महान तीर्थ स्थलों में शुमार गंगासागर में समरसता का भाव और आस्था का मिलन अपने आप में अद्वित्तीय है। इसके चलते हर वर्ष माघ मास में लाखों तीर्थयात्री यहां की पवित्र लहरों में मुक्ति की कामना करते हैं।जब भगवान शिव ने गंगाजी को अपनी जटा में धारण करना स्वीकार किया तब गंगा पृथ्वी पर आयीं और राजा भागीरथ के दिखाये मार्ग से होते हुए सागर में विलीन हुर्इं। जिस स्थान पर गंगा का सागर में विलय हुआ वही स्थान बाद में गंगासागर के नाम से विख्यात हुआ।

 


मारे देश में मकर संक्रांति के मौके पर गंगासागर स्नान की अहमियत से बहुत कम लोग ही नावाकिफ होंगे। विशेष तौर पर उत्तर भारतीयों में गंगासागर स्नान को लेकर वषोँ से जो आस्था नजर आती रही है वह अपने आप में अद्भुत है।  ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’ यह लोकोक्ति भारतीय जनमानस में इस कदर रच-बस चुकी है कि लोग अपने जीवन काल में कम से कम एक बार गंगासागर में स्नान कर पापमुक्त होने के लिये सदैव लालायित रहते हैं। यही वजह है कि मकर संक्रांति के दौरान चार-पांच दिनों तक पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित सागर द्वीप का नजारा देखते ही बनता है। देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले साधु-संतों और श्रद्धालुओं का रेला कोलकाता के रास्ते जब सागरद्वीप की ओर प्रस्थान करता है तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

गंगासागर हिन्दुओं के महान तीर्थ स्थलों में शुमार होता है। सागर की लहरों के साथ गंगा नदी के पवित्र संगम स्थल पर मकर संक्रांति के पावन मुहूर्त में स्नान की आकांक्षा लिए देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लाखों की तादाद में श्रद्धालु यहां पहुंचे । विगत 14 व 15 जनवरी को 20 लाख से अधिक लोगों ने गंगासागर में डुबकी लगा कर एक अनोखी तृप्ति का अनुभव किया। श्रद्धालुओं के सुविधार्थ राज्य सरकार ने हर तरह के इंतजाम कर रखे थे। राज्य सरकार के तीन मंत्री सुब्रत मुखर्जी, अरुप राय एवं फिरहाद हाकिम हफ्ते भर तक मेला प्रांगन में डटे रहे। मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की तकलीफ ना हो इसके लिये प्रशासन की तरफ से हरसंभव  कोशिशें की गई। हालांकि मुख्यमंत्री की ओर से की गई कुछ राजनीतिक टिप्पणियों की वजह से माहौल में थोड़ी तल्खी जरूर उत्पन्न हुई। जिससे कुछ समय के लिये भक्ति भरे माहौल में राजनीतिक कड़ुवाहट घुल गई, लेकिन आस्था और भक्ति के सैलाब में सारी कड़वाहटें बह गई। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को मुख्यमंत्री के बयान से भला क्या लेना था।

महान तीर्थ स्थलों में शुमार गंगासागर में समरसता का भाव और आस्था का मिलन अपने आप में अद्वित्तीय है। इसके चलते हर वर्ष माघ मास में लाखों तीर्थयात्री यहां की पवित्र लहरों
में मुक्ति की कामना करते हैं।

कड़कड़ाती सर्दी में सर्द हवा के थपेड़ों के बीच भी सागर में डुबकी लगाने वालों के चेहरे पर अदभुत रौनक नजर आ रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उन्होंने अपने जीवन का परम लक्ष्य हासिल कर लिया हो। पुण्य स्नान का यह सिलसिला 15 जनवरी को दोपहर तक चलता रहा। स्नान के बाद पूजा-अर्चना के लिये लोग कपिल मुनि आश्रम का रुख किया जिससे देखते ही देखते वहां लंबा कतारें लग गई।

जब भगवान शिव ने गंगाजी को अपनी जटा में धारण करना स्वीकार किया तब गंगा पृथ्वी पर आयीं और राजा भागीरथ के दिखाये मार्ग से होते हुए सागर में विलीन हुर्इं। जिस स्थान पर गंगा
का सागर में विलय हुआ वही स्थान बाद में गंगासागर के नाम से विख्यात हुआ।

