1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा भारत-पाकिस्तान के विषय में कहा गया था, ‘‘मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि, हालांकि हम एक दूसरे से अलग हो गये हैं, हमारे अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और भौगोलिक सम्बन्ध मौलिक रूप से इतने बड़े हैं कि हर उन्माद के बावजूद, हत्या और मारकाट के बावजूद, अंतत: मूलभूत आकांक्षा बची रहेगी और अन्य सभी चीजों को परास्त कर देगी, यदि स्वभावत: भारत और पाकिस्तान इतने भयानक पिछड़े न रहे तो।’’ लेकिन पाकिस्तान की तरफ से तो अभी तक ऐसा कुछ नहीं दिखा। इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय नेतृत्व द्वारा उस समय किया गया आकलन पाकिस्तान की सच्चाई से बहुत अलग था। इसके विपरीत शायद सच तो यही था कि भारत और पाकिस्तान कभी मित्र नहीं हो सकते। यही वजह है कि बीते सात दशकों में पाकिस्तान द्वारा लड़े गये युद्धों के बावजूद भारत ने अपनी विदेश नीति का वह खांचा निर्मित नहीं किया जिसके ऊपर लिखा होता-सनातन शत्रु या दुश्मन नम्बर एक और उस खांचे के अंदर पाकिस्तान का नाम लिखा हुआ होता। दूसरी ओर पाकिस्तान में फौज और कट्टरपंथियों ने खांचे बना रखे हैं। इनमें से एक खांचे में भारत के लिए लिखा गया है दुश्मन नम्बर एक और दूसरे में इटरनल एनमी (सनातन शत्रु)। यही वजह है कि पाकिस्तान निरन्तर भारत के साथ युद्ध की मन:स्थिति (स्टेट आॅफ वार) में रहता है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या वह केवल अपने परमाणु शक्ति होने के कारण ऐसा कर रहा है या फिर इसलिए कि कुछ ताकतें पाकिस्तान के पीछे खड़ी हुई हैं?

पाकिस्तानी सेना की तरफ से भारतीय सीमा पर की जा रही कार्रवाइयां बताती हैं कि पाकिस्तान अपना ‘माइण्डसेट’ बदलने के लिए तैयार नहीं है। सीजफायर का निरन्तर उल्लंघन पाकिस्तान की इस मनोग्रंथि को स्पष्ट करता है। वर्ष 2018 के शुरू होने के बाद से पाकिस्तानी सेना जम्मू-कश्मीर के आरएसपुरा और अरनिया सेक्टर, उरी सेक्टर, एलओसी के कोटली, राजौरी के तरकुंडी सेक्टर और सुंदरबनी से लेकर पुंछ तक नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर लगातार फायरिंग कर रही है। इससे कुछ सैनिक और नागरिक मारे जा चुके हैं और लगभग 10 हजार नागरिक इन क्षेत्रों से पलायन कर चुके हैं। विशेष बात यह है कि जब भारतीय सेना की तरफ से कार्रवाई की गयी तो  पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को पांच बार बुलाकर लाइन आॅफ कंट्रोल पर भारतीय सेना द्वारा सीजफायर के उल्लंघन का आरोप लगाया और निंदा की। पाकिस्तान की तरफ से यह आरोप लगाया गया कि इंडियन आर्मी सीमा पर मोर्टार और बड़े हथियारों का प्रयोग कर रही है जिससे क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे रणनीतिक नुकसान हो सकता है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि 2018 में भारतीय सुरक्षा बलों ने 190 से अधिक बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है। सच इसके ठीक विपरीत है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में पाकिस्तान ने 800 बार सीजफायर का उल्लंघन किया। वर्ष 2016 में उसने 228 बार ही सीजफायर का उल्लंघन किया था। यानी पाकिस्तान ने एक वर्ष में एलओसी पर सीजफायर की घटनाओं में 230 प्रतिशत की वृद्धि कर दी।

बीते सात दशकों में पाकिस्तान द्वारा लड़े गये युद्धों के बावजूद भारत ने अपनी विदेश नीति का वह खांचा निर्मित नहीं किया जिसके ऊपर लिखा होता-सनातन शत्रु या दुश्मन नम्बर एक
और उस खांचे के अंदर पाक का नाम लिखा हुआ होता।

