सदुद्दीन ओवैसी साहब ने सरहद पर देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों की शहादत का अपमान किया है। यह देश शहीदों का धर्म नहीं देखता। ऐसा करना किसी भी देश के लिए घातक होगा। ओवैसी ने जम्मू-कश्मीर के सुंजवान में आतंकी हमले में बलिदान होने वाले सेना के पांच जवानों के धर्म का जिक्र करके अपना छोटापन ही दिखाया है। अपने देश की सेना को धर्म के आधार पर तोड़ने-बांटने का कुकृत्य करने की यह चेष्टा राष्ट्रविरोधी कृत्य है। इसके लिए ओवैसी को देश से माफी मांगनी चाहिए या फिर उनपर सेना में धार्मिक आधार पर दंगा करवाने की कोशिश करने के आरोप में अपराध कायम होना चाहिए।

पहले भारतीय, फिर और

निश्चित रूप से ओवैसी की टिप्पणी से हर राष्ट्रभक्त आहत हुआ है। साम्प्रदायिक राजनीति करने और हर वक्त कुछ न कुछ ऊटपटांग बोलकर मीडिया में बने रहने में माहिर ओवैसी सेना को भी सांप्रदायिकता का चश्मा पहनकर ही देख रहे हैं। समझ लीजिए कि भारतीय सेना के शूरवीर अपने को पहले भारतीय मानते हैं, बाद में कुछ और। यह भावना उनमें कूट-कूट कर भरी होती है। आपको मालूम ही होगा कि 1971 की जंग के दौरान भारतीय सेना के प्रमुख पारसी मतावलंबी फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ थे और ढाका विजय अभियान को लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आ. जैकब और इनके बॉस लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. अरोड़ा देख रहे थे। वो क्रमश: यहूदी और सिख थे। लेकिन, ये सभी सबसे पहले भारतीय थे।

पूरा देश रणभूमि के वीरों और शहीदों को दिल से नमन करता है। देश को इनके मजहब से कोई लेना-देना नहीं। देश तो अपनी सेना और सैनिकों का हृदय की गहराई से सम्मान करता है। पर वोटों के लिए टुच्ची राजनीति करने वाले ओवैसी को यह बात कहां समझ में आयेगी। क्या उनको एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ के संबंध में पता नहीं है? वे 1 सितंबर, 1978 से 31 अगस्त, 1981 तक भारतीय वायुसेना के चीफ थे? वे फाइटर पायलट थे। उन्होंने 1965 और 1971 की जंगों में पाकिस्तान पर जमकर प्रहार किया था। क्या उन्हें उनके मजहब के आधार पर वायुसेना में शिखर पद मिला था या फिर उनकी देशभक्ति और कर्तव्य परायणता के लिए मिला था?

देश बड़ा

ये याद रखने की आवश्यकता है कि भारत और हिन्दू एक-दूसरे के पर्याय हैं। उपासना पद्धति बदलने से किसी के पुरखे नहीं बदलते। इस्लामिक मामलों के विद्वान मौलाना उमैर इलियासी अपने को भगवान कृष्ण का वंशज बताते हैं। वे आपसे मिलते हैं तो ‘आदाब’ के साथ-साथ, लगे हाथ, ‘राधे-राधे’ भी कहने से परहेज नहीं करते। कहते हैं, ‘क्या मैं या कोई अपने पूर्वजों को भूल सकता है?’ देश को ओवैसी जैसे नहीं, बल्कि उमैर इलियासी सरीखे मुसलमानों की दरकार है, जिनके लिए धर्म देश से बड़ा न हो।