मोक्ष की अभिलाषा

आम तौर पर  लोग मोक्ष प्राप्ति व पाप से मुक्ति पाने की अभिलाषा लेकर गंगासागर पहुंचते हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिए गंगासागर में गोदान करने की पुरानी परम्परा रही है। इस साल भी श्रद्धालुओं ने इस परम्परा का निर्वहन किया। 13 जनवरी की सुबह से ही मेला प्रांगण में गोदान की अकांक्षा रखने वाले श्रद्धालु गायों की तलाश में व्यस्त नजर आये। स्थानीय गौपालक हर साल इस मौके का भरपूर लाभ उठाते हैं। इस साल भी लोग अपनी गायें लेकर गंगासागर पहुंचे थे। यहां उन्हें सामान्य से अधिक कीमत मिल जाती है। गोदान की वजह से पुरोहितों के भी पौ-बारह हो जाते हैं। पुरोहित एक व्यक्ति का गौदान कराने के बाद वही गाय दूसरे यजमान को बेच देते हैं और इस तरह एक ही गाय कई लोगों के मोक्ष का साधन बन जाती है। ऐसी मान्यता है कि जो यहां पर गाय दान करते हैं वे पाप और पुण्य के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

कठिन यात्रा

कोलकाता से गंगासागर की दूरी भले ही बहुत अधिक ना हो लेकिन जटिल भौगोलिक स्थिति के चलते गंतव्य तक पहुंचने में लोगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कोलकाता और हावड़ा से करीब 90 किमी की यात्रा सड़क अथवा रेलमार्ग से करने के बाद श्रद्धालु दक्षिण 24 परगना जिले के काकद्वीप के नजदीक हारवुड प्वार्इंट पहुंचते हैं। वहां से मुडी गंगा नदी पार कर आगे बढ़ना होता है। नदी पार करने के लिये प्रशासन  की तरफ से नावों व स्टीमरों के पर्याप्त इंतजाम होने के बावजूद भारी भीड़ की वजह से लंबी कतारें लग जाती हैं, जिससे नदी पार करने में काफी वक्त लग जाता है। नदी पार करने के बाद कचुबेडिया से सड़क मार्ग के जरिये करीब 30-40 मिनट की यात्रा करनी पड़ती है। सामान्य दिनों में कोलकाता से गंगासागर तक का सफर चार से पांच घंटे का होता है लेकिन मकर संक्रांति के दौरान वहां पहुंचने में 10-12 घंटे लग जाते हैं। तीर्थयात्रियों के लिए सरकार की ओर से हर साल परिवहन की विशेष व्यवस्था की जाती है। इसके तहत 10 से 15 जनवरी के बीच  कोलकाता और हावड़ा के कई स्थानों से बस, लॉन्च और स्टीमर चलाये जाते हैं। इस बार राज्य परिवहन निगम की और से गंगासागर तीर्थयात्रियों के लिए कुल 1300 बसें चलाई गई। नदी पार करने के लिये कचुबेड़िया में चार अस्थायी जेटी बनाये गये थे।  यात्रियों की भारी भीड़ को देखते हुए नदी में 30 स्टीमर काम पर लगाये गये थे। दूसरी तरफ बंगाल लॉन्च आॅनर एसोसिएशन की तरफ से नामखाना-चेमागुड़ी व बेनूबन के बीच करीब सौ लॉन्च चलाये गये। इसी के साथ कोलकाता के बाबूघाट से लेकर मेला प्रांगण तक 500 सीसीटीवी कैमरे निगरानी के लिये लगाए गए थे। इसके अलावा 6 ड्रोन हेलीकाप्टरों के जरिये चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही थी। इस साल पहली बार श्रद्धालुओं को नदी पार कराने के  लिए जीपीएस पद्धति का प्रयोग किया गया। नदी में चलने वाले सभी पोतों को कंट्रोल रूम से नियंत्रित किया जा रहा था।

