भारतीय समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव होने की बात लंबे समय से कही जाती रही है। सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद आज भी देश के कई हिस्सों में महिलाओं को दोयम दर्जे का ही माना जाता है। लेकिन यह स्थिति ज्यादातर समाज के निम्न और मध्य आयवर्ग में ही देखी जाती रही है। लेकिन हाल में ही हुए एक सर्वेक्षण में सामने आये तथ्य काफी चौंकाने वाले हैं। इसके मुताबिक उच्च वर्ग में भी महिलाओं के साथ बराबर भेदभाव होता रहता है। विशेष रूप से कॉरपोरेट सेक्टर में वेतन के मामले में यह भेद-भाव स्पष्ट नजर आता है।

सीआईआई सैलरी सर्वे के अनुसार वेतन निर्धारण के मामले में पूरी दुनिया में महिलाओं और पुरुषों के बीच स्पष्ट अंतर दिखता है। लेकिन भारत में यह अंतर कुछ ज्यादा ही है। सर्वे में बताया गया है कि भारत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक का निर्धारण करने वाली देश की तीस शीर्षस्थ कंपनियों में महिला निदेशकों को पुरुष सहयोगियों की तुलना में औसतन 46 फीसदी कम वेतन पर काम करना पड़ता है। किसी भी कंपनी का सर्वोच्च कार्यकारी निकाय उसका निदेशक मंडल होता है और इन तीस बड़ी कंपनियों के निदेशक मंडल का कोई भी सदस्य निम्न या मध्य आयवर्ग का नहीं है। इन कंपनियों के शीर्ष पदों पर वेतन निर्धारण में होने वाला यह भेदभाव स्पष्ट रूप से भारत में स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत को चुनौती देता है। महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि सरकार और नियामक संस्थाओं की कोशिशों के बावजूद आज भी बड़ी कंपनियों के निदेशक मंडल में महिलाओं की संख्या नगण्य है। इन तीस कंपनियों के कुल 396 निदेशकों में से महिलाओं की संख्या सिर्फ 46 है और यदि औसत वेतनमान की बात की जाये तो पुरुषों को मिल रहे औसतन 2.6 करोड़ रुपये के पैकेज की तुलना में उन्हें औसतन 1.4 करोड़ रुपये का ही पैकेज मिलता है। इसी तरह इन कंपनियों के स्वतंत्र निदेशकों की बात करें, तो कुल 133 निदेशकों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 25 है और उन्हें पुरुषों के औसतन 50.8 लाख रुपये के वेतनमान की जगह 36.3 लाख के वेतनमान पर ही काम करना पड़ता है।

निदेशक मंडल में महिलाओं की यह संख्या भी कंपनी ऐक्ट 2013 की वजह से नजर आ रही है, जिसके जरिये शेयर बाजार में सूचीबद्ध हर कंपनी के निदेशक मंडल में कम से एक महिला का होना बाध्यकारी कर दिया गया है। इसके साथ ही सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड आॅफ इंडिया (सेबी) की कड़ाई की वजह से भी सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में महिलाओं की संख्या कुछ बढ़ी है। लेकिन अभी भी यह संख्या इतनी नहीं हुई है कि वे वेतनमान को लेकर जारी भेदभाव की स्थिति को खत्म कर पाने की दिशा में अपनी ओर से कोई पहल कर सकें।

कार्य विभाजन में भेदभाव

इस संबंध में भारतीय कंपनी बायोकॉन की अध्यक्ष तथा प्रबंध निदेशक किरण मजूमदार शॉ जो इंफोसिस के निदेशक मंडल की सदस्य भी हैं, ने सीआईआई की सर्वे टीम को बताया था कि महिला और पुरुष निदेशकों के वेतनमान में अंतर की एक मुख्य वजह निदेशक मंडल के बीच का कार्य का विभाजन भी है। निदेशक मंडल में महिला निदेशकों के जिम्मे मुख्य रूप से कर्मचारी कल्याण या मानव संसाधन प्रबंधन का ही काम दिया जाता है। इन कामों को कंपनियों के विकास की दृष्टि से कम महत्व का समझा जाता है और इसी वजह से इनका वेतनमान भी अपेक्षाकृत कम होता है। वहीं वित्त प्रबंधन, अंकेक्षण या शोध तथा विकास का काम ज्यादातर पुरुष निदेशकों के पास होता है और काम की महत्ता के मुताबिक उनका वेतनमान भी ज्यादा होता है। इसके साथ ही प्रतिद्वंद्वी माहौल में महिलाओं के काम को पुरुषों के काम की तुलना में कम प्रचारित और प्रोत्साहित किया जाता है। उनकी स्थिति ज्यादातर लो प्रोफाइल डायरेक्टर की ही होती है। इस तरह वेतन के मामले में भी वे अपनी ओर से ज्यादा दबाव नहीं बना पातीं और अपने पुरुष सहयोगियों से पिछड़ जाती हैं।

