त्रिपुरा चुनाव में वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच का मुकाबला रोमांचक होता जा रहा है। मतदाता दोनों ही पक्षों को सुन रहे हैं। वे इसी के अनुसार अपना मन भी बना रहे हैं।



साम्यवाद के नाम पर जातिवाद के खेल ने त्रिपुरा के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की सरकार के मुखौटे को हटाकर उसकी असलियत को बेनकाब कर दिया है। चालू माह की 17 तारीख को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में यूं तो विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला बड़े पैमाने पर चल रहा है, लेकिन माणिक सरकार जिस प्रकार बंगाली और बाहरी का पाठ माकपा कार्यकर्ताओं को पढ़ा रही है, उससे माकपाइयों की छद्म साम्यवाद की पोल खुल रही है। उल्लेखनीय है कि चुनाव के दौरान माकपा कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपने कार्यकर्ताओं को आगाह किया कि ध्यान रखें कि इस चुनाव में बाहर जाकर कौन चुनाव प्रचार करता है। उन्होंने कहा कि बांग्ला नहीं बोलने वालों पर विशेष नजर रखी जाए। मुख्यमंत्री की सभा में 600 से अधिक कॉमरेड मौजूद थे। मुख्यमंत्री का कहने का लहजा यह था कि बाहर से आकर चुनाव प्रचार करने वालों को माकपा सरकार में आने के बाद देख लेगी।

माणिक सरकार की इन बातों को लेकर राजनीतिक गलियारे में खूब चर्चा हो रही है कि सौम्य छवि वाले माणिक सरकार के मुंह से इस प्रकार की अलगाववादी बातें किसी के गले नहीं उतर रही हैं। जहां एक ओर माणिक सरकार चुनाव प्रचार के पहले दिन से ही भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं, वहीं स्वयं माणिक सरकार ने बंगाली और घर बंगाली की बात कहकर लोगों के बीच अपनी छवि को एक तरह से बिगाड़ लिया है। वैसे भी साम्यवाद के सिद्धांत का ढोल पीटने वाले वामपंथी बंगाली और गैर बंगाली की बात किस साम्यवाद के आधार पर कहते हैं, यह लोगों की समझ से परे है।

माणिक सरकार की इन बातों का त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में मतदाताओं पर निश्चित रूप से असर होने वाला है। उल्लेखनीय है कि भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में राज्य के विकास, बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, भुखमरी आदि को मुद्दा बनाकर आगे बढ़ रही है। भाजपा के सभी वरिष्ठ नेताओं के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी त्रिपुरा की चुनावी सभाओं में विकास को ही मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री ने त्रिपुरा के लोगों से सीधा संदेश देने की कोशिश की कि वह त्रिपुरा का सर्वांगीण विकास करने के लिए योजना लेकर आए हैं। जिन योजनाओं को लागू करने के लिए भाजपा की सरकार का होना आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने राज्य में इंटरनेट कनेक्टिविटी, सड़क मार्ग, जलमार्ग, रेल मार्ग की बातें कहीं। उन्होंने त्रिपुरा के कर्मचारियों को अब तक नहीं मिलने वाले 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुकूल वेतन देने का वादा किया।

गरीबों के लिए नई नई योजनाएं लागू करने के बात कही। लोगों को आश्वस्त कराने की कोशिश की कि भाजपा की सरकार आने के बाद त्रिपुरा में भी गुजरात, असम या अन्य भाजपा शासित प्रदेशों की तरह विकास के कार्य किए जाएंगे और राज्य को आत्मनिर्भर बना कर देश के अन्य राज्यों की श्रेणी में लाकर खड़ा किया जाएगा।

जहां एक ओर माणिक सरकार भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं, वहीं स्वयं बंगाली और घर बंगाली  की बात कहकर लोगों के बीच अपनी छवि
को धूमिल कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री की यह बातें लोगों द्वारा खूब पसंद की गईं और यही वजह है कि त्रिपुरा चुनाव में भाजपा के पक्ष में चल रही हवा प्रधानमंत्री के पहुंचने के बाद तूफानी रूप ले चुकी है। भाजपा के इस बढ़ते जनाधार से हकलाहट में आकर माकपा अनाप-शनाप बातें करने में लग गई। माकपा को लगता है कि त्रिपुरा के बंगाली उनकी बातों के भावनात्मक बहाव में आकर एक बार फिर से माकपा को वोट दें और फिर वह पहले की तरह सरकार में आ जाएंगे। लेकिन प्रगतिशील विचारधारा के बंगाली दरअसल माकपा की गुंडागर्दी और भ्रष्ट शासन से तंग आ चुके हैं। भाजपा की चुनावी सभाओं में जहां लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। वहीं माकपा की सभाओं में लोगों की उपस्थिति तुलनात्मक दृष्टि से बेहद ही कम देखी जाती है। माणिक सरकार की इन बातों से राज्य के बंगालियों के बीच भी उनकी छवि धूमिल हुई है। जिस छवि की वजह से उन्हें त्रिपुरा में वोट मिलते थे वह आसन्न चुनाव में बरकरार रहेगा अथवा नहीं, यह कहना बड़ा ही मुश्किल होगा।

दूसरी ओर त्रिपुरा के आदिवासी भी मुख्यमंत्री की इन बातों से बौखला गए हैं। पहले से ही गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी से त्रस्त त्रिपुरा के आदिवासी मानिक सरकार की इस भेदभाव पूर्ण राजनीति को सहजता से नहीं ले पा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि माकपा या भांप चुकी है कि इस चुनाव में भाजपा की हालत माकपा के मुकाबले मजबूत होती जा रही है। यही वजह है कि माकपा के नेता ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी से लेकर अन्य अलग-अलग मुद्दे उछल रहे हैं। माकपा ने चुनावी सभाओं में इस बात को मुद्दा बनाया कि ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी है और कोई भी बटन दबाने से भाजपा के पक्ष में ही वोट चले जाते हैं। चुनाव आयोग इस पर गहरी प्रतिक्रिया व्यक्त की और स्पष्ट किया कि कोई भी ईवीएम मशीन खराब नहीं है। उसके बाद माकपा ने आरोप लगाया कि ईवीएम मशीनों को हैक कर लिया गया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि भारतीय चुनाव के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि ईवीएम मशीन को हैक किया गया है। सभी आरोपों को एक सिरे से खारिज कर दिया गया।

वहीं भाजपा के मित्र दल के साथ आदिवासियों के लिए तिपरालैंड बनाने की गुपचुप समझौते की बातों को स्पष्ट कर दिया गया कि ऐसा कुछ भी नहीं है। उन्हीं दोनों ने संयुक्त रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस करके स्पष्ट कर दिया कि भारतीय संविधान के दायरे में दोनों ही दलों के बीच चुनावी समझौता हुआ है। कुल मिलाकर देखा जाए तो त्रिपुरा चुनाव में वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच का मुकाबला रोमांचक होता जा रहा है। मतदाता दोनों ही पक्षों को सुन रहे हैं। इस बीच चुनाव आयोग अपने स्तर पर तैयारियां कर रहा है। देखना यह है कि अखिर जनता पर किन बातों का असर सबसे अधिक होता है।

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