गालैंड विधानसभा चुनाव के समीकरण काफी तेजी से बदल रहे हैं। पूर्वोत्तर के एक राज्य में सरकार बना चुकी भारतीय जनता पार्टी के लिए असम जैसे ही हालात बनते नजर आ रहे हैं। हालांकि ईसाई जनसंख्या बहुल इस राज्य में भाजपा के लिए डगर काफी कठिन है। प्रत्येक दिन विभिन्न पार्टियों को छोड़कर भाजपा में शामिल होने की नेताओं में होड़ देखी जा रही है। ऐसे में भाजपा यह विचार कर रही है कि  नेशनल पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के साथ तालमेल करने का निर्णय सही था या नहीं। हालांकि, कोहिमा में एनपीफ की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में तालमेल पर फिर से विचार हुआ, पर फैसला नहीं हो सका।

नगालैंड के मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से ही भाजपा से तालमेल करने के पक्ष में दिख रहे हैं। जबकि इसके अध्यक्ष शुरहोजेली लिजित्सू हमेशा ही भाजपा के साथ तालमेल का विरोध करते रहे हैं। हालांकि  अध्यक्ष शुरहोजेली लिजित्सू के लिए भी भाजपा का साथ छोड़ने का निर्णय लेना जोखिम भरा सौदा बनता जा रहा है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो पहले से ही भाजपा से निकटता रख रहे हैं और अभी भी अपने नवगठित दल के साथ भाजपा से पींगें बढ़ा रहे हैं।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तथा नगालैंड के प्रभारी राममाधव ने डिमापुर में पार्टी के एक विशाल समारोह में भाग लिया। इस समारोह के दौरान राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा वरिष्ठ कांग्रेसी नेता केएल चिशी, राज्य के पूर्व निर्दलीय विधायक जैकब झिमोमी के साथ ही एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ नेता भाजपा में शामिल हो गए। इस दौरान राममाधव ने सभी नेताओं का स्वागत करते हुए कहा कि भाजपा सभी नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल रखी है।

उन्होंने कहा कि राज्य के उजार्वान युवक इस चुनाव में पार्टी का टिकट लेने के लिए आगे बढ़कर सामने आ रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आस्था दिखाते हुए भाजपा में शामिल हो रहे हैं। राममाधव ने विभिन्न पार्टियों के सभी वरिष्ठ नेताओं से अपील की है कि वे भाजपा के इस मुहिम में शामिल होकर राज्य के विकास का मार्ग प्रशस्त करें। अपने 20 मिनट के संबोधन में भाजपा महासचिव ने एक वर्ष पहले एनपीएफ के साथ किए गए तालमेल को समय से पहले उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा कि एनपीएफ को छोड़कर जो नेता भाजपा में शामिल हुए हैं, उनके लिए मुश्किल खड़ी होगी।  उन्होंने यह भी कहा कि एनपीएफ के साथ चुनावी तालमेल को अंतिम रूप दिया जाना अभी भी बाकी है। इससे जाहिर होता है कि भाजपा चुनाव में एनपीएफ के साथ कोई तालमेल नहीं करेगी।

राम माधव ने ‘इलेक्शन फॉर सोल्यूशन’ यानी सुधार के लिए चुनाव का नारा दिया। साथ ही अनेक नगा संगठनों से नगालैंड की समस्याओं से संबद्ध पत्र लिए। उन्होंने कहा कि नगा नेता स्वयं भाजपा में शामिल होकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपने राज्य की समस्याओं का समाधान करें। उन्होंने कहा कि नगा समस्या प्राय: समाधान तक पहुंच चुकी है। उससे पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।  चुनाव में टिकट मांगने वाले सभी नेताओं को भाजपा के स्टेट इलेक्शन मैनेजमेंट कमेटी से संपर्क करने को कहा गया है। इस कमेटी के पास प्रत्येक दिन बायोडाटा का पुलिंदा जमा हो रहा है। इधर नगा होहो (एनएच) नामक संगठन राज्य में हो रहे चुनाव के बिल्कुल विरुद्ध है। वह इस चुनाव का बहिष्कार कर रहा है। एनएच नेता बीते 17 जनवरी से नई दिल्ली में ही जमे हुए हैं। छह नगा पॉलिटिकल ग्रुप के साथ ही एनएससीएन (आई-एम) के संपर्क में भी हैं। ये नेता केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में हैं कि नगा समस्याओं के स्थाई समाधान तक नगालैंड में चुनाव को स्थगित रखा जाए। इस सिलसिले में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी मिल चुके हैं। और, केंद्र सरकार और नगाओं के साथ मध्यस्थता कर रहे आरएन रवि तथा अन्य पदाधिकारियों से मुलाकात करने वाले हैं। इनका कहना है कि चुनाव हो गए तो फिर नगा समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा।

