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पाकिस्तान के कर्नल कद्दाफी स्टेडियम में आसमा जहांगीर के नमाजे जनाजा का दृश्य अलहदा हो गया, जब उनके नमाजे जनाजा का सारा प्रबंध महिलाओं ने संभाल लिया। यह उनके संघर्षों का दमखम ही था कि जाते जाते उन्होंने अपना संदेश दे दिया।


समा जहांगीर वाकई बेखौफ और निडर महिला थीं। इस वजह से नहीं कि वह एक रसूखदार परिवार से थीं। इस वजह से भी नहीं कि उनका पद और कद बहुत बड़ा था। बल्कि इस वजह से कि वह बे-आवाज लोगों की आवाज थीं। अन्याय, असत्य, असमानता और रूढ़िवादिता के विरुद्ध फौलाद जैसा जिगर रखकर लड़ाई लड़ने वाली महिला थीं। उनकी इस दिलेरी की यूं भी दाद देनी पड़ेगी कि ऐसा उन्होंने पाकिस्तान जैसे मुल्क में रहकर किया, जहां चरमपंथ अपने चरम पर और दशहतगर्द सरेआम दनदनाते फिरते हैं। बात जरा सा उन सिरफिरों के खिलाफ हुई कि गोलियों से भून डालते हैं। बेनजीर भुट्टो, सलमान तासीर, अमजद साबरी और मलाला यूसुफजई जैसी ऐसी जाने कितनी मिसालें हैं। इन परिस्थितियों में भी आसमा जहांगीर ने न केवल उनसे पूरी जिंदगी लोहा लिया बल्कि खुद अपनी मौत मरीं।

66 वर्ष की उम्र में 11 फरवरी को दिल का दौरा पड़ने से न्याय की ये देवी जिस्मानी तौर पर हमसे जुदा हो गई। लेकिन वह मर कर भी अमर हो गईं। ऐसी ऐतिहासिक शख्सियतें समाज में विरले ही जन्म लेती हैं। फिर पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था में तो चाहकर भी कोई ये जहमत मोल नहीं लेना चाहता। वहां हजारों, लाखों में नहीं, सैकड़ों में भी नहीं, अब बामुश्किल उंगलियों पर ऐसी विभूतियां गिनी जा सकती हैं। इसलिए उनकी क्षति की पूर्ति नामुमकिन नजर आती है।

प्रख्यात वकील और मानवाधिकारों की अलमबरदार आसमा पाकिस्तान के हर मजलूम के घर में उम्मीद और हौसले का नाम थीं, तो वहीं अत्याचारियों के दिल में उनके नाम की दहशत थी। जेल की कालकोठरी में बंद पड़े बेसहारा लोगों को आसमा में आजादी की नई सुबह नजर आती थी। ख्वाह वे सिंध के वडेरों और जागीरदारों की निजी जेलों में अपने परिवार समेत पीढ़ियों से कैद लोग हों या फिर जबरिया मजदूरी के शिकार भट्टा मजदूर, आसमा सबके लिए मैडम नहीं बल्कि बीबी जी थीं। गौरतलब है कि इनमें अधिकतर लोग धार्मिक अल्पसंख्यक और बेहद गरीब तबके से सम्बंध रखने वाले लोग थे। यही नहीं पाकिस्तानी सेना की ज्यादतियों के शिकार और लापता बलोच व सिंधियों, ईशनिंदा के झूठे मुकदमों में फंसे लोगों, बलात्कार और घरेलू हिंसा की शिकार औरतों के लिए आसमा एक उम्मीद की किरण की मानिंद थीं।

देखा जाए तो उन्हें ये बागी तेवर विरासत में मिले थे। 27 जनवरी 1952 को लाहौर में पैदा हुई आसमा के पिता मलिक गुलाम जीलानी एक सिविल सर्वेंट थे, जो अपने ओहदे से सेवानिवृत होने के बाद राजनीति में आ गए। उस समय के पूर्वी पाकिस्तान और अब के बांग्लादेश में सैनिक कार्रवाई के विरुद्ध बेबाक राय रखने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। उनकी मां सबीहा जीलानी लाहौर के फोरमैन क्रिस्चियन कॉलेज से ऐसे समय में तालीमयाफ्ता थीं, जब पाकिस्तानी समाज में बड़े-बड़े घरानों की लड़कियों को भी शिक्षा ग्रहण करने की इजाजत नहीं थी। यही नहीं समाजी बंधनों की दीवारों को तोड़कर उन्होंने अपना कपड़े का कारोबार भी किया।

आसमा ने भी अपने माता-पिता के नक्शेदम पर चलते हुए स्वयं का तालीम के जेवर से श्रृंगार करना उचित समझा। आरंभिक शिक्षा लाहौर के कन्वेंट आॅफ जीसस एण्ड मैरी से प्राप्त की। फिर यहीं के किनयर्ड कॉलेज से बीए किया और 1978 में पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री हासिल की।  

