पाकिस्तान भारतीय सीमा पर लगातार उकसावे वाली हरकतें कर रहा है। इतना कि सीजफायर उल्लंघन के मामले गिनने की जरूरत तक ही नहीं बची। भारत की जवाबी कार्रवाई के बावजूद वह मान नहीं रहा। कैदी कुलभूषण जाधव के परिजनों से मुलाकात करवाने में उसका रवैया निराशाजनक ही रहा। पाकिस्तान को जाधव मामले में एक कूटनीतिक बढ़त का जो मौका मिला था, उसने उसे न सिर्फ गंवा दिया बल्कि अपनी सनातनी कुंठा को दुनिया को दिखा भी दिया। शायद पाकिस्तानी हुक्मरानों को इसकी चिंता कभी रही भी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ में पाक के स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने जाधव को जासूस करार देते हुए भारत को ही पाक में विध्वसंक गतिविधियों में लिप्त होने का मुद्दा भी उठा दिया है। वह भी तब जब आतंकवाद की रोकथाम में पाकिस्तान के द्वारा ध्यान न देने को लेकर अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली विशेष आर्थिक मदद को रोक दिया है। इससे पूरी दुनिया में अमेरिका ने पाक को आतंकियों की पनाह स्थली और मित्र करार कर दिया। बदले में पाक ने अमेरिका को रक्षा और खुफिया संबंधी सहयोग में आगे पाक द्वारा ढिलाई देने का दांव मारा है। हालिया अमेरिकी कड़ाई पर पाक संसद में पाक रक्षा मंत्री ने भारत को शत्रु देश घोषित करते हुए अमेरिका से पाक के प्रति नजरिया बदलने की वकालत की है। कुछ भी हो लेकिन पाकिस्तान की इन ढिठाइयों में एक भीतरी जुड़ाव सहज देखा जा सकता है। इस प्रकार पीछे के निहितार्थ भारत के प्रति घृणा की हद तक दुराग्रह भी स्पष्ट हो जाता है।

कौटिल्य के साप्तांग सिद्धांत में सात तत्वों की चर्चा के पश्चात आठवें तत्व के रूप में शत्रु की कल्पना की गई है। उसका मंडल सिद्धांत भी यह कहता है कि जब शत्रु किसी पीङा या खतरा से ग्रसित हो तो यह प्रसन्नता और आने वाली सफलता का सूचक है। चाणक्य यह भी कहता है कि साधन चाहे जो कुछ भी हो वह साध्य की सफलता के आगे विचारणीय नहीं होता। पाकिस्तान के लिए कौटिल्य के राजत्व में वर्णित आठवां तत्व शत्रु का नाम भारत है। भारत में आतंकवाद जनित उत्पन्न पीड़ा उसकी सफलता है और बांग्लादेश के निर्माण के बाद भारत से हजार वर्षों तक लड़ते रहने का जुल्फिकार अली भुट्टों के संकल्प की सिद्धि के लिए आतंकवाद एक उचित साधन है। यदि ऐसा नहीं है, तो मुंबई की आंतकी घटना 26/11 पर तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ जरदारी को ऐसा बयान क्यों देना पड़ा पाकिस्तान की सरकार आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने का संकल्प रखती है पर इसे वह भारत के दबाव में अंजाम नहीं देने वाली…। यह होगा पर समय हम तय करेंगे भारत नहीं, बड़बोलेपन से भरे इस कूटनीतिक वक्तव्य के मायने स्पष्ट थे कि पाकिस्तान एक ‘संप्रभु’ राष्ट्र है और भूटान, नेपाल में भारत का चलने वाला कथित दादागीरी पाकिस्तान अपने यहां बर्दास्त नहीं करेगा। इस प्रकार पड़ोसी धर्म के निर्वहन से पाकिस्तान का भागना उसकी मजबूरी है। वर्षों से भारत विरोध करते रहने से वह पाकिस्तान के अवाम को जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी एक खास तरह की मानसिकता में जीने का प्रशिक्षण पाये हुए है, को भरोसा दिलाते रहते है कि उनका भविष्य सरकार के हाथों में सुरक्षित है। दादा अमेरिका और भइया चीन से केवल डरना है। भारत की ऐसी औकात कहां! भारत चांद पर जाये या मंगल पर पाकिस्तान का ‘मंगल’ कश्मीर और मुम्बई तक पहुंचने पर ही हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ में पाक के स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने जाधव को जासूस करार देते हुए भारत को ही पाक में विध्वसंक गतिविधियों में लिप्त होने का मुद्दा भी उठा दिया है।

