तिहासिक इमारतें या किले अपने आप में कई कलाओं के केंद्र होते हैं। ऐसी जगहों पर मशहूर कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की जाए, तो ऐसे में यह कठिन हो जाता है कि ऐसी जगहों को क्या नाम दिया जाए? ऐसी जगहें कलाओं का समुच्चय हो जाती हैं। एक साथ गुथीं हुईं, एकदम अव्यक्त। ऐसी कृतियों को उन्हें निहारते हुए, जब आप उन्हें डिकोड कर रहे होते हैं, तब उस जगह की ऐतिहासिकता उसके अर्थ बदलने लगती हैं। कुछ ऐसी ही अनुभूति जयपुर में नाहरगढ़ किले में माधवेंद्र पैलेस के कला उद्यान में घूमते हुए मिलती है। यह अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है। कला प्रेमियों के लिए कला के रसास्वादन यहां बिखेर दिए गए हैं। एक ऐतिहासिक इमारत में अपने-अपने क्षेत्रों की विशिष्ट कलाकारों की कलाकृतियों का प्रदर्शन चाहे जिस उद्देश्य से किया गया हो, पर यहां घूम रहे लोगों की प्रतिक्रियाएं इस तरह के अपने अनूठे पहल के दूसरे आयाम भी खोलते हैं। साथ ही लोगों की कई तरह की प्रतिक्रियाएं हमारी कलाओं के प्रति नासमझी और उपेक्षा की पोल भी खोल देती हैं। इसलिए यहां आप अकेले ही न घूमे, बल्कि उस जनसमूह को साथ लेकर घूमें, तो आपके अनुभव बढ़ जाएंगे।  राजस्थान सरकार ने कला को बढ़ावा देने के लिए पिछले वर्ष दिसंबर में इस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। यह राजस्थान सरकार और साथ साथ आर्ट का संयुक्त आयोजन है। माधवेंद्र भवन को एक आर्ट गैलरी के रूप में परिवर्तित करने के लिए यहां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। इस प्रदर्शनी को पीटर नैगी, जो नेचर मोर्टे आर्ट लि. के डॉयरेक्टर हैं, ने क्यूरेट की है। इसमें 15 भारतीय और 09 अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। इनमें कुछ प्रसिद्ध नाम अरमान, हुमा भाभा, जेम्स ब्राउन, स्टीफन कॉक्स, अनीता दुबे, विभा गलहोत्रा, विक्रम गोयल, सुबोध गुप्ता, इवान हालवे, मैथ्यू डे, जैक्सन, हंस जोसेफ्सन, जितिश कल्लात, रीना कल्लात, मृणालिनी मुखर्जी, मनीष नाई, ज्ञान पंचल, प्रशांत पांडे, रविंदर रेड्डी, आरलेने सैचेट, एलएन तल्लूर आदि हैं। इन सभी कलाकारों की 53 कलाकृतियों का प्रदर्शन इस भवन में किया गया है। माधवेंद्र भवन का निर्माण महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय ने करवाया था। यह दो मंजिला भवन है, जो दस भागों में बंटा हुआ है। प्रत्येक भवन में शयन कक्ष, भंडार गृह, रसोई, शौचालय है। भवन के बीच में एक चौक स्थित है। भवन में उत्कृष्ट आराइश पर भित्ति चित्रों का अनूठा अलंकरण है। इन्हीं भवनों में इन कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है।

नाहरगढ़ किले के माधवेंद्र भवन में पूरे साल भर देश और विदेश के कलाकारों की 55 कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है। एक महल में कलाकृतियों का इस तरह से प्रदर्शन न केवल एक अच्छी पहल है, बल्कि यह पहली बार भी है।

गॉड आॅफ समथिंग

माधवेंद्र पैलेस में प्रवेश के साथ ही आंगन में हुमा भाभा की कलाकृति कांस्य प्रहरी के रूप में एक रिपेरशनिस्ट के रूप में हमारा स्वागत करती हुई प्रतीत होती है। यह मानवाकृति के रूप में है, जिसके नैन-नक्श चपटे घिसे हुए हैं, जो समय के प्रभाव को दिखाता है। मूर्ति काफी विशाल और दृढ़ है। इसका टेक्चर काफी रफ है। इसके नाम गॉड आॅफ समथिंग से लगता है कि यह किसी देवता की मूरत है, पर किसी धर्म विशेष का इस पर प्रभाव नहीं दिखता है। हुमा भाभा एक अमेरिकी मूर्तिकार हैं, जिनके अलंकारिक काम ऐब्सट्रैक्शन और विघटन से प्रभावित हैं। वे कला के इतिहास को सामने लाती हैं। भाभा ने अपनी मूर्तियों को किरदारों के रूप में पेश किया है। उनकी कृतियां अवशिष्ट पदार्थों से बनी होती हैं, जो उनमें राक्षसी व्यक्तित्व दिखाते हैं।

माइग्रेंट

स्मारक हमेशा नायकों के लिए बनाए जाते हैं, जो बड़े योद्धा या महान नेता के होते हैं। रविंदर रेड्डी उन उपेक्षित नायकों के स्मारक बनाते हैं, जो अपना परिवार चलाते हैं और बच्चों को पालते हैं। माइग्रेंट ऐसी ही महिला को सम्मान देने के लिए सृजित की गई है। माइग्रेंट यानी शरणार्थी अपने सिर और पीठ पर, उनके पास जो कुछ भी है, लादे एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए मजबूर होते हैं। कलाकार के लिए यही नायक हैं। कलाकार यहां न केवल उनके संघर्ष और बलिदान को स्वीकार करते हैं, बल्कि उनके गुणों को स्वीकार करते हुए उन्हें इज्जत बख्शते हैं। ये औरत की मूर्ति इसी बात का प्रतीक है। रेड्डी की आलंकारिक मूर्तिकला पूरे भारत में प्रसिद्ध है। उनकी कलाकृतियां मिस्र, भारत, ग्रीस और रोम की प्राचीन कला का संश्लेषण है।

