न राज्यों में, विशेष तौर पर मध्य प्रदेश और राजस्थान में जनता के एक बड़े वर्ग के असंतोष से जुड़ी खबरें आती रही हैं। इन तीन राज्यों में हाल में लोकसभा और विधानसभा के जो उपचुनाव हुए हैं, उनके परिणाम भाजपा के लिए उत्साहवर्द्धक नहीं रहे हैं।

कर्नाटक का संग्राम समाप्त हुआ और अब देश की चुनावी राजनीति का फोकस आहिस्ता-आहिस्ता अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों और उसके पहले के तीन राज्य विधानसभा चुनावों की तरफ शिफ्ट हो रहा है। देश के तीन प्रमुख हिंदी भाषी प्रदेशों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की वर्तमान विधानसभाओं का कार्यकाल 2019 के पहले महीने में समाप्त हो रहा है। जाहिर है वहां इस वर्ष के अंत तक चुनाव संपन्न करवाने होंगे।

वैसे तो पिछले कुछ समय से देश में जो भी विधानसभा चुनाव या लोकसभा के उपचुनाव हो रहे हैं, उन्हें मीडिया 2019 के लोकसभा चुनावों के संभावित परिणामों से जोड़ कर देखता रहा है लेकिन राजनीति में एक वर्ष का समय बहुत होता है। विशेष तौर पर तब जब देश में नरेंद्र मोदी जैसे नेता मौजूद हों जो कुछ रैलियों के माध्यम से ही चुनाव की हवा बदल देने में सक्षम हों। ऐसे में कर्नाटक चुनाव परिणाम को लोकसभा चुनाव परिणामों से जोड़कर देखना जल्दबाजी ही थी लेकिन यही बात तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के संदर्भ में नहीं कही जा सकती। निश्चित तौर पर उन परिणामों से देश के मूड का बहुत हद तक पता चलेगा। इसीलिए इस बात की पूरी उम्मीद है कि इन चुनावों में सत्ता और विरोधी पक्ष अपनी सारी ताकत झोंक देंगे।

2013 में हुए इन्हीं राज्यों के चुनावों में 2014 के लोकसभा चुनाव परिणामों की आहट सुनाई दी थी। उन चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज के दिन उसे न केवल लोकसभा में अजेय बहुमत हासिल है, बल्कि 20 राज्यों में भी उसकी सरकार है। इन तीन प्रदेशों में चुनावों की खास बात यह थी कि गुजरात, पंजाब और गोवा के अलावा किसी भी राज्य में भाजपा की सरकार नहीं थी। अब जिन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, वहां भाजपा की सरकारें हैं और सत्ता विरोधी रुझान का सामना उसे ही करना पड़ेगा। शायद इसी अंदेशे के मद्देनजर इन राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ करवाने की योजना पर काम हो रहा था ताकि चुनावी मुद्दों को राज्य के मुद्दों से हटाकर राष्ट्रीय मसलों पर शिफ्ट किया जा सके। राहुल गांधी का खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने वाला बयान आते ही विरोधियों के बयानों को अपने पक्ष में भुनाने में माहिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों के माध्यम से ऐसा माहौल बना दिया कि स्थानीय मुद्दे गायब हो गए और मुकाबला मोदी बनाम राहुल का होकर रह गया। जाहिर है ऐसा जब भी होगा भाजपा ही फायदे में रहेगी। देखना यह होगा कि कांग्रेस इस जाल में फंसने से खुद को कैसे बचाती है।

कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ उसकी देश भर में बड़ी चर्चा है। अब तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव भाजपा विरोधी दलों की एकता की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे हैं। अगर कांग्रेस को वाकई भाजपा विरोधी दलों को साथ लेकर चलने की फिक्र होती तो वह जनता दल (एस) के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करती और बड़ी आसानी से वह गठबंधन चुनावी जीत हासिल कर लेता। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए पिछले चुनावों के आंकड़े यह बताते हैं कि अगर कांग्रेस बसपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करे तो उसे कामयाबी मिल सकती है। जाहिर तौर पर कांग्रेस अगर इन राज्यों के छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर चलने का कलेजा दिखाती है तो इससे 2019 में विपक्षी एकता को बहुत अधिक फायदा होगा और उत्तर प्रदेश, बिहार या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ताकतवर दल उसे भी अपने साथ लेंगे जहां कांग्रेस बेहद कमजोर हो चुकी है। जाहिर तौर पर ऐसा कुछ कर पाना कांग्रेंस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए कठिन परीक्षा होगी। इन राज्यों, विशेष तौर पर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी भी हमेशा से पार्टी को नुकसान पहुंचाती रही है। क्या इस बार ये तमाम नेता आपसी मतभेदों को भुलाकर साथ-साथ चलने को तैयार हैं? छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी परेशानी कई वर्षों तक कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री रहे अजित जोगी खड़ी करने वाले हैं। कुछ भी हो यह तो स्पष्ट ही है कि इन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव अबतक अजेय रही भाजपा और नरेंद्र मोदी की छवि के साथ-साथ भाजपा विरोधी गठजोड़ के भविष्य की दृष्टि से भी अग्निपरीक्षा साबित होने जा रहे हैं।

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