आमेर का किला अब केवल राज परिवारों के रहने की जगह नहीं रहा, बल्कि यह इतिहास समझने और परखने की जगह भी है। मुगलों के साथ राजपूताना संपर्क और संघर्ष, उनकी साझेदारी, उनका कला-संस्कृति के प्रति आदान-प्रदान जाननेके लिए यहां एक बार अवश्य आना चाहिए।


मेर का किला अब केवल राज परिवारों के रहने की जगह नहीं रहा, बल्कि यह इतिहास समझने और परखने की जगह भी है। मुगलों के साथ राजपूताना संपर्क और संघर्ष, उनकी साझेदारी, उनका कलासंस्कृति के प्रति आदानप्रदान जाननेके लिए यहां एक बार अवश्य आना चाहिए।

एक किला या दुर्ग घूमना मानो अपनी आंखों से इतिहास देखना। आमेर का किला देखते हुए दर्शक यही अनुभूति लेकर इससे बाहर निकलता है। और कई दिनों तक राजारानी के किस्सों में खोया रह सकता है। वह इसलिए, क्योंकि किले अनगिनत किस्सोंकहानियों के गढ़ बन चुके है। जितनी मजबूत इनकी गढ़न है, उसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यहां की बातें कई फीट नीचे रहने वाली रियाया तक पहुंचती होंगी, वहां तक तो यह सभी बातें कहानियों और किस्सों के रूप में ही पहुंचती होगी। यहीं कारण है यहां पर्यटकों को गाइड ऐसे ही किस्सों को थोड़ा मसाला लगाकर रुचिकर बना सुनातेघुमाते चलते हैं। वरना एकड़ों में फैला किला घूमना इतना आसान नहीं होता है।

आमेर का किला या आंबेर दुर्ग जयपुर से 11 किलोमीटर आमेर नामक कस्बे में हैं। यह किला अरावली की सुरम्य पहाड़ियों पर स्थित अभेद दुर्ग है। इस कस्बे पर 1550 . में कछवाहा राजपूत मानसिंह प्रथम का शासन था, इसी दौरान इस दुर्ग का निर्माण कराया गया। यह किला अपनी हिन्दू वास्तु शैली के लिए जाना जाता है। वैसे इस किला निर्माण में मुगल कला शैली का पूरा प्रभाव देखा जा सकता है। इसका कारण राजपूतमुगल संबंधों के रूप में भी देखा जा सकता है। राजपूतों के साथ मुगलों ने जो भी राजनीतिक और सामाजिक संबंध स्थापित किए वे कला की दृष्टि से उनके भवन निर्माण में परिलक्षित होते हैँ। इस किले की विशाल प्राचीर, दरवाजे, ऊंचाई की ओर बढ़ते पथरीले रास्ते और पहाड़ी के नीचे स्थित मावठा सरोवर इसे हर कोण से दर्शनीय बनाता है। लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का काम पूरे दुर्ग में देखा जा सकता है। अंदर की भवनों का निर्माण चूना पत्थर से भी किया गया है।

दुर्ग में पहले दरवाजे सूरज पोल से प्रवेश के साथ ही आप विशाल प्रांगण में अपने आप को पाते हैं। इस प्रांगण से मुख्य किले में प्रवेश करते हैं। इसके लिए सिंह पोल पहला वास्तविक गेट है। इसमें प्रवेश के बाद ही किले के अंदर की चीजों को देखा जा सकता है। इसमें प्रवेश के बाद ही किले में स्थित दीवानआम, दीवानखास, शीश महल और सुख निवास देखे जा सकते हैं। सुख निवास राजस्थान की तपती दोपहरी में शीतलता के झौकों का अनूठा उदाहरण लगा। ऐसा नहीं है कि इस किले का पूरा निर्माण कछवाहों ने ही करवाया है। कछवाहों के शासन से पहले यहां मीणाओं का शासन था। उसी को आधार बनाकर राजामान सिंह प्रथम ने यहां निमार्ण कार्य करवाया। राजा मानसिंह के बाद उनके पुत्र जयसिंह ने सिंह पोल और गणेश पोल यानी द्वारों का निर्माण कराया।

सिंह पोल

जलेब चौक से मुख्य महल में प्रवेश करने के रास्ते में सिंह पोल स्थित है। इसका निर्माण सवाई जय सिंह 1699-1743 में करवाया गया था। सिंह शक्ति का प्रतीक है इसलिए वास्तुशास्त्र में मुख्य द्वार भी कहा जाता है। दीवारों पर सुंदर चित्रकला से युक्त इस दरवाजे में प्रवेश निकास सीधी रेखा में होना सुरक्षा के मद्देनजर किया गया। इससे महल पर आक्रमण करने वाली सेना के पिछले भाग पर महल के सुरक्षाकर्मी ऊपर से हमला कर सकते थे। सिंह पोल की ऊपरी मंजिल पर पहरेदार नियुक्त रहा करते थे।


दीवान
आम

यह राजा का मुख्य दरबार कक्ष था जहां वे अपने प्रजा, सभासदों एवं अधिकारी वर्ग से मिलते थे। इसकी बनावट मुगलकालीन महलों से मिलती जुलती है। विशेष अवसरों यथा विजयोत्सव, दशहरा, जन्मदिन आदि पर शाही समारोह यही मनाए जाते थे। लाल बलुआ पत्थर तथा संगमरमर से बनी इस इमारत का निर्माण मिर्जा राजा मान सिंह 1589-1614 में करवाया था। स्तम्भों एवं छज्जों पर गज मस्तक बेलबूटों को आकर्षक रूप में उकेरा गया है, जोकि मुगल एवं राजपूत शैलियों की विशेषताओं का सुंदर समंवय है। विशिष्ट प्रकार की छत को स्तम्भों की दो पंक्तियों पर बनाया गया है, जिनमें बाहरी स्तम्भ संयुक्त प्रकार के होकर लाल बलुआ पत्थर के हैं। भीतरी पंक्तियों के स्तम्भ संगमरमर से बने हैं।

