सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि इज्जत और परंपरा के नाम पर की जाने वाली हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस पर लगाम देने के लिए न्यायालय पुलिस अधिकारियों की एक टीम के गठन पर विचार कर रही है।


र्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर कहा है कि दो वयस्क अपनी इच्छा से शादी करते हैं तो उसमें किसी तीसरे को बोलने का अधिकार नहीं है। तीसरे का मतलब लड़की या लड़के के घर वाले और खाप जैसे जातीय संगठन से है, जो गोत्र के अंदर या जाति, धर्म की सीमा से बाहर जाकर शादी करने पर एतराज करते हैं। परिवार की इज्जत और परंपरा के नाम पर कई बार उनकी हत्या भी कर दी जाती है। न्यायालय ने साफ कर दिया कि अगर आवश्यक हुआ तो इस तरह के मामलों से निपटने के लिए वरीय पुलिस अधिकारियों की एक समिति भी गठित की जा सकती है। उधर केंद्र सरकार इसको रोकने के लिए कानून लाने पर विचार कर रही है।

साल 2010 में शक्ति वाहिनी नामक संस्था ने जनहित याचिका दायर कर परिवार की इज्जत और परंपरा के नाम पर होने वाली हत्याओं पर रोक लगाने की मांग की थी। उसी पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, एएम खनविलकर और डीवाइ चंद्रचूड़ की पीठ ने 5 फरवरी को यह टिप्पणी की। परिवार की राय के खिलाफ जाकर शादी करने वाले युवाओं के साथ होने वाली हिंसा पर नाराजगी जताते हुए न्यायालय ने सरकार और याचिका करने वाली संस्था से कहा कि वह इज्जत के नाम पर होने वाली इस तरह की हत्याओं को रोकने के लिए प्रभावी उपाय सुझाये। अतिरिक्त सालिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने जब इस पर सुझाव देने के लिए एक बार फिर दो सप्ताह का समय मांगा तो सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए न्यायालय ने कहा कि केंद्र इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रहा है।

न्यायालय ने खाप को भी चेताया कि वह इससे दूर रहे। ‘‘शादी कानूनन वैध है या नहीं यह तय करना न्यायालय का काम है।’’ न्यायालय ने साफ कर दिया कि यह कानून और व्यवस्था का मामला है और इस तरह के मामलों को कानून और न्यायालय ही देखेगा। यह किसी व्यक्ति या समाज का काम नहीं है। इस मामले में मधु किश्वर ने अपना पक्ष रखते हुए न्यायालय से कहा कि इस तरह की जघन्य हत्याओं को इज्जत के लिए की जाने वाली हत्या कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि महज 3 फीसदी अपराध सगोत्र शादी करने वालों के साथ हुआ है। बाकी सारे अपराध जाति और धर्म के नाम पर किये जाते हैं। उन्होंने दिल्ली के अंकित सक्सेना की हत्या का उदाहरण देते हुए कहा कि इस तरह की हिंसा को रोकने के लिए कठोर कदम उठाये जाने की आवश्यकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि इज्जत और परंपरा के नाम पर की जाने वाली हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस पर लगाम देने के लिए न्यायालय पुलिस अधिकारियों
की एक टीम के गठन पर विचार कर रही है।

इस मामले में न्यायालय की चिंता जायज है, क्योंकि इस तरह के मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है खराब बात यह है कि इसे जायज ठहराने की कोशिश की जाती है। उत्तर भारत खासकर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप और दक्षिण भारत में कट्टा इसके लिए सवालों के घेरे में हैं। हालांकि खाप के लोग बताते हैं कि वे नाहक ही बदनाम हैं। उनकी मानें तो वे सिर्फ उन नियमों के पालन की वकालत करते हैं, जो उनके पुरखे सदियों से मानते आए हैं। अगर कोई इससे बाहर जाकर अपने मन की करता है, तो जातीय पंचायत उनसे नाता तोड़ लेता है। इसे आप सामाजिक बहिष्कार कह सकते हैं।

खाप का पक्ष रखते हुए नरिंदर हुडा ने अदालत से भी यही कहा। उन्होंने बताया कि खाप दूसरी जाति या धर्म में विवाह के खिलाफ नहीं है। उसे सिर्फ सगोत्र विवाह पर एतराज है। खाप के लोगों ने इस संबंध में केंद्र सरकार से कानून में संशोधन के लिए भी कहा है। उनके अनुसार धार्मिक ग्रथों में भी इस तरह के विवाह की मनाही है। इसलिए हिंदू मैरेज एक्ट 1955 में संशोधन कर इस तरह के विवाह को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। इस मामले में होने वाली हिंसा से पल्ला झाड़ते हुए हुडा ने साफ कहा कि खाप कभी जाति या धर्म के पीछे नहीं जाता। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानून अपना काम करेगा। आप दखल देने वाले कौन होते हैं? नरिंदर हुडा ने जब कहा कि वे समाज की अंतरात्मा के रक्षक हैं, तो न्यायालय ने पूछा कि ‘आपको किसने नियुक्त किया।’ इससे पहले 10 जनवरी को न्यायालय ने राज्य और केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना पक्ष रखने को कहा था। तब इस मामले में एमिकस क्यूरी यानी न्यायालय की मदद के लिए नियुक्त अधिवक्ता राजू रामचंद्र ने चर्चित नितीश कटारा हत्याकांड में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए कहा था कि लड़की द्वारा चुने गये जीवन साथी के साथ मार-पीट करना जघन्य अपराध है। ना तो परिवार और ना ही किसी संस्था के सदस्य को यह अधिकार है कि वह ऐसा करे। उन्होंने न्यायालय को यह भी बताया कि विधि आयोग की 242 वीं रिपोर्ट में इसको रोकने के लिए प्रस्तावित कानून की चर्चा है और केंद्र सरकार इस पर राज्य सरकारों से विचार-विमर्श कर रही है।

उन्होंने कहा कि जब तक कोई कानून नहीं आता है, तब तक के लिए न्यायालय एक दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर सकता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि वर्तमान याचिका खाप के खिलाफ नहीं है।  

बहरहाल, यह अच्छी बात है कि न्यायालय इस तरह की हिंसा को लेकर गंभीर है, लेकिन इसे महज कानून और व्यवस्था का मामला मान लेना भी समस्या का सरलीकरण होगा। इज्जत के नाम पर होने वाली हत्याएं इसलिए नहीं हो रही हैं कि इस तरह के अपराध के लिए कोई कानून नहीं है, बल्कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारा समाज आज भी जाति और धर्म के दायरे से बाहर नहीं निकल सका है। ऐसे मामले तब तक कम नहीं होंगे, जब तक समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। बालियान खाप के नेता नरेश टिकैत ने जो कहा है, उसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। बता दें कि नरेश टिकैत ने कहा है कि अगर न्यायपालिका परंपराओं में हस्तक्षेप करेगा तो हम लड़कियों को जन्म देना बंद कर देंगे।

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