प्रदेश में भाजपा तेजी से अपना स्थान बनाती जा रही है। यह हाल ही में हुए उपचुनावों के वोट प्रतिशत से पता चल रहा है। यहां जनता भाजपा को वामपंथी दलों और कांग्रेस से
अधिक महत्व देने लगी है।



वामपंथी शासनकाल में तृणमूल कांग्रेस की जो स्थिति थी, वही स्थिति भाजपा की तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में है। तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे नम्बर दो यानी मुख्य विपक्षी दल की ओर बढ़ रही थी और कांग्रेस इससे चिंतित थी। अब भाजपा धीरे-धीरे नंबर दो यानी मुख्य विपक्षी दल की ओर बढ़ रही है और विशेषकर वामपंथी दल चिंतित व परेशान हैं। वैसे, इसका एक दूसरा पहलू भी है, तृणमूल कांग्रेस को वामपंथी दलों व कांग्रेस ने शुरू में बेहद हल्के में लिया था। भाजपा को भी तृणमूल कांग्रेस व वामपंथी दलों ने बेहद हल्के में लिया। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी की उंगली पकड़कर भाजपा इस राज्य में आई थी, आज सिर पर सवार है। आखिर कैसे, एक नजर डालते हैं।

पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर 29 जनवरी को हुए उपचुनाव में भाजपा को जीत तो नहीं मिली, लेकिन वोट बढ़त में कामयाबी जरूर मिली। भाजपा दोनों ही सीटों पर दूसरे नंबर पर रही, सीपीएम को नीचे धकेलकर। राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान भी जिस बात ने खींचा वो यह है बीजेपी के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी। उलुबेड़िया में जहां 2014 के चुनावों में उसका वोट 11.5 फीसदी था, वहीं अब 23.29 फीसदी हो गया। वैसे ही नोआपाड़ा में भी वोट प्रतिशत में खासा इजाफा देखने को मिला। वामपंथियों को उम्मीद थी कि बदली परिस्थिति में वो किसी भी तरह से दूसरे नंबर पर रह जाते हैं, तो उनके लिए राहत की बात होगी। उलुबेड़िया में तो वामपंथी शुरू में ही अपनी हैसियत को भांप गये थे, लेकिन नोआपाड़ा में टक्कर भाजपा और माकपा के बीच होती रही। कभी भाजपा माकपा से आगे निकल जा रही थी, तो कभी माकपा भाजपा को पीछे छोड़ते हुए नंबर दो की हैसियत में पहुंच जा रही थी। आखिरी गणना के बाद भाजपा के समर्थकों के चेहरों पर मुस्कुराहट दिखी, दरअसल उसने माकपा और कांग्रेस को पछाड़ते हुए प्रमुख विपक्षी दल के रूप में अपनी दमदार मौजूदगी बरकरार रखी। दोनों ही सीटों पर भाजपा दूसरे, माकपा तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर रही। दूसरी तरफ दो मुख्य विपक्षी पार्टियों लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस के वोट प्रतिशत में काफी गिरावट आई है।

ऐसा नहीं है कि पहली बार भाजपा ने राज्य के चुनावों में दूसरा स्थान हासिल किया है। दिलचस्प यह है कि पार्टी ने तेजी से कुछ सालों में अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाया है। पिछले साल हुए कांथी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा 30 फीसदी वोट प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही। अगस्त 2017 में भी निकाय चुनावों में उसने इसी स्थान को सुरक्षित रखा। ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा हार कर भी लगातार जीत रही है।

2016 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा का वोट शेयर बढ़ना एक ट्रेंड बन चुका है। वह अब दूसरा स्थान बनाने में सक्षम हो गए हैं। हालांकि, उनके और पहले स्थान में काफी अंतर
रहता है। भाजपा के वोट प्रतिशत में इस वृद्धि की वजह टीएमसी विरोधी वोटों
का भाजपा के पक्ष में जाना भी है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा का वोट शेयर बढ़ना एक ट्रेंड बन चुका है। वह अब दूसरा स्थान बनाने में सक्षम हो गए हैं। हालांकि, उनके और पहले स्थान में काफी अंतर रहता है। भाजपा के वोट प्रतिशत में इस वृद्धि की वजह टीएमसी विरोधी वोटों का भाजपा के पक्ष में जाना भी है। इससे पहले टीएमसी विरोधी वोट लेफ्ट या कांग्रेस के खाते में जाते थे। धीरे-धीरे सही लेकिन अब यह बदल रहा है। लेफ्ट और कांग्रेस के कम हुए वोट प्रतिशत को देखा जाये तो भाजपा का उतना ही वोट प्रतिशत बढ़ा मिलेगा। इसका मतलब साफ है कि मूल रूप से भाजपा स्थापित दो राजनीतिक ताकतों को खा रही है। राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर भाजपा के बढ़ते कद के लिए केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति को ही मानते हैं। कुछ हद तक वे संप्रदाय के नाम पर ध्रुवीकरण करने की रणनीति अपनाते भी हैं। हालिया कुछ सांप्रदायिक तनावों की घटना और कुछ रैलियां हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की भी गईं और सांप्रदायिक कार्ड खेला भी जा रहा है। लेकिन भाजपा के तेजी से बढ़ने और चुनाव परिणामों के लिए केवल इस कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। दरअसल, 2011 में वामपंथी चुनाव हार गए जो लोग विपक्षी मंच की खोज में लगे थे, उन्होंने भाजपा का दामन थामना शुरू कर दिया।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ जरूर रहा है, लेकिन पार्टी अभी भी जमीनी स्तर पर अपने संगठन का निर्माण कर रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह स्थानीय संगठन को मजबूत करने के लिए कई बार समय सीमा तय कर चुके हैं, लेकिन राज्य के नेताओं को इसमें खासी मुश्किल आ रही है। कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे करीबी रहे मुकुल रॉय के भाजपा में आने के बाद पार्टी का एक धड़ा महसूस करता है कि जमीनी स्तर पर संगठन को खड़ा करने में उसे मदद मिलेगी। मुकुल रॉय वही शख़्स हैं जिन्होंने टीएमसी के संगठन को खड़ा किया है, लेकिन वहां ममता बनर्जी की एक छवि थी जिसने संगठन को मजबूत करने में मदद दी। हालांकि, पाला बदलने के बाद मुकुल रॉय नोआपाड़ा विधानसभा चुनाव में अपनी पसंद का उम्मीदवार तक नहीं उतार पाए जबकि नोआपाड़ा मुकुल रॉय का क्षेत्र है। कामयाबी तो दूर की बात, दरअसल अपने ही क्षेत्र में उन्हें अपने पुराने साथियों का साथ नहीं मिला जिसकी उन्हें आशा थी।

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