसी फार्मूले को फिर से मेघालय में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी लागू कर रही है। राज्य की 60 विधानसभा सीटों वाले इस चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की स्थिति कमोवेश वैसी ही बनी हुई है जैसा कि असम में हुए चुनाव के दौरान थी। पार्टी के नेता बेपरवाह और सत्ता के मद में चूर होकर अति आत्मविश्वास से भरे थे। जिसमें उन्हें राज्य की तत्कालीन स्थिति से कोई लेना-देना नहीं रह गया था। चुनाव में जीत का जश्न मतदान होने से पहले ही जिस तरह से असम में मनाया जाने लगा था, उसी प्रकार से मेघालय में भी देखने को मिल रहा है। राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक त्रासदी यह है कि यहां 1972 से लेकर अब तक 23 सरकारें बन चुकी हैं। इसमें से 3 सरकारें ही तीन वर्ष तक का कार्यकाल पूरा कर पाई हैं। शेष सभी सरकारें 18 माह से कम अवधि में ही औंधे मुंह गिरती रही हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था लगातार गिरती रही है।

मेघायल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। यहां मुख्य मुकाबला भाजपा और सत्तारूढ़ कांग्रेस में है। भजपा जहां उत्साह से चुनाव की तैयारी में काफी पहले से सक्रिय हो चुकी थी,
वहीं गढ़ बचाने की कोशिश में कांग्रेस लगी हुई है।

असम की राजनीतिक स्थिति से मेघालय हमेशा ही प्रभावित होता रहा है। मेघालय की जनता भौगोलिक रूप से जुड़े होने के कारण असम के बाजारों से लेकर तमाम चीजों के लिए असम पर निर्भर करती है। यहां तक कि असम से मेघालय जाने- यानी मेघालय के खासी हिल्स (शिलांग) से गारो हिल्स अर्थात तूरा जाने के लिए असम से होकर ही गुजरना पड़ता है। खासकर खासी और जयंतिया जनजाति को छोड़कर मेघालय की अन्य अनेक जनजातियां असम पर ही निर्भर करती हैं। इनकी दैनिक जरूरतें असम से ही पूरी होती हैं। यह काम असम में ही करते हैं। इनकी दिनचर्या असम से ही शुरू होकर असम में ही समाप्त होती है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से असम की राजनीति का असर भी इनके ऊपर बहुत ही गहरा पड़ता है।

विधानसभा चुनाव में जहां मेघालय की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी अपने परंपरागत अंदाज में काम कर रही है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी स्थानीय सभी दलों, संगठनों को साथ लेकर चुनाव में उतरने का ताना-बाना बुन रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी एआईसीसी के महासचिव तथा मेघालय चुनाव के प्रभारी सीपी जोशी बीते कई दिनों से मेघालय में कैंप किए हुए हैं, लेकिन सारी औपचारिकताएं देर से पूरी की जा रही हैं। पार्टी ने अब चुनाव में टिकट देने के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का भी गठन किया है। साथ ही अब तक टिकटों के बंटवारे को इसलिए टाला जा रहा है, ताकि टिकट नहीं पाने की स्थिति में पार्टी के लोग भाजपा में न शामिल हो जाएं। लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि टिकट के फाइनल होने में देरी की वजह से ही पार्टी छोड़ने वालों की संख्या और अधिक बढ़ जाए। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि जिस सीपी जोशी के नेतृत्व में असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई थी, उन्हें फिर से मेघालय का भी कमान सौंप दिया गया है। इसे पार्टी की उदासीनता कहें या दिशाहीनता। लेकिन, इतना तो अवश्य है कि कांग्रेस पार्टी अंधेरे में हाथ पैर मार रही है।

राज्य के अनेक दल और छोटे-छोटे संगठन भाजपा के साथ हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में एक मजबूत सरकार बनने के बाद मेघालय के युवाओं का रुझान भाजपा की ओर लगातार ही बढ़ता गया है। मेघालय की अधिकांश आबादी क्रिश्चियन धर्मावलंबियों की है। और, कांग्रेस भाजपा पर क्रिश्चन विरोधी होने का आरोप लगाकर इन युवकों को बरगलाना चाह रही है। बावजूद इसके लोगों पर इसका कोई असर नहीं देखा जा रहा है। कई युवा नेताओं ने बातचीत के दौरान कहा कि गोवा में भी क्रिश्चियन धर्मावलंबियों की आबादी है। जिसे भाजपा की सरकार से कभी कोई परेशानी नहीं हुई। भाजपा के नेता लोगों को यह आश्वस्त कराने में कामयाब हो रहे हैं कि भाजपा किसी जाति, धर्म, वर्ण, भाषा, क्षेत्रीयता आदि को लेकर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं रखती है। और, सबका साथ सबका विकास का नारा पार्टी के लिए मूल मंत्र है। ऐसे में मेघालय में भाजपा की बातों का कहां तक वोटरों पर असर पड़ता है, यह तो आने वाले चुनाव के परिणाम से स्पष्ट होगा। लेकिन, इतना तो तय है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के प्रति अविश्वास की भावना लोगों के अंदर कूट-कूटकर भर गई है। जो कांग्रेस की इस विधानसभा चुनाव में करारी हार का कारण बन सकता है। वहीं इन दोनों दलों के बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) अपने भी दिवंगत नेता पीए संगमा की विरासत को भुनाने की कोशिश में लगी हुई है। ज्ञात हो कि पीए सांगमा द्वारा एनसीपी छोड़कर एनपीपी पार्टी के गठन करने के बाद राज्य में एनसपी की हालत बेहद खस्ता हो गई है।