सामाजिक कुरीतियों और नाइंसाफी के खिलाफ विद्रोह भले ही आसमा की रगों में खून बनकर दौड़ रहा था, लेकिन ये उतना आसान भी नहीं था। आज दुनिया जिसे एक महान अधिवक्ता और प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रही है, धार्मिक बंधनों के कारण वह भी एक दिन आम लड़की की तरह अपने बाप से वकालत करने के लिए मिन्नतें करती और दुहाइयां देती फिर रही थी। लोग उसके दुख से परिचित तो थे लेकिन हां में हां मिलाने वाला कोई नहीं था, क्योंकि उन्हें एक लड़की के सुनहरे भविष्य से ज्यादा बेकार के सामाजिक बंधनों की चिंता थी। ऐसे में किसी लम्हे ने उसे ताकतवर बनने की सलाह दी। बस फिर क्या था। आसमा ने समय के बिछाए जाल को तोड़ फेंका और किसी से मदद मांगने की बजाए खुद काफिले का नेतृत्व करने की ठान ली।

1980 में उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की और फिर 1982 में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अजीब बात है कि उन्होंने केस जीतने के दांव-पेंच सीखने की बजाए उसूलों की लड़ाई लड़ने को तरजीह दी। कौन जानता था कि महज 18 बरस की आयु में अपने वालिद मलिक गुलाम जीलानी की जेल से रिहाई का मुकदमा दायर कर लंबी लड़ाई लड़ने वाली दुबली-पतली सी इस लड़की में इतना दम-खम होगा। बताते चलें कि ‘आसमा जीलानी केस’ नाम से मशहूर ये मामला पाकिस्तानी न्यायपालिका में एक मील का पत्थर की हैसियत रखता है। 1972 फौजी तानाशाह याह्या खान की सरकार ने आसमा के पिता मलिक जीलानी को मार्शल लॉ के तहत हिरासत में लिया थ। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने याह्या खान को सत्ता हथियाने का दोषी करार दिया। पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय भी ये फैसला सुनाने की हिम्मत तब जुटा सका, जब यहया खान सत्ता से बाहर हो चुके थे।

फिर याह्या खान क्या, आसमा ने उसूलों की खातिर अपने दौर के हर हुक्मरां का विरोध किया चाहे वो अय्यूब खां हों या फिर जुल्फिकार अली भुट्टो और उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो। जनरल जियाउलहक के कार्यकाल में तो उन्होंने लोकतंत्र की बहाली और हुदूद व ईशनिंदा कानूनों के खिलाफ बहुत मुखर होकर आवाज बुलंद की। पाकिस्तान की स्थापना के साथ ही चीन की दीवार की तरह मजबूत हो चुके मजहबी चरमपंथ पर जबरदस्त कुठाराघात किया। इंसाफ की लड़ाई में पुलिस के लाठी-डंडे भी खाए और घर में नजरबंद भी की गईं, लेकिन जालिम लोगों के सामने कभी हथियार नहीं डाले। यहां तक कि बलोच नेता नवाब बुग्ती से एक बार मिलने के लिए जाते समय उन पर गोलियों से हमला किया गया। इस पर उन्होंने कहा कि तुम्हारी गोलियां खत्म हो जाएंगी लेकिन मेरा सफर नहीं खत्म होगा।

वह पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की अध्यक्ष बनने वाली पहली महिला थी। 1987 में बने पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की वह सह-संस्थापक थीं और 1993 में इसकी अध्यक्ष भी बनीं। पाकिस्तान में उन्हें सितारे-इम्तियाज और हिलाले-इम्तियाज जैसे नागरिक सम्मानों से नवाजा भी गया। न्याय और मानवाधिकारों की दिशा में किए गए उनके अनथक प्रयासों को दुनिया-भर में सराहा गया। वह हमेशा भारत-पाक वार्ता की धुर समर्थक रहीं। इसीलिए आसमा को हमारे यहां लोगों ने शांति-दूत माना। इसके बरक्स पाकिस्तान ने उन पर भारतीय एजेंट होने का आरोप लगाया। शायद यही वजह है कि पाकिस्तान सरकार ने उनकी अंतिम विदाई को राष्ट्रीय सम्मान देने से परहेज किया। लेकिन आसमा तो गलत परम्पराएं तोड़ने के लिए ही पैदा ही हुई थीं, इसलिए उनकी मौत भी सामाजिक कुरीति तोड़ने की एक मिसाल बन गई। दरअसल कर्नल कद्दाफी स्टेडियम में उनकी नमाजे जनाजा का सारा प्रबंधन न केवल औरतों ने संभाला बल्कि मर्दों के साथ खड़े होकर ये कहकर नमाजे-जनाजा अदा भी की कि आसमा लैंगिक समानता की पुरोधा थीं। पाकिस्तान के इतिहास में ये एक दुर्लभ दृश्य रहा होगा। यानी अंतिम आरामगाह में जाने से पहले भी आसमा ये पैगाम दे गईं कि उनके अधूरे मिशन को पूरा करने के लिए पूरी महिलाओं की एक पूरी जमात तैयार हो चुकी है।

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