एक अतिलोकप्रिय नेता आखिर इतना अलोकप्रिय कैसे बन जाता है, यह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा के केस को देखकर समझा जा सकता है। तमाम उठापठक के बाद आखिरकार जुमा को इस्तीफा देना पड़ा।


अंतत: दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने यह कहते हुए पद त्याग दिया कि एएनसी की तरफ से निर्धारित अविश्वास प्रस्ताव के नतीजे ने मुझे इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया है। हालांकि मैं अपने संगठन के फैसले से असहमत हूं, लेकिन मैं हमेशा एएनसी का एक अनुशासित सदस्य रहा हूं। दरअसल जुमा को डेडलाइन दी गयी थी कि वे अपने पद से त्याग पत्र दे दें, अन्यथा उनके खिलाफ अगले दिन संसद में अविश्वास प्रस्ताव आना तय है। यही वजह है कि उन्होंने संसद का सामना करने से पहले ही त्याग पत्र दे दिया। जैकब जुमा के साथ ऐसा होना पहले से ही तय था, लेकिन सवाल यह उठता है कि जो जुमा लगातार इस बात पर अड़े रहे कि वे अपने पद से नहीं हटेंगे, वे आखिर इसके लिए तैयार कैसे हो गये? दूसरा सवाल यह कि वर्ष 2007 में एक अतिलोकप्रिय नेता आखिर इतना अलोकप्रिय कैसे हो गया? एक बात और, वर्ष 2007 में जैकब जुमा अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए नामित हुए थे और उसी वर्ष 28 दिसम्बर को स्कॉर्पियन ने उच्च न्यायालय में जुमा पर धोखाधड़ी का धंधा करने, काले धन को वैध करने, भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के कई अभियोग चलाए थे, इस विरोधाभास को कैसे समझा जाए? आखिरी एएनसी अब तक हर मामले में जुमा को बचाती क्यों रही और अब ऐसा क्या हो गया कि वह उनके खिलाफ खड़ी हो गयी?

जैकब जुमा जब बलात्कार के आरोप में अदालत से बरी हुए थे उस समय एक अफ्रीकी अखबार ने लिखा था कि राजनीतिक नुकसान बेहिसाब है क्योंकि सत्तारूढ़ अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस अब एक खुलेआम विभाजित और लड़खड़ाता आंदोलन है। यह वास्तविकता थी क्योंकि एएनसी उसी समय से निरन्तर लड़खड़ाहट का शिकार रही और जैकब जुमा कारनामे पर कारनामे करते रहे। वर्ष 2016 में दक्षिण अफ्रीकी संसद के लिए हुए चुनावों में एएनसी की स्थिति काफी खराब रही, इसलिए कांग्रेस यह सोचने पर विवश हो गयी कि यदि उसने जुमा को नहीं हटाया तो वही खत्म हो जाएगी। यही वजह है कि कुछ समय पहले से जैकब जुमा को हटाने की पटकथा लिखी जाने लगी। इसकी पटकथा अंतिम पड़ाव पर उसी समय पहुंच गयी थी, जब अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) ने जुमा की पत्नी की बजाय सिरिल रामफोसा को अध्यक्ष चुना था। यहीं से यह स्पष्ट हो गया था कि अब पार्टी जैकब जुमा को और अधिक बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। रामफोसा के चुने जाने के बाद से जुमा पर राष्ट्रपति पद छोड़ने का दबाव बढ़ रहा था। उल्लेखनीय है कि जब जुमा के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला सामने आया था, तभी रामफोसा ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसलिए यह स्वाभाविक था कि वे अब जैकब जुमा को बर्दाश्त नहीं करते। ध्यान रहे कि रामफोसा के ऐतराज के बाद एएनसी ने जुमा को पार्टी नेता पद से हटाने का फैसला लिया था। इसलिए इस बात की संभावना अधिक थी अब पार्टी वही निर्णय लेगी जो रामफोसा चाहेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह रामफोसा द्वारा लिए गये व्यक्तिगत निर्णय का परिणाम है ? ऐसा लगता नहीं है क्योंकि जैकब जुमा की छवि पर पिछले वर्षों में इतने धब्बे लग चुके हैं कि एएनसी उन्हें साफ करने में असमर्थ थी।

एक अतिलोकप्रिय नेता आखिर इतना अलोकप्रिय
कैसे बन जाता है, यह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा
के केस को देखकर समझा जा सकता है। तमाम उठापठक के
बाद आखिरकार जुमा को इस्तीफा देना पड़ा।

