The Supreme Court of India in New Delhi on Sept 1, 2014. The government Monday told the Supreme Court that they stood by its verdict holding allocation of coal blocks since 1993 as illegal, and was ready to auction these blocks if they are cancelled but sought exceptions for some mines which were operational.. (Photo: IANS)

दे की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के सामने फरियाद आने पर उसकी सुनवाई होगी ही। सवाल तो यह है कि संविधान ने ही जिन पदों को कोर्ट के हस्तक्षेप से अलग माना है, उन पर सवाल क्यों खड़े किए जाएं।


सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण बीएस येदियुरप्पा को बहुत कम समय मिला। तीन सदस्यीय पीठ ने 18 मई को हुई सुनवाई के बाद उन्हें चौबीस घंटे के अंदर अपना बहुमत साबित करने को कहा। पता नहीं मुख्यमंत्री और भाजपा विधायकों का पक्ष रखने में मुकुल रोहतगी को क्या समस्या आयी लेकिन इतना तय है कि बाजी कांग्रेस के हाथ रही। मुकुल रोहतगी ने कम से कम 21 मई तक का समय देने को कहा लेकिन अभिषेक मनु सिंघवी अदालत को यह समझाने में सफल रहे कि विश्वास मत के लिए ज्यादा वक्त देने का मतलब विधायकों की खरीदफरोख्त को बढ़ावा देना होगा। हालांकि अदालत ने राज्यपाल द्वारा भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने पर कोई सवाल नहीं किया और ना ही मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त करने पर।

न्यायमूर्ति एके सीकरी, एसए बोवडे और अशोक भूषण की पीठ के सामने राज्य सरकार की ओर से यह जरूर कहा गया कि उनके पास बहुमत है, जिसे विधानसभा में साबित कर देंगे। लेकिन बीएस येदियुरप्पा द्वारा राज्यपाल वजूभाई वाला को सरकार बनाने के लिए सौंपे गये पत्र में भाजपा के 104 विधायकों के अलावा बाकी किसी विधायक का जिक्र नहीं था। संभवत: इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि येदियुरप्पा 19 मई को शाम चार बजे विश्वास मत हासिल करें। अदालत ने मुख्यमंत्री को महत्वपूर्ण नियुक्ति करने से मना किया।

यह बवंडर 16 मई, बुधवार आधी रात को शुरू हुआ था, जब कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति और जेडीएस की ओर से अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के अविलंब सुनवाई की मांग को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने तीन जजों की पीठ गठित कर दी। रात के दो बजकर 10 मिनट के आसपास सुनवाई शुरू हुई, जो सुबह पांच बजे के आसपास तक चली। सिंघवी ने 17 मई को येदियुरप्पा को दिलाए जाने वाले शपथ को रोकने की मांग की, लेकिन अदालत ने बिना किसी आधार के ऐसा करने से मना कर दिया। दूसरी बात यह थी कि येदियुरप्पा मौजूद नहीं थे। इसलिए आगे की सुनवाई के लिए 18 मई का दिन निर्धारित कर  दिया। अदालत ने यह जरूर कहा कि सरकार का भविष्य इस मामले के फैसले पर निर्भर करेगा।

बहरहाल, अदालत के इस आदेश के बाद एक बार फिर संविधान की धारा 164 पर बहस होगी, जिसके तहत राज्यपाल को मुख्यमंत्री और उनकी सलाह पर मंत्रियों को नियुक्त करने का अधिकार है। मूल बात यह है कि मुख्यमंत्री नियुक्त करने के अधिकार में बहुमत साबित करने के लिए दिए जाने वाले समय का अधिकार भी शामिल है। यह उनके विवेक पर निर्भर करता है कि विश्वास मत साबित करने के लिए कितना समय देते हैं। महज इस आशंका के आधार पर कि इससे विधायकों की खरीद फरोख्त होगी, विश्वास मत के लिए दिए गए समय को एकदम से 24 घंटे के भीतर कर देना कइयों को हजम नहीं हो पा रहा था। अगर विधायकों को कोई लालच देकर मत खरीदा जाता है तो उसके समाधान के लिए अलग प्रावधान हैं, जिसके तहत निपटा जा सकता है।

आदेश सर्वोच्च न्यायालय का था इसलिए खुल कर कोई कुछ बोल नहीं रहा था, लेकिन सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इशारे से अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल को प्राप्त अधिकारों में हस्तक्षेप की बात कह ही दी। स्वामी अकेले नहीं हैं। पहली सुनवाई में ही अटॉर्नी जनरल केके वणुगोपाल और मुकुल रोहतगी ने उसके औचित्य पर सवाल किया था। वेणुगोपाल का कहना था कि अदालत को राज्यपाल के काम में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। अगर राज्यपाल ने येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए कहा है तो उन्हें यह मौका मिलना चाहिए। अगर उनके पास बहुमत नहीं होगा तो सरकार गिर जाएगी। जबकि मुकुल रोहतगी ने देर रात  को सुनवाई करने पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर यह सुनवाई अगले दिन होती तो कौन सी आफत जाती। उनका भी यही कहना था कि न्यायालय को राज्यपाल के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके बावजूद इतना  कुछ हुआ। तो इंतजार कीजिए एक नई याचिका का, जिसमें अनुच्छेद 164 पर सवाल होगा।

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