बीएसएफ के सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान की ओर से भारत के 30-40 पोस्ट पर टारगेट किया जा रहा है। इसलिए पाकिस्तान द्वारा बतायी जा रही संख्या, उसी की सेना द्वारा सीजफायर तोड़ने से सम्बंधित हो सकती है।  इंटेलीजेंस रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी सेना सैन्य सामग्री बढ़ा रही है। पाकिस्तान की सेना ने चीन की नार्थ इण्डस्ट्रीज कापोर्रेशन को 2,496 ग्राउण्ट बेस्ड लॉन्चर्स को खरीदने के लिए आॅर्डर दिया है। इसे देखते हुए रक्षा विशेषज्ञों को तर्क है कि पाकिस्तान को कांउटर करने के लिए भारत को कम प्रतिक्रियाशील और युद्धवादी सैन्य नीति को अपनाना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि सर्दियों के बाद दर्रों के खुलने के जब आतंकियों की घुसपैठ साइक्लिक हो जाए और सीजफायर जब आतंकियों को कवर देने के लिए तोड़ी जाने लगे, तब घाटी में भारत को अपनी सैन्य रणनीति को ओवरहाल करने की जरूरत होती है। सवाल यह उठता है कि यह होगा कैसे? केवल सैन्य रणनीति बदलकर अथवा अन्य प्रकार से?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘नेबर्स फर्स्ट’ से लेकर ‘हेड आॅन डिप्लोमैसी’ अथवा पॉलिसी आॅफ मास्टर स्ट्रोक’ (काबुल से लाहौर  प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के रायविंड पैलेस पहुंचने की कूटनीति) और ‘न्यू हाईवे डिप्लोमैसी’ (पठानकोट हमले के पश्चात पाकिस्तानी जेआईटी को आमंत्रण देकर) तक एक सार्थक प्रयास किया। फिर भी  पाकिस्तान ने अपना नजरिया नहीं बदला। इसका पहला पक्ष तो यह है कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति और सैन्य नेतृत्व का भारत के प्रति नजरिया दोषी है। दूसरा और असल कारण चीन है। पाकिस्तान चीन का घोषित तौर पर ‘आॅल व्हेदर फ्रेंड’ है, जिसकी पुष्टि चीन कई तरीकों से करता भी रहता है। ये तरीके कूटनीतिक से लेकर तकनीक और आर्थिक सहायता तक विस्तृत हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन अब भारत से सीधे लड़ने के बजाय पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और नेपाल के जरिए लड़ना चाहता है। इससे उन देशों की वे मंशाएं भी सार्थक होती हैं, जो भारत के प्रति विषैली मनोग्रंथि रखते हैं। अब दिक्कत यह है कि शीतयुद्ध तथा उसके बाद भी भारत का आॅल व्हेदर फ्रैंड रहा रूस धीरे-धीरे बीजिंग-इस्लामाबाद धुरी की ओर खिसक रहा है। इससे एक स्ट्रैटेजिक ट्रैंगल बनने की संभावना दिखती है। इस्लामाबाद-बीजिंग धुरी पहले से भारत के लिए वृहत्तर सामरिक चुनौतियां उत्पन्न कर रही है, अब इसमें मॉस्को के जुड़ जाने से भारत के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाएंगी। पाकिस्तान और अधिक उद्दंडता प्रदर्शित करने लगेगा। चीन की चेक डिप्लोमेसी ने पाकिस्तान को धीरे-धीरे बंधक बना लिया है, जिससे पाकिस्तान का बाहर निकल पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। जैसे-जैसे पाकिस्तान चीनी पंजे में जकड़ता जाएगा, वहां आंतरिक संघर्ष की स्थिति बनेगी और इसे वह सीमा की ओर धकेलने की युक्ति अपनाएगा।

पाकिस्तान का डेमोक्रेटिक स्टैब्लिशमेंट नवाज शरीफ के हटने के बाद से काफी कमजोर पड़ा है, जिसकी एक झलक खादिम रिजवी के आंदोलन में देखी जा चुकी है। ध्यान रहे कि खादिम रिजवी, ने अपने आंदोलन के जरिए दुनिया को यह बता दिया था कि पाकिस्तान का कट्टरपंथ पाकिस्तान की सम्पूर्ण व्यवस्था को हाईजैक करने की क्षमता रखता है। पाकिस्तान की सेना उन स्थितियों में चरमपंथियों के साथ रहेगी न कि इस्लामाबाद की लोकतांत्रिक व न्यायिक संस्थाओं के साथ। पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति भी अपनी असफलताओं को ढकने के लिए भारत की सीमा पर हलचलें पैदा कर देती है  जिससे कि रीयल स्टेट एक्टर्स और नॉन-रियल स्टेट एक्टर्स प्रसन्न हो जाएं और पाकिस्तान की जनता भी राष्ट्रवाद के उन्माद में आकर राजनीतिक स्थापनों के प्रति अपना मूड परिवर्तित कर लें। ध्यान रहे कि डीप स्टेट यानि पाकिस्तान की सेना, आईएसआई, कट्टरपंथी व कुछ सम्भ्रांत ताकतें कभी नहीं चाहेंगी कि भारत के साथ पाकिस्तान सम्बंधों में सुधार लाए।

बहरहाल इसी वर्ष पाकिस्तान में आम चुनाव होने हैं। वहां की सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) यानी पीएमएल-एन बड़े खराब दौर से गुजर रही है। पार्टी के मुखिया और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे हैं। ऐसा परिदृश्य किसी भी देश के लिए बेहद गंभीर हालातों का सूचक है। दिक्कत यह है कि पाकिस्तान के रियल स्टेट एक्टर्स यानी सैन्य जनरल आत्मविश्लेषण के लिए तैयार नहीं कि आखिर किन कारणों से पाकिस्तान की यह दुर्दशा हुई है और इसका समाधान क्या हो सकता है। यदि वह सही तरीके से समाधान ढूंढें तो उसे केवल एक ही रास्ता दिखेगा और वह है भारत के साथ मित्रता। सैन्य जनरलों को थोथी वाहवाही या इस्लामी राष्ट्रभक्ति का खिताब भी लेना है। इसलिए वे भारत के प्रति अपनी आक्रामक नीति का त्याग नहीं करेंगे। यदि करना भी चाहेंगे तो चीन उन्हें करने नहीं देगा।

हालांकि अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति व्यवहार थोड़ा बदल रहा है, जो उनकी आक्रामकता को कमजोर कर सकता था लेकिन ट्रंप प्रशासन की अभी दिशा ही तय नहीं हो पायी है। इसलिए उस पर कोई भरोसा नहीं जताया जा सकता। जो भी हो, पाकिस्तान अपना चरित्र नहीं बदलेगा। इसलिए अब यह हमें सोचना है कि हम उसकी हरकतों को किस रूप में देखें। केवल चेतावनी देकर आगे बढ़ जाने की या फिर जंग मानकर उसी तरीके से जवाब देने की?

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