प्रधानमंत्री के अरुणाचल दौरा के कई मायने निकल रहे हैं, फिलहाल वे इस यात्रा के दौरान पूर्वोत्तर के लोगों को यह भरोसा कराने में सफल रहे हैं कि इस क्षेत्र को अब दिल्ली का मोहताज नहीं होना होगा।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 फरवरी के अरुणाचल दौरे का यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए, तो साफ जाहिर होता है कि प्रधानमंत्री द्वारा किए गए उद्घोष की गूंज पूर्वोत्तर के 3 राज्यों मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा में हो रहे विधानसभा चुनाव के मैदान तक सुनाई दी। प्रधानमंत्री ने अपने अरुणाचल यात्रा के दौरान जिस प्रकार से अरुणाचल समेत पूरे पूर्वोत्तर के प्रति अपनी संवेदनाएं दिखाई उससे न सिर्फ ईटानगर के लोगों को बाग-बाग होते देखा गया बल्कि मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा के लोगों के दिलों को भी यह छुए बिना नहीं रहा।

वैसे तो प्रधानमंत्री के वक्तव्य की हर एक पंक्ति में पूर्वोत्तर के प्रति कुछ करने की उनकी ललक झलकती है, लेकिन उन्होंने जिस प्रकार से दिल्ली की सरकार को पूर्वोत्तर के राज्यों के बीच पहुंच कर नीतियां निर्धारित करने संबंधी अपने निर्देश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पूर्वोत्तर में आकर अपनी बैठक आयोजित करने के आग्रह से लोगों को अवगत कराया, उससे पूर्वोत्तर की आम जनता के बीच एक बहुत बड़ा संदेश गया है।

कमोवेश पूर्वोत्तर के लोगों के दिलों में इस बात को लेकर हमेशा ही क्षोभ देखा जाता है कि दिल्ली से उनके लिए निर्णय लेकर उनके ऊपर थोपे जाते हैं। वही बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हेड आॅफिस कोलकाता, मुंबई में रखती हैं, जबकि व्यापार यहां पर आकर करती हैं। ये दोनों ही मुद्दे लोगों की संवेदना से सीधे जुड़े हुए हैं। इस बारे में चर्चा करके प्रधानमंत्री ने लोगों के मन को गहराई से छुआ है।

ईटानगर में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो बातें कही थीं, उन बातों में सीधे उनकी अरुणाचल यात्रा भी इस चुनाव के मौसम में आने की मंशा भी साफ झलक रही है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि अरुणाचल से सूर्य का उदय होकर रोशनी पूरे देश में फैलती है। और, दूसरी बात यह भी कही थी कि यदि किसी को सूर्योदय देखना है, तो उसे अरुणाचल की ओर देखना ही होगा।

उन्होंने बड़े मनोवैज्ञानिक तरीके से इस पूरे कार्यक्रम का अपने संबोधन में ताना बाना बुना। ऐसा ही प्रतीत होता है अरुणाचल में उनके द्वारा कही गई बातें पूरे देश में फैलेगी। खासकर पूर्वोत्तर के 3 राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के गलियारों तक तो जरूर ही गूंजेगी। इसको भांप कर उन्होंने अपने मन की बात अरुणाचल प्रदेश में जाकर कही। अपने संबोधन के जरिए प्रधानमंत्री को पूर्वोत्तर वासियों को यह समझाने में सफलता मिली कि उनके दिल में पूर्वोत्तर के लोगों के लिए कितना स्नेह है। उनके मन में पूर्वोत्तर को विकसित बनाने के प्रति कितनी ललक है। यह दोनों ही बातें लोगों को समझाने में प्रधानमंत्री अपने अरुणाचल भ्रमण के दौरान सफल रहे।

ऐसा कहा जा सकता है प्रधानमंत्री ने ईटानगर के मंच से पूर्वोत्तर के लोगों को आईना दिखाया, जिसमें साफ झलक रहा था कि यह सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए क्या कर रही है और आने वाले दिनों में क्या करने जा रही है। प्रधानमंत्री ने यह भी संदेश दिया कि उनके पास पूर्वोत्तर राज्यों के लिए विशेष समय है। जैसा कि अन्य प्रधानमंत्रियों के पास नहीं होता है। प्रधानमंत्री के संबोधन कि एक बड़ी बात यह भी कही थी कि पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय डोनर द्वारा जो दिल्ली में बैठकर पूर्वोत्तर के विकास की योजनाएं तैयार करता था, उस संस्कृति को समाप्त किया जा रहा है। इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि डोनर मंत्रालय पूर्वोत्तर के राज्यों में बैठकर यहां के लोगों के साथ विचार-विमर्श करके ही पूर्वोत्तर के लिए योजनाएं तैयार करें और ऐसा 3 वर्षों से हो रहा है। यही वजह है कि पूर्वोत्तर के विकास के लिए एक से बढ़कर एक योजनाएं इस दरम्यान लागू की गई हैं।

