जीएसटी रिटर्न भरने की प्रक्रिया का सरलीकरण निश्चित तौर पर व्यापारियों को बड़ी राहत देगा। इससे जीएसटी के कलेक्शन में और बढ़ोत्तरी होगी।


मई की शुरूआत में खबर आई कि अप्रैल महीने में जीएसटी का कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर गया है। अब इसके आगे की खबर जीएसटी रिटर्न के सरलीकरण की है। जीएसटी काउंसिल ने कारोबारियों को बड़ी राहत देते हुए रिटर्न भरने की प्रक्रिया को सरल बनाने का फैसला किया है। अब कारोबारियों को महीने में सिर्फ एक रिटर्न दाखिल करना पड़ेगा। इसके साथ ही निल टर्नओवर वाले कारोबारियों को तीन महीने में एक ही रिटर्न फाइल करने की अनुमति दे दी गयी है। जबकि अभी तक सभी कारोबारियों को महीने में तीन बार रिटर्न भरना पड़ता था।

दरअसल, रिटर्न भरने में राहत देने का जीएसटी काउंसिल का यह फैसला इस तमाम प्रक्रिया को सरल बनाने का हिस्सा है। काउंसिल की 27वीं बैठक में बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की सिफारिशों के आधार पर ये फैसला किया गया है। काउंसिल ने बैठक में वित्त वर्ष 2017-18 में जीएसटी से राजस्व संग्रह की समीक्षा भी की। यह समीक्षा एक बात पर विशेष रुप से ध्यान दिलाती है कि जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद से इसके संग्रह में लगातार सुधार हुआ है। कुछ महीनों में इसके कलेक्शन में कमी जरूर आयी है, लेकिन जुलाई 2017 से लेकर मार्च 2018 तक इसका मासिक औसत 90,000 करोड़ रुपये का रहा है, जबकि अप्रैल में यह पहली बार एक लाख करोड़ के स्तर को पार कर गया।

टैक्स कंसलटेंट रामनुज जाटव के मुताबिक जैसेजैसे जीएसटी के सरलीकरण की प्रणाली आगे बढ़ेगी, वैसेवैसे जीएसटी कलेक्शन में भी बढ़ोतरी की उम्मीद की जा सकती है। यह ठीक है कि जीएसटी काउंसिल में कोई भी फैसला आम सहमति से ही होता है और अभी भी कई मसले ऐसे हैं, जिनपर काउंसिल के सभी सदस्य एकमत नहीं हो सके हैं। इसी कारण कई फैसले बारबार टलते जा रहे हैं। ऐसे मामलों में डिजिटल लेनदेन पर रियायत देने का फैसला भी शामिल है। इसी तरह पेट्रोलियम उत्पादों और शराब जैसी चीजों को जीएसटी के दायरे में लाये जाने के मसले पर भी एक राय नहीं बन पा रही है। ये दोनों ऐसे उत्पाद हैं, जिनको जीएसटी के दायरे में लाने पर उपभोक्ताओं को काफी राहत मिलेगी। जाटव का कहना है कि जीएसटी काउंसिल को करों के स्लैब में और राहत देने की बात पर भी विचार करना चाहिए। जीएसटी की दरों को कम करने पर विचार करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अधिक कर की दर होने से लोगों में टैक्स चोरी करने की प्रवृत्ति बढ़ती है, जबकि मामूली कर होने पर लोग स्वेच्छा से टैक्स देने के लिए प्रवृत्त होते हैं। ऐसा करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहतर होगा।

जहां तक जीएसटी काउंसिल की बैठक की बात है तो काउंसिल द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार बैठक में रिटर्न दाखिल की व्यवस्था को तीन चरणों में लागू करने की बात कही गई है। पहले चरण के तहत जीएसटीआर-1 और जीएसटीआर– 3बी रिटर्न भरने की मौजूदा व्यवस्था अगले छह महीने तक जारी रहेगी, लेकिन इस अवधि में जीएसटीआर– 2 और जीएसटीआर– 3 फॉर्म निलंबित कर दिए जाएंगे। जबकि दूसरे चरण में नया सिंगल मासिक रिटर्न लागू किया जाएगा। इसके तहत कारोबारियों को हर महीने अपना सेल इनवॉइस जीएसटी पोर्टल पर अपलोड करना होगा। दूसरे चरण में कारोबारियों के इनपुट क्रेडिट के दावे और जिन डीलरों से उन्होंने सामान खरीदा है, उनकी सेल इनवॉइस के आधार पर टैक्स क्रेडिट की राशि में अंतर निकाला जाएगा। वहीं तीसरा चरण शुरू होने पर अस्थाई टैक्स क्रेडिट सुविधा वापस ले ली जाएगी और कारोबारियों को उन डीलरों के सेल इनवॉइस अपलोड करने के बाद ही इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलेगा, जिससे उन्होंने सामान की खरीद की है।

चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्म केसरी कंसलटेंट्स के एमडी संतोष केसरी का कहना है कि जीएसटी काउंसिल का यह फैसला स्वागत योग्य है, लेकिन इस क्रम में यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जीएसटी पोर्टल को समयबद्ध अपडेट कर लिया जाये। वरना जिस तरह से जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद सर्वर पर काफी लोड पड़ने के कारण कई बार जीएसटी फाइलिंग का काम बाधित हुआ था, वही स्थिति आगे भी बन सकती है। ऐसे में जीएसटी सरलीकरण की ये कोशिश कारोबारियों के लिए राहत देने वाली होकर परेशानी देने वाली बन जायेगी।

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