स्वयंसेवी संस्थाएं

हर बार की तरह इस बार भी कुछ सामाजिक संस्थायें गंगासागर यात्रियों की सेवा में जुटी रहीं। विश्व हिन्दू परिषद, भारत सेवाश्रम संघ, बजरंग परिषद जैसी कई संस्थायें निस्वार्थ भाव से पुण्यार्थियों की मुश्किल आसान बनाने की कोशिश करते दिखे।  बजरंग परिषद् के  सचिव प्रेमनाथ दुबे ने बताया उनके पिता हीराप्रसाद दुबे ने संगठन की स्थापना की थी। उनकी आयु 95 वर्ष हो चुकी है। इसलिए वे इस बार यहां नहीं आये। उनकी गैरमौजूदगी में वे खुद सारी व्यवस्था संभाल रहे हैं। पेशे से राजस्थान विद्या मंदिर के शिक्षक प्रेमनाथ ने बताया कि नौ जनवरी को परिषद का शिविर शुरू हुआ। सेवा कार्य में करीब दो सौ स्वयंसेवक उनके साथ दिन-रात परिश्रम करते रहे। संस्था के संयोजक मनोज चंदोरिया ने बताया कि श्रद्धालुओं के लिये चाय-बिस्कुट से लेकर नाश्ता, भोजन, दवाई जैसी सभी आवश्यक चीजें उनकी तरफ से निशुल्क मुहैया कराईगईं। बजरंग परिषद् की भांति भारत सेवाश्रम संघ के कार्यकर्ता भी  पुण्यार्थियों की सेवा में लगे रहे। भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापकों में गिने जाने वाले निमाई महाराज दिन में 18 घंटे तक सेवाकार्य में जुटे रहते हैं। विश्व हिन्दू परिषद की तरफ से हर साल की तरह इस बार भी श्रद्धालुओं के लिये कोलकाता के आउट्राम घाट एवं गंगासागर दोनों स्थानों पर  अस्थायी कैंप लगाये गये थे जहां श्रद्धालुओं के लिये विश्राम से लेकर चाय, नाश्ता, भोजन, चिकित्सा जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थी।  इसके साथ ही बीएसएनएल (शोभाबाजार) के महाप्रबंधक एवं समाजसेवी सुरजेन्द्र कृष्ण देव  समेत  कई अन्य लोग  व्यक्तिगत रूप से घाट पर पुण्यार्थियों की सेवा करते नजर आये। सुरजेन्द्र देव ने बताया कि वे पुण्य अर्जित करने के इस अवसर को कभी नहीं छोडते और हर साल मकर संक्रांति के मौके पर यहां पहुंच कर पुण्यार्थियों की सेवा में लग जाते हैं। उन्होंने बताया की बीएसएनएल की ओर से गंगासागर मेले की संचार व्यवस्था के लिए प्रशासन को 16 सेटैलाइट फोन दिए गए हैं जिनके संचालन की जिम्मेदारी वे खुद संभाल रहे हैं।

आध्यात्मिक महातम्य

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार गंगासागर का इतिहास सूर्य वंश के दसवें राजा सगर से जुड़ा हुआ है। राजा सगर की दो रानिया सुमति और केशिनी थीं। सुमित से सगर को साठ हजार पुत्र हुए जबकि केशिनी ने असमंजस नामक एक पुत्र को जन्म दिया। बाद में असमंजस ने भी एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम अंशुमान रखा गया। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो भगवान इंद्र ने इसे अपनी सत्ता के लिये खतरा मानते हुए अश्वमेध के घोड़े को पकड़ लिया और महात्मा कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। राजा सगर ने अश्वमेध घोड़े की तलाश में अपनी पहली रानी सुमति के 60 हजार पुत्रों को रवाना किया लेकिन समूचे पृथ्वी का भ्रमण करने के बाद भी उन्हें घोड़ा नहीं मिला। अन्त में कपिल मुनि के आश्रम में घोड़ा देख कर राजा सगर के 60 हजार पुत्र क्रोधित हो उठे और उन्होंने कपिल मुनि की तपस्या में विघ्न डाला। इससे उन्होंने क्रोधित होकर अपनी आंखें खोली तो राजा सगर के सभी पुत्र मुनि की क्रोधाग्नि में जल कर भष्म हो गये। इसके बाद राजा सगर ने अपने पोते अंशुमान को घोड़े की तलाश में भेजा। अंशुमान ने अपनी दादी महारानी केशिनी के भाई भगवान गरूड़ की सहायता से कपिल मुनि के आश्रम से घोड़ा ढूंढ लिया और कपिल मुनि से क्षमा याचना करते हुए अपने साठ हजार पूर्वजों के उद्धार का मार्ग पूछा। कपिल मुनि ने उन्हें बताया कि जब गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण होगा तब उस जल में तर्पण करने से उसके पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलेगी। उसके बाद से अंशुमान अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिये तपस्या करने लगे। बाद में उनके पुत्र दिलीप ने भी तपस्या जारी रखी लेकिन कामयाबी तीन पीढ़ी के बाद दिलीप के पुत्र भागीरथ को मिली। जब भगवान शिव ने गंगाजी को अपनी जटा में धारण करना स्वीकार किया तब गंगा पृथ्वी पर आयीं और राजा भागीरथ के दिखाये मार्ग से होते हुए सागर में विलीन हुर्इं। जिस स्थान पर गंगा का सागर में विलय हुआ वही स्थान बाद में गंगासागर के नाम से विख्यात हुआ। कहा जाता है कि जिस प्रकार भागीरथ ने गंगा के स्पर्श से अपने पूर्वजों का उद्धार किया उसी तरह  मकर संक्रांति के पावन मुहूर्त में गंगासागर में स्नान करने वाला हर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। गंगासागर मेला सही मायनों में धार्मिक आस्था का बेजोड़ उदाहरण है। इसके साथ ही यहां सामाजिक समरसता और सेवा भाव की जो तस्वीर नजर आती है वह अपने आप में अद्वितिय है। संक्षेप में कहा जाये तो गंगासागर मेला भारतीय सनातन संस्कृति की सच्ची तस्वीर पेश करता है।

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