बजट सत्र का दूसरा चरण पांच मार्च से शुरू होगा जिसकी रूपरेखा पर विचार हो चुका है। इस चरण में सत्ता पक्ष का जोर कुछ ऐसे रुके हुए विधेयकों को पारित करवाने पर हो सकता है, जिन्हें चुनावी रूप से भुनाया जा सके। दूसरी ओर विपक्ष ऐसे कामों में अड़ंगा डालने के पक्ष में होगा।


म बजट, आर्थिक सर्वेक्षण और राष्ट्रपति के अभिभाषण जैसे महत्वपूर्ण विषयों के साथ संसद के बजट सत्र के पहले चरण की समाप्ति हो गई। आम बजट, राष्ट्रपति के अभिभाषण और सत्ताधारी एनडीए के दो सबसे प्रमुख नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संसद में दिए गए भाषणों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार इस वर्ष के अंत तक कुछ राज्यों के साथ-साथ लोकसभा चुनावों को संपन्न कराने के विकल्प पर पूरी गंभीरता के साथ विचार कर रही है। यह बजट मोदी सरकार का आखिरी पूर्णकालिक बजट है। इस बजट में जिस तरह से देश के किसानों और ग्रामीण भारत को केंद्र में रखा गया है और आम लोगों के स्वास्थ्य से संबंधित एक भारी-भरकम कल्याण योजना का आरंभ किया गया है, इससे स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व समय से पहले लोकसभा चुनाव करवाने के मूड में है। इसी तरह राष्ट्रपति का अभिभाषण और फिर प्रधानमंत्री का भाषण भी आने वाले लोकसभा चुनाव के एजेंडे की नींव रखता प्रतीत होता है।

आम बजट और राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद जाहिरतौर पर अब केंद्र सरकार की निगाह लंबित पड़े कुछ आवश्यक विधेयकों को पारित करवाने पर होगी। इस दिशा में जोरदार प्रयास तब आरंभ किए जाएंगे जब 5 मार्च से संसद की बैठक आरंभ होगी। राष्ट्रपति के अभिभाषण से साफ जाहिर है कि मोदी सरकार मुस्लिम महिलाओं के बीच ट्रिपल तलाक के मुद्दे को जोरशोर से भुनाने की तैयारी कर रही है। पूरी कोशिश होगी कि इसे इसी सत्र में पास कर लिया जाए। बजट सत्र के आरंभ होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से आपसी सहमति के जरिए तीन तलाक विधेयक को पारित करने की गुजारिश की थी। उन्होंने कहा था कि मैं देश के सभी राजनीतिक दलों से आग्रह करता हू कि तीन तलाक विशेषकर मुस्लिम महिला के हक को हम इस सत्र में पारित करें। 2018 की एक उत्तम भेंट हमारी मुस्लिम महिलाओं को हम दें। कोई बड़ी बात नहीं होगी कि इस बिल को लेकर कुछ मुद्दों पर सरकार विपक्ष की बात मान ले। इसके अलावा राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अब बिना पुरुषों के साथ भी हज जाने की सुविधा शुरू की है। साफ नजर आ रहा है कि एनडीए की तरफ से इस चुनाव में सरकार के महिलाओं के लिए किए गए कामों को जोरदार रूप से प्रचारित करने की योजना है। राष्ट्रपति कोविंद ने केंद्र सरकार की ओर से शुरू की गई योजनाओं के बारे में बताते हुए ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ और उज्जवला जैसी योजनाओं का भी जिक्र किया।

पांच मार्च को बजट सत्र के अगले चरण का आरंभ होने के बाद, आम बजट से जुड़ी प्राथमिकताओं के अलावा सरकार जिन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने पर जोर देगी उनमें तीन तलाक संबंधी कानून के अलावा ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाला विधेयक भी है जिसे पारित कराने की पूरी कोशिश की जाएगी। ये दोनों विधेयक राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। बजट सत्र की पूर्व संध्या पर हुए सर्वदलीय बैठक के बाद संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने संवाददाताओं से कहा भी था कि सरकार बजट सत्र के दौरान एक बार में तीन तलाक संबंधी विधेयक को पारित कराना सुनिश्चित करने के लिए हर प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि हम आम सहमति बनाने के लिए विभिन्न दलों से बातचीत करेंगे। लेकिन बजट सत्र के पहले चरण में सरकार और विपक्ष के बीच जिस तरह की कड़वाहट देखी गई उससे स्पष्ट है कि इन महत्वपूर्ण विधेयकों पर आम सहमति बनाना एक बहुत ही मुश्किल काम होगा। बजट सत्र के दौरान सरकार जहां राज्यसभा में लंबित एक बार में तीन तलाक संबंधी विधेयक के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने संबंधी विधेयक को पारित कराना चाहती है, वहीं विपक्षी दल कानून एवं व्यवस्था की स्थिति, संवैधानिक संस्थाओं पर कथित प्रहार और जीएसटी तथा कारोबारियों की स्थिति, किसानों की समस्या, उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा जैसे विषयों पर जोर देने के मूड में हैं। सरकार के लिए राज्यसभा में इन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाना आसान नहीं होगा। शीतकालीन सत्र के दौरान संसद के उच्च सदन राज्यसभा में ट्रिपल तलाक बिल पर सरकार और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव हआ था। एक ओर कांग्रेस इस विधेयक को संसदीय समिति में भेजने पर अड़ी है, वहीं सरकार इस बिल को संसदीय समिति में भेजने से इनकार कर रही है। राज्यसभा में विपक्ष की मांग है कि ट्रिपल तलाक बिल में कई खामियां हैं और उसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए। विपक्ष तीन तलाक विधेयक में कई गंभीर त्रुटियां और कमियां होने का दावा करते हुए कह रहा है कि अगर यह विधेयक वर्तमान स्वरूप में पारित होकर कानून बन जाता है, तो इससे मुस्लिम महिलायें दोहरे अत्याचार का शिकार होंगी। जबकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में कहा था कि कांग्रेस अप्रत्यक्ष रूप से तीन तलाक बिल का विरोध कर रही है। वैसे इस बिल के पारित होने और न पारित होने, दोनों ही स्थितियों में भाजपा का ही फायदे में रहना तय है। अगर पारित हो गया तो सरकार इसका सारा श्रेय ले जाएगी। और अगर पारित नहीं हुआ तो भाजपा को यह कहते हुए विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने का अवसर मिल जाएगा कि वह मुस्लिम महिलाओं को इस तीन तलाक के दानव से आजाद कराना नहीं चाहता।

ट्रिपल तलाक और ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक के अलावा इस बजट सत्र के अगले चरण में मजदूरी संहिता विधेयक, मुफ्त और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार, 2017 जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी जोरदार चर्चा होगी और सरकार की तरफ से उन्हें पारित करवाने के प्रयास होंगे। विपरीत लिंगी (अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2016 और किराये की कोख (नियमन) विधेयक जैसे लंबे समय से लंबित विधेयकों पर भी लोकसभा में चर्चा होगी, लेकिन पिछले दिनों संसद में जो दृश्य थे, उन्हें देखते हुए कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर बजट सत्र का बहुत बड़ा हिस्सा हंगामें की भेंट चढ़ जाए। ऐसा होने की संभावना इसलिए भी है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही चुनावी मूड में नजर आ रहे हैं।

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