इधर राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट पार्टी तथा कांग्रेस पार्टी चुनाव में अपनी सारी ताकत लगा रही है। भाजपा में जिस प्रकार से नेताओं के शामिल होने की होड़ लगी हुई है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इन पार्टियों की स्थिति इस चुनाव में सुधारना मुश्किल ही है।

राज्य में चुनाव की तैयारियां अपने शबाब पर हैं। सभी जिलों के उपायुक्त तथा जिला निर्वाचन पदाधिकारी प्रत्येक दिन चुनाव को लेकर बैठक आयोजित कर रहे हैं। आईपीसी की धारा 144 ए के तहत सभी हथियार रखने वालों से कहा गया है कि वे 3 फरवरी के अंदर अपने-अपने हथियारों के लाइसेंस का वेरिफिकेशन कराने अपने नजदीक के थाने में पहुंचें। यदि कोई यह नहीं करा पाया तो उसके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएंगे। चुनाव पदाधिकारी द्वारा स्थानीय प्रिंटिंग प्रेसों को निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी पोस्टर, पंप्लेट या अन्य सामग्री की छपाई बगैर उसके पते और समुचित पहचान पत्र के बिना न करें। चुनाव में खर्च की निगरानी के लिए विशेष तैयारियां की गई है। जिलों के नोडल आॅफिसरों को ट्रेनिंग दिया गया है। जो अपने क्षेत्र के पोलिंग और प्रजाइडिंग आॅफिसरों को प्रशिक्षित करेंगे कि चुनाव के दौरान किस तरह से कार्य निष्पादित किए जाएं। राज्य के सीमावर्ती जिलों को विशेष रूप से सतर्क किया गया है कि सीमा पार से आकर चुनाव के दौरान कोई गड़बड़ी ना फैला सकें। सीमाओं को सील करने के लिए भी कहा गया है।

विधानसभा की स्थिति

विधानसभा में सदस्यों की संख्या 60 है। इनमें  59 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित हैं। पिछली बार हुए चुनाव में कुल 60 विधानसभा सीटों में से एक सीट पर भाजपा, 8 पर निर्दलीय, 8 पर कांग्रेस, 1 पर जेडीयू, 38 पर एनपीएफ तथा 4 पर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने जीत हासिल की थी। हालांकि बाद में एनसीपी के सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। राज्य में 27 फरवरी को मतदान होगा तथा 3 मार्च को मतों की गिनती की जाएगी।

जनजातियों की स्थिति

राज्य में 88 फीसद मतदाता क्रिश्चियन धर्मावलंबी हैं। राज्य में जेलियांग भाषा-भाषी काफी कम हैं। इनकी आबादी 3.06 फीसद ही हैं। आओ 11.91 फीसद, कोन्याक 11.46 फीसद, लोथा 7.44 फीसद, अंगामी 6.58 फीसद, फोम 5.13 फीसद, सुमी 10.67 फीसद, इमचुंगरे 4.6 फीसद, संगतम 4.22 फीसद, चक्रु 4.17 फीसद, चांग 3.11 फीसद, रेंगमा 2.91 फीसद तथा 23.75 फीसद अन्य भाषा भाषी लोग राज्य के मतदाता हैं।

इस बार एक दर्जन से अधिक पार्टियां चुनाव मैदान में हिस्सा लेंगी। इसमें नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीपी), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), जनता दल (यूनाइटेड), नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी), नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), आम आदमी पार्टी (आप), नगालैंड रिफार्मेंशन पार्टी समेत कुछ ऐसे राजनीतिक दलों के कुछ नाम हैं, जो उम्मीदवारों के लिए टिकट जारी करने की प्रक्रिया में  हैं। इन पार्टियों के अलावा, कई अन्य पार्टियां अपने उम्मीदवारों के साथ चुनाव मैदान में उतर चुकी हैं। बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार भी अपना भाग्य आजमाएंगे।

विधानसभा राज्य

नगालैंड का गठन 1 दिसंबर, 1963 को हुआ था।  पहले विधानसभा में कुल 46 सीटें थी, जिसमें से 40 पर ही चुनाव हुआ करते थे। त्वेनसॉन्ग जिला को 6 सीटें दे दी गई थी, जो रीजनल काउंसिल के सदस्यों द्वारा चुनी जाती थी। दूसरे विधानसभा चुनाव में यह संख्या बढ़कर 52 हो गई। आखिरकार सन 1974 में नगालैंड राज्य में कुल 60 विधानसभा सीटें गठित कर दी गईं।

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