24 जनवरी को गारो हिल्स की सड़कों की खराब स्थिति के विरोध में बाबा डैम एरिया डेवलपमेंट यथ कमेटी के लोग सड़क पर उतर आए। इनका आरोप था कि राज्य सरकार ने गारो हिल्स की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। एनपीपी के अध्यक्ष व तुरा के सांसद कोनराड संगमा लगे हाथ स्थानीय विधायक नोभरफिल्ड मराक पर निशाना साध दिया कि वे अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास पर बिल्कुल ही ध्यान बीते वर्षों में नहीं दिए। इसके जवाब में विधायक ने अपने कार्यकाल में किन-किन योजनाओं को मंजूरी दी है- सारा कच्चा चिट्ठा निकालकर सामने ला दिया। साथ ही उन्होंने दिखाया कि विकास संबंधी कितने काम क्षेत्र में किए गए हैं। स्थिति ऐसी बन गई एक गुट सांसद के पक्ष में तो दूसरा गुट विधायक मराक के पक्ष में। लेकिन, मुद्दा था खराब रास्ता। जो न तो तुरा के सांसद द्वारा बनवाया गया और न ही स्थानीय विधायक और मंत्री द्वारा। मेघालय में ऐसा ही होता रहा है कागज पर परियोजनाएं बन जाती हैं। काम पूरा हो जाता है। रुपये का भुगतान भी कर दिया जाता है। लेकिन, जमीन पर स्थिति जस की तस बनी रहती है।

खस्ताहाल हो चुकी व्यवस्था

राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के खिलाफ कई मुद्दे हैं। सड़कें खराब होने के मेघालय से अधिक उदाहरण और किसी राज्य में नहीं मिल सकते। जबकि मेघालय में अन्य राज्यों की तुलना में सड़कों की संख्या काफी कम है। बावजूद इसके सड़क निर्माण कार्य बिल्कुल ही नहीं किए गए हैं। यहां तक कि राज्य की मुख्य सड़कें भी खस्ताहाल बनी हुई हैं। सड़कें खराब होने के लिए मुख्यमंत्री मुकुल संगमा जिलों के स्वायत्तशासी परिषदों पर आरोप मढ़ रहे हैं कि इन परिषदों द्वारा सड़क परियोजनाओं के क्रियान्वयन में की गई देरी की वजह से ही सड़कों की हालत खराब है। जबकि सच्चाई यह है कि केंद्रीय योजनाओं के मद में भी जो धन राज्य में पहुंचे उनका अधिकांश भाग बंदर-बांट कर लिया गया। वहीं कई जगहों पर तो धन खर्च ही नहीं किए गए। भ्रष्टाचार और सरकारी उदासीनता दोनों ही इस राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के विरुद्ध बड़े मुद्दे हैं। यदि भाजपा मेघालय की कांग्रेस सरकार के प्रति लोगों के आक्रोश को सही तरीके से भुना पाई तो कांग्रेस के लिए चुनाव जीतना न सिर्फ टेढ़ी खीर हो सकता है, बल्कि उसका पूरा पत्ता ही साफ हो सकता है।

वर्तमान में दलगत स्थिति

राज्य में कुल 1830104 मतदाता हैं। वर्तमान में 60 सीटों वाले विस में कांग्रेस के 24,  यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी) के 7, हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (एचएसपीडीपी) के 4, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के 2, भाजपा के 2, नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के 2, नार्थ ईस्टर्न स्टेट्स डेमोक्रेटिक पार्टी (एनईएसडीपी) का 1, निर्दलीय 9 विधायकों के अलावा 9 विधानसभा की सीटें खाली हैं। जिसमें एक दर्जन से अधिक विधायकों ने अपना पाला बदलते हुए भाजपा और एनपीपी का दामन थाम लिया है।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here