बहरहाल, पाकिस्तानी जेलों में जाधव जैसे कैदियों की हालत क्या होगी इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। पाकिस्तानी जेलों की लीला और पाकिस्तान की राजनीति में सेना, सेक्स और धर्म की जो भूमिका रहते आयी है, उसकी एक झलक मोहनलाल भाष्कर की पुस्तक मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था में दिखायी पड़ती है। राजत्व का ऐसा प्रदूषण पाकिस्तान सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया को अस्थिर किये हुए है। एक राष्ट्र को गढ़ने, उसकी मुकम्मल आधुनिक तस्वीर सुनिश्चित करने के इरादे पाकिस्तान में शुरू से ही संकुचित रहे हैं। भारत भी एक विकासशील हुआ राष्ट्र है। कई समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन राष्ट्र की बुनियाद पुख्ता करने की भरपूर कोशिशें 1947 से लेकर आजतक अनवरत जारी है। विकास की प्रक्रिया में जमा होते गये कचड़ों का शोधन यहां लगातार मजबूत होते जा रहे लोकतंत्र में संभव दिखता है। वह किसी बलूचिस्तान, पाकिस्तानी कश्मीर की हवा के दूषण का पाप लिये नहीं जी रहा।

भारत में अपने अतीत के धनात्मक प्रतीकों के इस्तेमाल करने की दृष्टि अद्भुत रही है। पहली बार भारत को एक भौगोलिक इकाई की जगह राजनीतिक इकाई में तब्दील करने वाले चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रतिमा उसने अपने संसद भवन के परिसर में स्थापित की है, तो अशोक स्तंभ के राजनीतिक और आध्यात्मिक निहितार्थ को दृष्टि में रखकर उसे राजकीय चिन्ह घोषित कर रखा है। ऐसी दृष्टि का ही यह नैतिक बल है कि वह एक समय गुटनिरपेक्ष देशों का अगुआ बन सका और आज एक महाशक्ति की संभावना को रेखांकित करने में सफल होता जा रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान साम्राज्यवादियों के हाथ का खिलौना (पहले अमेरिका और अब चीन का) बनते हुए भारत को लक्षित विभिन्न सैनिक गठबंधनों का हिस्सा बनता रहा है। परिणामत: शिया-सुन्नी संघर्ष, पंजाब बनाम शेष प्रांतों की उपेक्षा, अल्लाह और आर्मी के प्रभावों में लगातार होता इजाफा तथा वैश्विक आर्थिक क्रम में लगातार पाकिस्तान का पीछे छूटते जाना जैसे नतीजों ने एक राज्य के अस्तित्व कायम रखने के लिए जरूरी विकल्पों को सीमित कर दिया है। इन चुनौतियों की प्रकृति ऐसी है कि वे पाकिस्तानी हुक्मरानों और पाकिस्तान के शुभेक्षुओं से विजनरी सक्रियता की मांग करती हैं। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत ने आजिज आकर आतंकी गुटों पर कार्रवाई करने का समय अब खुद से तय करना शुरू कर दिया है। अब तक भारत की बनी साफ्ट स्टेट की छवि और कहां यह सर्जिकल स्ट्राइक वाला नया अवतार। पाकिस्तान स्थित आतंकी गुटों के पेशानी पर आज नहीं तो कल बल पड़ेगे ही।

पाकिस्तान मेंअल्लाह (मुल्ला), आईएसआई और आर्मी पोषित आतंकवाद नामक नाटक का
पर्दा अभी गिरना बाकी है।

कुल मिलाकर, नॉन स्टेट एक्टर्स -‘अल्लाह (मुल्ला)’, आईएसआई और आर्मी पोषित आतंकवाद नामक नाटक का पर्दा अभी गिरना बाकी है। नाटक के सूत्रधार आर्मी ने जरदारी से लेकर नवाज तथा मौजूदा वजीर-ए-आला तक को विदूषक बनाकर रख दिया है। आईएसआईएस, लश्कर के जिहादी लॉउडस्पीकर के शोर में नाटक अब उबाऊ लगने लगा है। अब दर्शक (अमेरिकी राष्ट्रपति सहित विश्व के दूसरे नेता) ताली बजायें भी तो कैसे! इसलिए सूत्रधार मंच पर अभिनय कर चुके कलाकारों (पूर्व हुक्मरानों) की अब तक अदा की गयी भूमिकाओं पर तालियां नहीं बटोर पा रहा है। नाटक आयोजक मंडली को दर्शकों से चिरौरी करनी पड़  रही है कि कृपया नाटक का यह शांति अंक तो देख लीजिए!

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