द डे आॅफ्टर

अरमान की यह कलाकृति समय की रफ्तार और नश्वरता पर वक्तव्य है। क्लासिकल फ्रांसीसी शैली में फर्नीचर के सात टुकड़े एक साथ मिलकर बैठक कक्ष बनाते हैं। कलाकार ने उन्हें जला दिया है, ताकि वे उपयोग करने योग्य न बचे, पर उनका आकार बना रहे। अब इन अवशेषों को कांस्य की डरावनी सामग्रियों में डाला, जो नायकों और राजाओं के सार्वजनिक स्मारकों के लिए उपयोग किया जाता है। यह कलाकृति गुजरे राजवंशों का स्मारक और मानव जातियों के नश्वर होने का द्योतक है। अरमान फ्रांसीसी कला आंदोलन के संस्थापक पितरों में से एक हैं।

चोलेरिक, फ्लैगमैटिक, मेलांचोली, सैंग्यून

यह काफी बड़ी और विस्तृत मूर्ति है। भारती खेर की स्मारकीय कांस्य की यह प्रतिमा महिला पहचान की अधिकता को दर्शाती है। कभी यह योद्धा, कभी देवी, कभी चुड़ैल और कभी फरिश्ते जैसे समग्र रूप को प्रदर्शित करती है। इस मूर्ति का शीर्षक हमें बताता है कि इस कृति में गुस्सा और आवेग है, पर संपूर्ण रचना खुशहाली दिखाती है। इसी खुशहाली की हम उम्मीद करते हैं, जो महिलाओं को हर जगह मिले। यूके में पंजाबी प्रवासी की संतान भारती खरे अपनी कला के लिए दिल्ली में रहती हैं। उन्होंने नारीवाद, सजावट, राजनीति ओर सोसायटी के प्रतीकों की समस्याओं को कला के कई माध्यमों से उठाया है।

इनटॉलेरेंस

आंगन में ये दोनों मूर्तियां आमने-सामने हैं। दोनों एक संत के पैर पर बैठी हैं, जो ध्यान की मुद्रा में हैं। एक मूर्ति चट्टान का एक ढेर संभाले है और दूसरी एक टूटे पहिये को। आध्यात्मिकता के ये प्रतीक ताश की गड्डी की तरह गडमड हैं, जो नई, अचंभित करने वाली व्यवस्था के साथ आ रहे हैं। एलएन तल्लूर की मूर्तिकला भौतिक पहेली में सामग्री और संदर्भो को जोड़ती है, जो दर्शकों को हल करने के लिए बुलाती है। उनके कामों का अधिकतर हिस्सा मूल्य, परंपरा, प्रभाव और वंशावली से संबंधित विचारों में दिलचस्पी रखता है।

ऋषि

स्टीफन कॉक्स एक ब्रिटिश मूर्तिकार हैं जिन्हें पत्थर पर उनकी अखंड सार्वजनिक कलाकृतियों के लिए जाना जाता है। वे बीस वर्षों से तमिलनाडु के महाबलिपुरम के एक स्टूडियो में काम कर रहे है। उनकी रचनाएं मिस्र, भारत, ग्रीस और इटली के प्राचीन पत्थर की मूर्तियों की भाषा को संश्लेषित करती हैं। यह कृति ऋषि भी पत्थर पर बनाए गए न्यूनतम हस्तक्षेप का प्रतिनिधित्व करती है। इसका पत्थर बेसाल्ट एक ऐसी जगह से लिया गया है, जहां पृथ्वी के सबसे पुराने पत्थर पाए जाते हैं।

अननेक्सशन

जितिश कल्लात ने घरेलू उपयोग में आने वाले एक स्टोब (मिट्टी के तेल का चूल्हा) को अपनी अभिव्यक्ति का साधन बनाया है। एक स्टोब के आम आकार से कई गुना बड़ा बनाकर इसे पशुओं, पक्षियों और पौधों की एक मोटी परत से ढक दिया है। कलाकार ने इसमें उन जानवरों का इस्तेमाल किया है, जो एक दूसरे के साथ लड़ाई करते हैं। इस शहरी मध्यवर्ग की वस्तु के माध्यम से शहर की आक्रामकता और दैनिक संघर्ष करने वाले परिवारों की रोजमर्रा की मशक्कत दिखाता है। जितिश की ख्याति विभिन्न माध्यमों में काम करने की है। आम आदमी, उसकी छवि या आवाज, अक्सर उनके काम में दिखती है।

म्यूनिसिपल डेमोलिशन

आसिम वाकिफ की यह कलाकृति एक अवैध इमारत की तस्वीर दिखाती है। तस्वीर खुद पर मुड़ी हुई है, एक टूटी, अधूरी वस्तु की तरह। कलाकार ने यह अधूरा निर्माण एक उलटे वृक्ष पर लपेटा है और इसकी जड़ें आकाश की ओर इशारा करती है। इस कृति में मानवनिर्मित और प्राकृतिक रूप ऐसे आंधी स्वरूप मिलते है कि दर्शक एक की शुरूआत और दूसरे के अंत में अंतर नहीं कर पाते। आसिफ की कला में अक्सर रिसाइकिल की गई सामग्री और कचरे का इस्तेमाल होता है। वास्तुकला और शहरी नियोजन की उनकी पृष्ठभूमि उन्हें इन सामग्रियों की राजनीति, भ्रष्टाचार को देखने के लिए प्रेरित करती है।

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