सत्ता में आते ही मोदी ने जिस प्रकार से लुक ईस्ट पॉलिसी को एक्ट ईस्ट पॉलिसी में तब्दील कर पूर्वोत्तर के विकास के प्रति अपनी गंभीरता दिखाई और एक्ट ईस्ट पॉलिसी के जरिए पूर्वोत्तर राज्यों को भारत के विकास का इंजन बनाने के लिए सभी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। चाहे वह एयर कनेक्टिविटी की बात हो, रेल, सड़क, जल परिवहन या फिर साइबर कनेक्टिविटी। लंबे अरसे से कनेक्टिविटी की समस्या को झेल रहे पूर्वोत्तर के राज्यों के विकास का सीधा संबंध कनेक्टिविटी से है। इन राज्यों की दुर्गम भौगोलिक स्थिति की वजह से प्राकृतिक साधन संसाधनों की प्रचुरता होते हुए भी यहां निर्धनता व्याप्त है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी को लेकर कार्य करना शुरू किया। उन्होंने न केवल पूर्वोत्तर के लिए एक से बढ़कर एक नई योजनाएं लागू की बल्कि पिछली सरकारों के समय में शुरू की गई योजनाओं के प्रति भी गंभीरता दिखाकर उन सभी योजनाओं को शीघ्रतापूर्वक पूरा करवाया। इस दिशा में मणिपुर की 60 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता वाली पनबिजली परियोजना और धोला सदिया पुल को चालू करवा कर एक तरफ से विकास का रास्ता साफ कर दिया। इस पानी बिजली योजना के चालू हो जाने से क्षेत्र की बिजली की समस्या का स्थायी समाधान तो हुआ है, साथ ही विकास की योजनाओं को लागू करने के लिए आवश्यक पड़ने वाली बिजली भी स्थानीय स्तर पर भी उपलब्ध होना भी सुनिश्चित हो गया। उड़ान योजना शुरू करके पूर्वोत्तर के राज्यों को दक्षिण एशिया के देशों से सीधे जोड़ना, दक्षिण एशिया के देशों के वाणिज्य दूतावास स्थापित करवाना, जल परिवहन की दिशा में कार्य शुरू करना, साइबर कनेक्टिविटी के लिए काम शुरू कर देना, यह सभी अच्छे कार्य सरकार द्वारा किए गए। इससे पूर्वोत्तर के विकास का एक नया आयाम शुरू हो सकेगा। यह बातें पूर्वोत्तर की जनता भी भली-भांति जानती है। प्रधानमंत्री ने ईटानगर में अपने संबोधन में यह बताया कि सिर्फ अरुणाचल प्रदेश के लिए केंद्र सरकार का सड़क परिवहन मंत्रालय 18,000 करोड़ रुपये खर्च करके राष्ट्रीय राजमार्ग तथा राज्य की ग्रामीण सड़कों का निर्माण करवा रहा है। ऐसा सिर्फ अरुणाचल में ही नहीं हो रहा है बल्कि पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में वहां की आवश्यकता के अनुरूप योजनाएं बनाकर उन पर काम चल रहा है।

इन सभी बातों को इस चुनाव के मौके पर अरुणाचल के सूर्योदय की धरती से कहने के पीछे मोदी की जो मंशा थी वह पूरी हुई है। प्रधानमंत्री इन तीनों राज्यों के लोगों को यह संदेश देने में भी सफल रहे कि उनकी सरकार न तो मुस्लिम विरोधी है, न ईसाई विरोधी, न बौद्ध विरोधी, बल्कि यह सरकार विकास समर्थक है और सबका साथ, सबका विकास का नारा सिर्फ नारा भर नहीं है। जैसा कि उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों में काम करके साबित किया है। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के इस अरुणाचल भ्रमण को यह कहा जा सकता है कि अरुणाचल से सूरज की किरणें देश के बाकी हिस्से में कुछ हार कर पहुंचती है, लेकिन अरुणाचल से प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया संदेश सीधे पूर्वोत्तर के चुनावी महासमर में मतदाताओं के दिलों तक उतर गया।

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