जापान, इटली, अमेरिका की अर्थव्यवस्था का कर्ज उनकी जीडीपी के सौ फीसदी से भी ज्यादा हो चुका है। इसमें पहला स्थान जापान का है।


दुनिया के सामने एक बार फिर वैश्विक मंदी का खतरा मंडराने लगा है। जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक दुनिया भर में सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्जों में जिस तरीके से तेज उछाल आया है, उसने पूरी दुनिया में मंदी आने के पूर्व संकेत दे दिये हैं। सार्वजनिक और निजी सकल कर्ज तेजी के साथ बढ़ते हुए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और दुनिया के अधिकांश देश कर्ज के फंदे में फंसते हुए नजर आने लगे हैं। इन देशों में विकासशील देश तो हैं ही, अमेरिका और जापान जैसे विकसित देश भी शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वैश्विक कर्ज 164 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 10,660 लाख करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया है। वैश्विक कर्ज की स्थिति खतरनाक हो चुकी है। यह दुनिया भर के सभी देशों की कुल जीडीपी का 225 फीसदी हो चुका है। आर्थिक क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक कर्ज का यह माहौल इतना खतरनाक है कि अगर किसी भी देश की माली-हालत या वहां की अर्थव्यवस्था थोड़ी भी खराब हुई, तो उसके लिए अपने कर्जों का भुगतान कर पाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसी स्थिति में दुनिया जबरदस्त मंदी के चपेट में आ सकती है। विकास के नाम पर अंधाधुंध तरीके से लिया जाने वाला वैश्विक कर्ज दुनिया को मंदी के रास्ते पर ले जाने की एक बड़ी वजह बन सकता है।

आईएमएफ की हाफ ईयरली फिस्कल मॉनिटर रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक कर्ज सर्वोच्च स्तर पर पहुंचकर दुनिया को मंदी की ओर ले जा रहा है। इसके पहले 2009 में भी वैश्विक कर्ज अपने तत्कालीन उच्चतम स्तर की वजह से दुनिया भर में मंदी की वजह बना था। हालांकि तब इसका स्तर दुनिया भर की जीडीपी का 175 फीसदी ही था। लेकिन अब स्थिति 2009 की तुलना में ज्यादा खराब हुई है। वैश्विक कर्ज के मामले में पूरी दुनिया में सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा लिये जाने वाले कर्जों की तुलना में निजी क्षेत्रों के कर्ज की मात्रा में काफी तेज बढ़ोतरी हुई है। निजी क्षेत्र के कर्ज को सार्वजनिक क्षेत्र के कर्ज से ज्यादा जोखिम वाला माना जाता है, क्योंकि निजी क्षेत्र की कंपनियों के दिवालिया होने पर पैसों के डूबने का जोखिम ज्यादा होता है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के कर्जों की गारंटी उस देश की सरकार के पास होती है, इसलिए ऐसे कर्जों में जोखिम कम होता है। अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के मुताबिक बहुत ज्यादा कर्ज से देशों के खर्च बढ़ाने की क्षमता पर भी काफी बुरा असर पड़ता है। इससे न केवल देशों की विकास दर प्रभावित हो सकती हैं, बल्कि इसके कारण कर्जदार देश मंदी की चपेट में भी आ सकता है। चिंता की बात ये भी है अमेरिका की राजकोषीय नीति (फिस्कल पॉलिसी) फिलहाल अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। अमेरिका का राजकोषीय घाटा काफी तेजी से बढ़ा है। अगर हालात नहीं सुधरे तो 2020 तक उसका राजकोषीय घाटा एक ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग एक लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा। ऐसे में अगर अमेरिका पर राजकोषीय घाटे के साथ ही कर्ज का भी दबाव बना रहता है, तो वहां मंदी की स्थिति बनना लगभग तय है। अमेरिका को विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है। ऐसे में अगर अमेरिका में ही मंदी के हालात बने तो विकसित देशों के साथ ही कमोबेश तीसरी दुनिया के सभी देशों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा।

आईएमएफ की रिपोर्ट में कर्ज और जीडीपी के अनुपात के चिंताजनक आंकड़ों पर भी ध्यान दिया गया है। जापान, इटली, अमेरिका जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में कर्ज उनके जीडीपी के सौ फीसदी से भी ज्यादा हो चुका है। इसमें पहला स्थान जापान का है, जहां पिछले साल तक कर्ज वहां की जीडीपी का 236 फीसदी हो चुका था। दूसरे स्थान पर इटली का नाम आता है, जहां कर्ज और जीडीपी का अनुपात 132 फीसदी है। इसी तरह तीसरे नंबर पर अमेरिका है, जिसका कर्ज उसके जीडीपी का 108 फीसदी है।

इस क्रम में यदि भारत की बात करें, तो भारत में कर्ज उसके जीडीपी का 70.2 फीसदी है। निश्चित रूप से भारत खतरे के निशान से काफी पीछे हैं, लेकिन यह आंकड़ा इस बात को दर्शाता है कि अगर जल्द ही अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में कड़े कदम नहीं उठाए गये तो भारत में भी यह आंकड़ा सौ फीसदी को पार कर खतरनाक स्थिति में पहुंच सकता है। इसके लिए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को समय रहते ही सतर्क होकर नई नीतियां बनाते हुए सख्ती के साथ उनका अनुपालन करना होगा।  

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विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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