निरादर वीर अब्दुल हमीद

ये वास्तव में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि जनता के प्रतिनिधि होकर भी ओवैसी जी अपने बयान से शहीद अब्दुल हमीद और शहीद मोहम्मद हनीफुद्दीन सरीखे भारतीय सेना के उन शूरवीरों का अपमान करते हैं, जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। शहीद अब्दुल हमीद गाजीपुर (उ.प्र.) के थे। 1954 में सेना में शामिल होने के बाद उन्हें सेवाकाल में सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल से सम्मानित किया गया था। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें महावीर चक्र और परमवीर चक्र प्राप्त हुआ। इस जंग में भारत विजय की कहानी अब्दुल हमीद सरीखे शूरवीरों के रणभूमि में जौहर दिखाए बिना नामुमकिन थी। 8, सितम्बर 1965 की रात पाकिस्तान द्वारा भारत पर हमला करने पर उस हमले का जवाब देने के लिए भारतीय सेना के जवान मुकाबला करने के लिए खड़े हो गये। अमर शहीद अब्दुल हमीद पंजाब के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे। पाकिस्तान ने उस समय अपराजेय माने जाने वाले अमेरिकी पैटन टैंकों के साथ, खेमकरन सेक्टर के असल उताड़ गांव पर हमला कर दिया। वहां पर भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और ना ही बड़े हथियार। लेकिन उनके पास था- भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का हौसला। भारतीय सैनिक अपनी साधारण थ्री नॉट थ्री रायफल और लाइट मशीनगन के साथ ही पैटन टैंक के हमले का सामना करने लगे। हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास गन माउंटेड जीप थी, जो पैटन टैंकों के सामने एक खिलौने के सामान थी। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में ही बैठ कर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर हिस्सों पर सटीक निशाना लगाकर उन्हें एक-एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने  इस तरह सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को ध्वस्त कर असल उताड़ गांव को उन टैंकों की कब्रगाह बना दिया। आज भी देश का बच्चा-बच्चा हवलदार अब्दुल हमीद को कृतज्ञता से स्मरण करता है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से कुछ माह पहले रिटायर हुए उप कुलपति मेजर जनरल जमीरुद्दीन शाह ने दशकों तक भारतीय सेना की सेवा की। उन्होंने भी 1965 और 1971 की जंगों में शत्रु के दांत खट्टे किये। इसी तरह क्या कोई करगिल की जंग में शहीद हुए लेफ्टिनेंट हनीफ मोहम्मद के शौर्य को भूल सकता है? कारगिल जंग में शहीद हुए सैनिकों की दिलेरी की दास्तां आज भी देशवासियों की जुबान पर है। पाकिस्तानी सैनिक मई 1999 में करगिल सेक्टर में घुसपैठियों की शक्ल में घुसे और नियंत्रण रेखा पार कर हमारी कई चोटियों पर कब्जा कर लिया। दुश्मन की इस नापाक हरकत का जवाब देने के लिए आर्मी ने आॅपरेशन विजय शुरू किया, जिसमें 30,000 भारतीय सैनिक शामिल थे। एयरफोर्स ने आर्मी को सपोर्ट करने के लिए 26 मई को आॅपरेशन सफेद सागर शुरू किया और नौसेना ने कराची तक पहुंचने वाले समुद्री मार्ग से सप्लाई रोकने के लिए अपने पूर्वी इलाकों के जहाजी बेड़े को अरब सागर में लाकर खड़ा कर दिया। करगिल जंग में दिल्ली के मयूर विहार निवासी मोहम्मद हनीफउद्दीन ने अपनी बहादुरी से दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे।

यह देश ओवैसी या किसी अन्य को अपनी सेना को धर्म या जाति के आधार बांटने की अनुमति नहीं देगा। अब इस तरह के बीमार तत्वों को कौन बताये कि सेना के सभी केन्द्रों में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च वगैरह सभी मजहबों के इबादतगाह होते हैं। सेना में सभी मजहबों का समान आदर होता है। सभी एक साथ सभी पर्वों में खुलकर भाग लेते हैं। एक बात समझ ली जानी चाहिए कि किसी भी शहीद का धर्म नहीं होता, ठीक उसी तरह से जैसे कि आतंकी का भी धर्म नहीं होता। दिल्ली पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन के मोस्ट वांटेड आतंकी आरिज खान उर्फ जुनैद को गिरफ्तार किया है। 165 लोगों का हत्यारा जुनैद पिछले 10 साल से फरार था। जुनैद दिल्ली के जामिया नगर इलाके में 13 सितंबर, 2008 को हुए बटला हाउस एनकाउंटर का मुख्य सूत्रधार था। उस मुठभेड़ के बाद ओवैसी, दिग्विजय सिंह, केजरीवाल और कांग्रेस के तमाम नेता उस मुठभेड़ को फर्जी बता रहे थे।

सलमान खुर्शीद ने प्रेस वक्तव्य तक दे दिया था कि जब सोनिया जी को बटला हाउस एनकाउंटर की खबर मिली तो वो रो पड़ी थीं। अब तो सच्चाई सामने आ गई है। इस देश में धर्म के नाम पर सियासत बंद होनी चाहिए। शहीद और आतंकी के बीच का अंतर समझा जाये। वर्ना ओवैसी जैसे नेता जम्मू-कश्मीर के सुंजवान में वीरगति को प्राप्त हुए शहीदों और जुनैद जैसे आतंकी को एक ही श्रेणी में रखते रहेंगे और देश को बांटने की कोशिश करते रहेंगे। े

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