हिन्द महासागर के मध्य में स्थित होने के कारण मालदीव का रणनीतिक महत्व है। उसका रणनीतिक महत्व अरब, पुर्तगाली, डच और अंगे्रज सबको मालूम था, सिर्फ हमें मालूम नहीं था। हमें 1947 में उसे भारत का अंग बना लेना चाहिए था, लेकिन हमें उसकी सुध ही नहीं थी। वह हिन्द महासागर के व्यापारिक मार्ग पर स्थित है, इसलिए चीन उस पर आँख गड़ाए हुए हैं। तीन सौ वर्ग किलोमीटर में फैले मालदीव में कोई 1200 द्वीप हैं। इतने छोटे-छोटे द्वीपों पर न खेती हो सकती है, न उद्योग धंधे खड़े हो सकते हैं। इस क्षेत्र में रुचि रखने वाली महाशक्तियों के लिए उसका सामरिक महत्व है। इसके अलावा वह सैलानियों का आकर्षण बन गया है। चार लाख आबादी वाले मालदीव में हर वर्ष 14 लाख से अधिक सैलानी आते हैं। अब उनमें भी चीनी सैलानियों की संख्या भारतीय सैलानियों से अधिक हो गई है। चीन उसके सामरिक महत्व को पहचानता है, इसलिए वह उसमें अपने वित्तीय साधन झोंकने में लगा है।

पिछले कुछ दिनों से मालदीव की राजनीति में उथल-पुथल मची हुई है। ब्रिटिश संरक्षण से मुक्त हुए मालदीव पर शुरू में 1978 से 2008 तक मैमून अब्दुल गयूम का शासन रहा। उनके निरंकुश तरीकों से असंतोष पैदा हुआ और आंदोलनकारियों ने 2008 में एक नया संविधान लागू करवाया, जिसमें न्यायपालिका को स्वतंत्र बना दिया गया और संसद के अधिकार बढ़ा दिए गए। आंदोलन में अग्रणी रहे मोहम्मद नशीद राष्ट्रपति के चुनाव में जीतकर सत्ता में पहुंचे। उनके असंयत तरीकों से फिर असंतोष फैला। 2012 में विवादास्पद परिस्थितियों में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 2013 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में पहले दौर में वे जीते, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे वैध नहीं माना। फिर चुनाव हुए और पूर्व राष्ट्रपति गयूम के सौतेले भाई अब्दुल्ला यामीन को सत्ता मिली। पिछले चार वर्ष में उन्होंने अपने विरोधियों को जेल भेजकर निरंकुश तरीके अपनाए हैं। पूर्व राष्ट्रपति नशीद को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर जेल भेज दिया गया था। इलाज के लिए बाद में उन्हें ब्रिटेन जाने दिया गया, जहां उन्हें राजनैतिक शरण मिल गई। इन दिनों वे श्रीलंका में हैं।

सुप्रीम कोर्ट में पूर्व राष्ट्रपति गयूम के समर्थक हैं और उन्होंने नशीद तथा 12 सांसदों की गिरफ्तारी रद्द करके उन पर फिर से मुकदमा चलाने का फैसला सुनाया। इससे यामीन सरकार के अल्पमत में पहुंचने और संसद द्वारा दोषारोपण के जरिये उन्हें सत्ता से हटाए जाने की आशंका पैदा हो गई। यामीन ने इसे जजों द्वारा तख्ता पलट की कोशिश कहा, 15 दिन के लिए आपात स्थिति की घोषणा कर दी और गयूम को गिरफ्तार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक अन्य जज को गिरफ्तार कर लिया। बचे तीन जजों ने सरकार के दबाव में अपना पहले का फैसला पलट दिया। नशीद ने भारत से हस्तक्षेप का आग्रह किया है। यामीन अब तक चीन की तरफ झुके रहे हैं। लेकिन सत्ता में रहते हुए नशीद ने भी कम अवसरवादिता नहीं की थी। भारत इन प्रतिस्पर्धी नेताओं में से किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहता। लेकिन वह मालदीव को स्थिर भी देखना चाहता है।

मालदीव हमारे लक्षद्वीप के करीब है। हमने उसके रणनीतिक महत्व को देखते हुए उसे अपने अधिकार में लेने के बारे में क्यों नहीं सोचा? आज मालदीव में चीन का प्रभाव हमसे अधिक हो गया है।

