त्तराखंड के उच्च शिक्षण संस्थानों में आयोजित होने वाले दीक्षांत समारोहों में अब ब्रिटिश कल्चर दिखाई नहीं देगा। प्रदेश सरकार ने समारोहों से गाउन पहनने की अंग्रेजी परंपरा को खत्म कर दिया है। अब दीक्षांत समारोह में अंग्रेजी गाउन के स्थान पर भारतीय संस्कृति की झलक दिखाती पोशाक शामिल होगी। ड्रेस का डिजाइन भी तैयार कर दिया गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यपाल से इसे मंजूरी मिल जाने के बाद विश्वविद्यालय के एक्ट और आर्डिनेंस में शामिल कर कानूनी रूप दे दिया जाएगा।

संस्कृति की झलक

किसी भी समाज की पहचान का आधार उस समाज की संस्कृति से होता हैं जिसमें उस समाज के रीति-रिवाज, जीवन-शैली, खानपान, बोली-भाषा, परम्पराएं, सामाजिक और धार्मिक मान्यताएं, वेश-भूषा आदि सम्मलित होती हैं। देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति प्रदेश ही नहीं बल्कि देश दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। यहां की संस्कृति को युवाओं से जोड़ने और युवाओं को प्रदेश की परंपराओं से रूबरू कराने के मकसद से प्रदेश सरकार एक नई पहल करने जा रही है। प्रदेश सरकार ने प्रदेश भर के विश्वविद्यालयों में आयोजित होने वाले दीक्षांत समारोहों में उपयोग किए जाने वाले ब्रिटिश लिबास को हटाने का निर्णय लिया है। इसके बदले अब एक ऐसा परिधान तैयार किया जा रहा है जिसमें न सिर्फ भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिले, बल्कि उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति का भी समावेश होगा।

बयान के बाद हुई कवायद

बीते साल यूनिवर्सिटी आॅफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज के 15वें दीक्षांत समारोह में प्रतिभाग करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा था कि हमें अपने पूर्वजों, प्राचीन ज्ञान, संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। हमें अपनी जड़ों पर विचार करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि दीक्षांत समारोहों के अवसर पर पहने जाने के लिए ऐसा परिधान विकसित किया जाए जिसमें भारतीयता की झलक मिले। खास बात यह कि दीक्षांत समारोह के समय मुख्यमंत्री ने गाउन पहनने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था। इसके बाद से निरंतर इस दिशा में कार्य किया जा रहा था। नए परिधान तैयार करने के लिए कमेटियों का गठन भी किया गया। यह कमेटी विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को लेकर बनाई गई।

अंग्रेजियत की आती है बू

उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. रावत का कहना है कि दीक्षांत समारोह में गाउन पहनाना उपनिवेशवाद का प्रतीक है और इससे अंग्रेजियत की बू आती है। उन्होंने बताया कि फरवरी में मेडिकल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में पहली बार भारतीय और प्रदेश की संस्कृति वाले लिबास को पहना जाएगा। यह ड्रेस कोड सिर्फ डिग्री लेने वाले छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि समारोह के मुख्यातिथि से लेकर गेस्ट आफ आॅनर, चांसलर, वाइस चांसलर और शिक्षा निदेशक पर भी लागू होगा। यूजी, पीजी, गोल्ड मेडलिस्ट, पीएचडी, मानद उपाधि डी लिट, डिप्लोमा गोल्ड मेडलिस्ट सभी के लिए अलग परिधान डिजाइन किए गए हैं।

तैयार किया परिधान

इस विचार के आते ही विभिन्न उपक्रमों से ड्रेस डिजाइन तैयार कराये गये। साथ ही विभिन्न विश्वविद्यालयों से भी दीक्षांत समारोह परिधान तैयार कराये गये, जिनमें ग्राफिक ऐरा विश्वविद्यालय द्वारा तैयार डिजाइन उपयुक्त पाया गया। ग्राफिक ऐरा विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित ड्रेस डिजाइन को उपयुक्त पाया गया। ड्रेस डिजाइन के कुछ सुझावों में टोपी को उत्तराखंडी स्टाइल में परिवर्तित करने और दीक्षांत समारोह के दौरान वीआईपी, विभागाध्यक्षों व एक्जीक्यूटिव आॅफिसर्स एवं छात्रों की तैयार ड्रेस में कुलपतियों द्वारा अपने-अपने सुझाव भी दिये गए थे। उच्च शिक्षा मंत्री ने तैयार परिधान डिजाइन का नेतृत्व करने वाली ग्राफिक ऐरा विश्वविद्यालय की डॉ. ज्योति छाबरा के सुझावों के आधार पर टोपी का डिजाइन उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में तैयार कराने के निर्देश दिये गये हैं। परिधान में उत्तराखंडी टोपी में राज्य पक्षी मोनाल, राज्य पुष्प ब्रह्म कमल, गढ़वाल राइफल और कुमांऊ रेजीमेंट के ड्रेस के रंग को भी समाविष्ट किया गया है।

सबक लें दूसरे राज्य

भाजपा जिला महामंत्री आदित्य चौहान का कहना है कि दीक्षांत समारोहों में रोब्स यानि गाउन की बजाय उत्तराखंडी टोपी, राज्य पुष्प और पक्षी को परिधान शामिल करना उत्तराखंड सरकार का बेहतरीन फैसला है। अन्य राज्य इससे सबक ले सकते हैं। उसी प्रकार कुछ साल पहले तब के केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी एक दीक्षांत समारोह में गाउन पहनने से इनकार कर दिया था। उत्तराखंड सरकार के अंग्रीजिफ्त खत्म करने के इस फैसले का राज्य की जनता भी स्वागत कर रही है।

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