गणेश पोल

सुंदर भित्ती चित्रों के अंकन युक्त गणेश पोल आंबेर महल के अंदर के भागों का प्रवेश द्वार है। इसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने 1621-67 में करवाया था। भगवान गणेश को दैनिक जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने वाला देवता माना जाता है। इसलिए परम्परानुसार भवन के मुख्य द्वार पर भगवान गणेश को स्थापित किया जाता है। गणेश पोल के प्रथम तल पर सुहाग मंदिर है जिसकी जालियों के पीछे से रनिवास की महिलाएं दीवानआम में होने वाले राजकीय कार्यक्रमों को देखा करती थीं।

रसोड़ा

महल में दो स्थानों पर रसोईघर थे, एक भोजनशाला के निकट और दूसरा महल के बाहर पश्चिम भाग में त्रिपोलिया गेट समीप। भोजनशाला में राजा, उनके मित्रों तथा मेहमानों के लिए पहले रसोईघर में भोजन बनता था। दूसरा रसोईघर में कार्यरत सहायकों के लिए काम में आता था। कुशल रसोइयों द्वारा बनाए भोजन में शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों ही प्रकार के व्यंजन शामिल थे। इन्हें पकाने के लिए कई मुंह वाले चूल्हे प्रयोग होते थे।

सुख मंदिर

यह भाग ग्रीष्मकाल में दिन के समय शाही परिवार के आराम करने के काम आता था। सफेद संगमरमर से बने इस भवन की दीवारों में सफेद प्लास्टर का उभरा कार्य मुगल कला द्योतक है। भवन के पीछे की दीवार में संगमरमर का एक जालीदार झरना बनाया गया है, जो खुली हुई नहर से जुड़ा है। भवन की छत पर बनी टंकी से इस झरने में पानी बहता था जिससे यह भवन ठंडा रहता था। इसमें बने दोनों कमरों के दरवाजे चंदन की लकड़ी से निर्मित हैं, जिन पर हाथी दांत की पच्चीकारी का काम किया हुआ था। इन दरवाजों को सुरक्षा के अभाव में काफी नुकसान पहुंचाया जा चुका है, अब यह क्षतिग्रस्त अवस्था में ही देखने को मिलते हैं।

 

जनानी ड्योढी

दुर्ग के इस हिस्से में प्रमुख आकर्षण मानसिंह का महल है। यहां पर राजारानियों के रहने के लिए भवनों का निमार्ण किया गया था। इस महल को बनाने में मानसिंह प्रथम को 25 साल लगे। इस हिस्से में मानसिंह ने अपने लिए महल का निमार्ण ऊपर की ओर और विभिन्न रानियों के लिए नीचे से ऊपर दो मंजिला भवन का निमार्ण कराया था। कहा जाता है किमानसिंह की बारह रानियां थीं। इस परिसर के बीच में बारह दरी का निमार्ण किया गया है, जहां राजा अपनी रानियों के साथ सामुहिक रूप से मनोरंजन या बातचीत करते थे। मानसिंह भवन से प्रत्येक रानी के भवन के लिए एक गलियारे का निर्माण किया गया है, जिसके द्वारा राजा जब चाहता था अपनी मर्जी से किसी भी रानी के भवन में चला जाता था। इस बात की खबर बाकी रानियों को नहीं होती थी।


सुरंग

जयगढ़ दुर्ग जाने के लिए आमेर के किले से सुरंग बनाई गई है। इसका उपयोग सुरक्षा तथा महल में गुप्त रूप से प्रवेश एवं निकास के लिए किया जाता था। आमेर महल के पश्चिम भाग में यह सुरंग जयगढ़ तक जाती है। यह रंग महल के कुछ पहले तक भूमिगत है। इसके बाद यह भूमि की सतह से ऊपर जाती है। महल क्षेत्र में यह सुरंग वस्तुत: महल की पश्चिमी मुख्य दीवार की नींव भी बनाती है। इसमें मानसिंह महल, दीवानखास और जनानी ड्योढ़ी भागों से प्रवेश करने के लिए रास्ते बने हुए हैं।

हम्मामशौचालय की विशिष्ट व्यवस्था

अरबी भाषा के हम्माम शब्द का इस्तेमाल स्नानघर के लिए किया जाता है। सभी महलों एवं किलों में हम्माम की सामान्यत व्यवस्था हुआ करती थी। आमेर महल में दीवानखास की उत्तरी दिशा में स्थित इस हम्माम में राजा राजपरिवार के सदस्य स्नान किया करते थे। इसमें ठंड गरम पानी के लिए अलगअलग हौज बने हैं। कपड़े बदलने तथा मालिश करवाने के कक्ष भी यहीं बने हैं। पास में शौचालय है। हम्माम के बाहरी भाग में पानी गरम करने के लिए कलात्मक चिमनी बनी हुई है। हम्माम में जाने के लिए शीशमहल से भी सीधा रास्ता है। बहुरंगी अराइश से सजा यह हम्माम तत्कालीन वास्तुशैली का सुंदर उदाहरण है। महल के विभिन्न भागों में शौचालय बने हुए हैं। शीशमहल एवं मानसिंह महल के मध्य स्थित शौचालय राजा और राजपरिवारों के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लिए जाते थे। इनमें गरम ठंडे जल की आपूर्ति की व्यवस्था के साथसाथ रोशनी के लिए मशाल लगाने की भी व्यवस्था है। महल में कुल मिलाकर इस प्रकार के 99 शौचालय है।

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