आंतरिक दबावों के बाद भी जुमा पद से न हटने की जिद पाले रहे। वे बार-बार सफाई देते रहे कि उन्हें साजिशन पद से हटाया जा रहा है, इसलिए वे इस्तीफा देने वाले नहीं है। इसके ठीक विपरीत अनुपात में उनके खिलाफ विरोध और रोष बढ़ता गया। अंतत: रामफोसा ने पार्टी को अपना रुख बता दिया था कि अगर एक हफ्ते के अंदर जुमा पद नहीं छोड़ते, तो वह अपने स्तर से फैसला ले लेंगे। अभी भी जुमा तुरुप के पत्तों के रूप में ये दलीलें देते रहे कि इसी वर्ष ब्रिक्स सम्मेलन जोहान्सबर्ग में होना है इसलिए मेजबान देश के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में उन्हें उपयुक्त भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए और दक्षिण अफ्रीकी विकास समुदाय (एसएडीसी) की प्रस्तावित बैठक में भी उन्हें ही शिरकत करने का अवसर दिया जाना चाहिए। लेकिन उनके ये पत्ते बेकार साबित हुए। इसके बाद पत्नी टोबेका मदीबा जुमा ने एक और चाल चली। उन्होंने इंस्टाग्राम पर लिखा कि जैकब जुमा लड़ने को तैयार हैं और वह खुद को पश्चिमी देशों की साजिश का शिकार समझते हैं। उन्होंने आगे लिखा जो जुमा ने शुरू किया है, वे उसे खत्म करेंगे क्योंकि वे अटलांटिक महासागर के पार से आदेश नहीं लेते हैं। मतलब कि जुमा परिवार अब इसे विदेशी साजिश बताकर स्वयं को घोर राष्ट्रवादी और राष्ट्रहितैषी बताते हुए अपनी सत्ता बरकरार रखना चाह रहा था। लेकिन उनकी पत्नी शायद यह भूल गयीं थीं कि अब ये दांव बेसर हो चुके हैं। खास बात यह है कि अंत में जुमा यह स्वीकार कर चुके थे कि वे सही नहीं थे।

जैकब जुमा पिछले नौ साल से दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति हैं। इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था ठहर गई। बैंक और खनन कंपनियां देश में निवेश नहीं करना चाहती हैं। व्यक्तिगत रूप से जुमा के ऊपर कई गंभीर आरोप लग चुके हैं, जिनसे उनकी पार्टी परेशान थी। ध्यान रहे कि वर्ष 2016 में दक्षिण अफ्रीका के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जुमा ने अपने निजी आवास पर खर्च किया धन सरकार को न लौटाकर संविधान का उल्लंघन किया है। पिछले वर्ष एक अदालत ने यह भी कहा था कि 1999 के हथियार सौदे में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रैकेट चलाने और मनी लॉन्डरिंग के 18 मामलों का सामना करना होगा। इसके अतिरिक्त जुमा पर अनिवासी भारतीय गुप्ता बंधुओें के साथ मिलकर ‘स्टेट कैप्चर’ का भी आरोप लगाया है। उल्लेखनीय है कि स्टेट कैप्चर का मतलब ऐसे चरणबद्ध भ्रष्टाचार से है, जिसके तहत किसी को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की नीतियों को तोड़-मरोड़ दिया जाता है।

विशेष बात यह है कि जुमा यह तर्क देकर कि आरोप लगने से कोई दोषी सिद्ध नहीं हो जाता, अपने ऊपर लगने वाले आरोपों के खिलाफ अदालतों में लड़ते रहते थे और अदालत का फैसला आ जाने तक वे सुरक्षित रहते थे। इसके उदाहरण यौन दुर्व्यवहार व अन्य मामलों में देखा जा सकता है। इन सब मामलों में उनकी पार्टी भी इसे व्हाइट पीपल्स प्रोपोगैंडा बताकर उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान कर देती थी, लेकिन इस बार बाहरी शख्स के ऊपर ‘स्टेट कैप्चर’ का आरोप लगा है। इसे पार्टी सुरक्षा कवर नहीं दे सकती थी। हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि ह्यगुप्ता गेटह्ण या जिसे दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने ह्यजुप्ताह्ण (जुमा एवं गुप्ता को संयुक्त कर बनाया गया नाम) ने जुमा के करियर पर विराम लगा दिया जिसे मिटाने की क्षमता एएनसी में भी नहीं थी।

बहरहाल दक्षिण अफ्रीका की गाड़ी लम्बे समय से लड़खड़ाती हुई चलती रही थी। जुमा ने भ्रष्टाचार बढ़ाकर, विकास की गति धीमी कर और मुद्रा रैंड की साख को धक्का पहुंचाकर उसे रोकने का कार्य किया। इन सबने उनके पापुलर टच को बेहद दागदार बना दिया। अब देखना यह है कि रामफोसा दक्षिण अफ्रीका को इस दलदल से निकाल पाते हैं या नहीं अथवा अभी भी जैकब जुमा इससे उबरने देते हैं अथवा नहीं क्योंकि जैकब जुमा की 1999 से लेकर अब तक भ्रष्टाचार की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है और दक्षिण अफ्रीका की न्याय पालिका दक्ष, स्वतंत्र एवं सक्षम है।

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