मालदीव जैसे छोटे से देश में तानाशाही वृत्तियां पनपना स्वाभाविक है। सत्ता की हिंसक प्रतिस्पर्धा राजनेताओं को अवसरवादी बनाती है और इसी के चलते मालदीव में चीन अपनी पैठ बढ़ाने में सफल रहा है। हम चीन की वित्तीय शक्ति का मुकाबला नहीं कर पा रहे। इसलिए हमारे आस-पड़ोस के देशों में चीन अपने प्रभाव का विस्तार करता जा रहा है। हम मालदीव में पैदा हुई चुनौती से कैसे निपटें, इस पर विचार करते हुए पीछे मुड़कर यह भी देख लेना चाहिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारे नेताओं ने मालदीव के बारे में क्या कुछ विचार किया था? तथ्य यह है कि नेहरू सरकार ने न मालदीव में कोई दिलचस्पी दिखाई, न पुर्तगाल और फ्रांस की अन्य कॉलोनियों में जो 1947 में ही स्वतंत्र करवा ली जानी चाहिए थी। 1946 में राम मनोहर लोहिया ने गोवा में सत्याग्रह करके सरकार का ध्यान इस ओर खींचा था। कॉलोनियों में हो रहे जनांदोलनों के दबाव में नेहरू सरकार ने 1947 में फ्रांस और पुर्तगाल से उनकी अधीनता वाले भारतीय क्षेत्रों को मुक्त करने के लिए कहा था। लेकिन यह आग्रह इतना कमजोर था कि पुर्तगाल सरकार ने उसे ठुकरा दिया और फ्रांस ने पूरा प्रश्न जनमत संग्रह पर छोड़ दिया।

गोवा की तरह पुर्तगाली अधिपत्य वाले दादरा और नागर हवेली में भी आंदोलन छिड़ा हुआ था। 2 अगस्त, 1954 को आंदोलनकारियों ने इन्हें पुर्तगाली प्रशासन से मुक्त करवा लिया। लेकिन नेहरू सरकार को उसका संज्ञान लेने की आवश्यकता नहीं लगी। लोगों ने वरिष्ठ पंचायत बनाकर इन क्षेत्रों का शासन संभाला और भारत सरकार से उनके प्रशासन में सहायता की अपील की। नेहरू सरकार ने प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी के.जी. बदलानी को वहां भेज दिया। फिर समस्या यह उठी कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो यह क्षेत्र अभी पुर्तगाली अधिपत्य में माने जा रहे थे। 1961 में मजबूर होकर जब गोवा में सैनिक कार्रवाई हुई तो दादरा और नागर हवेली की ओर ध्यान दिया गया। एक दिन के लिए बदलानी को प्रधानमंत्री बनाया गया। फिर उनके और भारत सरकार के बीच समझौते के द्वारा इन क्षेत्रों का भारत में विलय हुआ। फ्रांस के सहयोग के कारण बंगाल स्थित चंद्रनगर 1950 में और पुदुच्चेरी 1954 में भारत का अंग बने।

मालदीव में बारहवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म था। फिर अरबों के दबाव में मालदीव के लोगों को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। 1558 में पुर्तगालियों ने यहां एक छोटी सैनिक छावनी स्थापित की। जब उन्होंने यहां के लोगों पर ईसाई धर्म थोपने की कोशिश की तो लोगों ने विद्रोह कर दिया और पुर्तगालियों को 15 वर्ष में मालदीव छोड़ना पड़ा। उस दिन को मालदीव में राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। 17वीं शताब्दी में डच लोगों ने इसे अपने अधिकार में लिया। 1796 में अंग्रेजों ने जब सीलोन पुर्तगालियों से छीना तो मालदीव को भी अपने संरक्षण में ले लिया। इसे औपचारिक स्वरूप 1887 में दिया गया। स्थानीय शासन मुसलमानों के हाथ में ही रहा। स्वेज के पूर्व की अपनी सभी कॉलोनी छोड़ने की नीति के अंतर्गत अंग्रेजों ने 1965 में मालदीव छोड़ दिया। 1968 में एक जनमत संग्रह के बाद मालदीव में गणतंत्रीय व्यवस्था लागू हुई।

मालदीव हमारे लक्षद्वीप के करीब है। हमने उसके रणनीतिक महत्व को देखते हुए उसे अपने अधिकार में लेने के बारे में क्यों नहीं सोचा? यह प्रश्न आज कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि उसके सबसे लब्धप्रतिष्ठ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भारत के भूगोल की ठीक से जानकारी थी भी या नहीं। क्या उनके लिए भारत उतना सा ही था, जितना अंग्रेजों ने उन्हें सौंपा था? भारत जब स्वतंत्र हुआ था तब मालदीव की आबादी एक लाख भी नहीं थी। इतनी छोटी-सी आबादी वाले द्वीपों को एक स्वतंत्र देश नहीं बनने दिया जा सकता था। कोई भी यह सोच सकता था कि इतना कमजोर देश किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव में भारत के लिए मुसीबत बन सकता है। उस समय की हमारी सरकार ने यह सब नहीं सोचा और आज परिणाम हमारे सामने हैं। मालदीव में चीन का प्रभाव हमसे अधिक हो गया है, इसके अलावा मालदीव इस्लामी कट्टरता का अड्डा बनता जा रहा है। सीरिया-इराक में आईएस की ओर से लड़ने वालों में यहां के भी लोग थे। 1947 में मालदीव पर नियंत्रण जितना आसान था, उतना आज नहीं है।

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