कॅरियर में ब्रेक

दूसरी ओर एबीसी कंसलटेंट्स (इंडिया) की संयुक्त निदेशक रूपानिशा चौधरी महिला और पुरुषों के बीच वेतनमान के अंतर को स्वाभाविक मानती हैं। उनका कहना है कि अपने कॅरियर के दौरान अधिकांश महिलाओं को अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की वजह से काम से ब्रेक लेना पड़ता है। यह ब्रेक बहुधा विवाह, मातृत्व या फिर बच्चों के कॅरियर को संवारने की चाह की वजह से होता है। भारतीय समाज के तानेबाने में महिलाओं के लिए इन जिम्मेदारियों की अनदेखी कर पाना संभव नहीं होता। कॅरियर में आने वाले इस तरह के ब्रेक की वजह से भी प्राय: महिलाएं वेतनमान की दौड़ में अपने पुरुष सहयोगियों से पिछड़ जाती हैं।

इसके साथ ही एक बड़ी वजह महिलाओं के काम की प्रकृति भी होती है। वेतनमान के विकास की दृष्टि से ज्यादा तेज माने जाने वाले मैनुफैक्चरिंग, एक्सप्लोरेशन, फाइनैंस या फिर सेल्स जैसे सेक्टर्स में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी 16 फीसदी ही है। जबकि मानव संसाधन, आॅफिस एडमिनिस्ट्रेशन या फिर एजुकेशन जैसे सेक्टर में महिलाओं की संख्या साठ फीसदी तक है। इनमें वेतनवृद्धि का ग्राफ तुलनात्मक रूप से धीरे-धीरे बढ़ता है। यही स्थिति अगर यथावत बनी रही तो महिलाओं के लिए भविष्य में भी अपने पुरुष सहयोगियों से वेतनमान के मामले में स्पर्द्धा कर पाना आसान नहीं होगा। रूपानिशा चौधरी कहती हैं कि लैंगिक समानता की बात सिद्धांत रूप में तो अच्छी लगती है, लेकिन प्रायोगिक रूप से यह तभी संभव है जब कि कॅरियर तय करते वक्त ही महिलाएं चुनौतीपूर्ण कॅरियर को भी खुले दिल से अपनाएं और सभी चुनौतियों का सामना करते हुए अपने पुरुष सहयोगियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करें।

जोखिम बनाम वेतनवृद्धि

इसी तरह मानव संसाधन के क्षेत्र में काम कर रही कंपनी ट्रांससर्च इंडिया के प्रबंध साझेदार अतुल वोहरा महिलाओं के कम वेतनमान के लिए ज्यादातर महिलाओं की जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को भी जिम्मेदार मानते हैं। वोहरा के मुताबिक निजी क्षेत्र में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं अपने करियर के दौरान कंपनी बदलने का जोखिम लेने से बचती हैं। कंपनी बदलने का काम निश्चित रूप से जोखिमपूर्ण होता है, लेकिन ऐसा करने पर हर परिवर्तन भी वेतनमान में न्यूनतम दस से बीस फीसदी तक की बढ़ोतरी तो करता ही है। साथ ही पदोन्नति के भी अवसर मिलते हैं। इस तरह कोई पुरुष कंपनी बदलते-बदलते यदि निदेशक मंडल के स्तर तक पहुंचता है तो स्वाभाविक रूप से वो अपनी महिला सहयोगी की तुलना में अपेक्षाकृत कम उम्र में ही अधिक वेतनमान के साथ उस स्थान तक पहुंच जाता है, जबकि नौकरी के जोखिम से बचते हुए निदेशक मंडल के स्तर तक पहुंचने वाली महिला तबतक अधिक उम्र की तो हो ही चुकी होती है, उसका वेतनमान भी तुलनात्मक रूप से कम होता है।

हालांकि अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा की पहल पर कई अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों ने 2015 में जेंडर इक्वलिटी के संकल्प पत्र को स्वीकार किया है, जिसके तहत उन कंपनियों में समान पद के लिए समान वेतनमान का प्रावधान किया गया है। धीरे-धीरे दुनिया की कई कंपनियां इस संकल्प पत्र को स्वीकार कर रही हैं। माना जाना चाहिए कि जल्द ही भारतीय कंपनियां भी इस दिशा में कदम बढ़ाएंगी, ताकि महिलाओं के साथ वेतनमान को लेकर होने वाले भेदभाव पर अंकुश लग सके।

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