हा ही में वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ छपकर आई है। इसमें उन्होंने कई रहस्योद्घाटन भी किए हैं। अपने बारे में भी और दूसरे के बारे में भी। इसलिए इसकी खूब चर्चा हो रही है। उनकी यह जीवन यात्रा बाल स्वयंसेवक से पूर्णकालिक वामपंथी, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता, फिर पत्रकार और मीडिया शिक्षक जैसे कई ‘मैं’ से निर्मित है। उनकी आत्मकथा के बहाने रामशरण जोशी से यह बातचीत युगवार्ता के संपादक संजीव कुमार ने की है। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश:-


आत्मकथा लिखना एक जटिल कार्य है, आपने इसे कैसे संभव किया?

निश्चित ही यह एक जटिल कार्य है। जटिल से ज्यादा आत्मकथा के प्रति आप कितने ईमानदार रहते हैं और आपने जो लिखा है उसमें कितनी पारदर्शिता है यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह प्रश्न हरेक आत्मकथा लिखने वाले के लिए चुनौती होता है। मुझे काफी बड़े लोगों से प्रेरणा मिली है जिसमें महात्मा गांधी हैं, जवाहरलाल नेहरू हैं। लेकिन आत्मकथा लिखने के लिए मुझे राजेन्द्र यादव ने प्रेरित किया। मैंने पूरी कोशिश की है कि आत्मकथा में पारदर्शिता रखूं।

आपके मन में आत्मकथा लिखने की बात कब और कैसे आई?

आत्मकथा लिखने का विचार करीब तेरहचौदह साल पहले आया। 2003-2004 के आसपास मैंने हंस में दो आलेख लिखे, जिस पर काफी विवाद हुआ। उसके बाद राजेन्द्र यादव ने कहा कि जब आपने इतना लिखा तो आप आत्मकथा भी लिख सकते हैं। इसके बाद इसका श्रेय मैं अशोक माहेश्वरी को भी देना चाहूंगा। वो भी लगातर मेरे पीछे पड़े रहे, तब जाकर यह आत्मकथा लोगों के सामने पाई है। हालांकि शुरू में मुझे स्वयं पर विश्वास नहीं था कि मैं आत्मकथा लिख पाऊंगा। लेकिन धीरेधीरे मैंने आत्मविश्वास एकत्रित किया और लिखना शुरू किया। इसे लिखने में मुझे 6-7 साल लगे। 2015 में मैंने इसकी पांडुलिपि राजकमल प्रकाशन को दिया। हालांकि इसके बाद भी समयसमय पर कुछकुछ संशोधन भी हुए। इस पुस्तक का अंतिम अध्याय जनवरी 2017 तक है।

आपकी आत्मकथा दो खंडों में है, ऐसा क्यों?

हां, यह पुस्तक दो खंडों में है। मेरे जन्म की सही तारीख 30 नवंबर, 1943 है। इस पुस्तक में मैंने नवंबर 1943 से जनवरी 2017 तक की जीवन यात्रा को मैंने कवर किया है। आत्मकथा के प्रथम खंड में वहां तक है, जब तक मैं राजनीतिक कार्यकर्ता था। दूसरा खंड वहां से है जब मैं पत्रकारिता में पूरी तरह जाता हूं। इसमें मेरे जीवन के कई पक्ष हैं, लेकिन अंत में मैं एक पत्रकारिता के शिक्षक के रूप में सामने आता हूं।

आप अपनी आत्मकथा की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं?

मैं कोई साहित्यकार तो हूं नहीं कि कोई विशेष रचना प्रक्रिया अपनाऊं। मैंने एक ही रचना प्रक्रिया अपनाई कि मेरी भाषा सहज और बोधगम्य हो। इसको हरेक व्यक्ति आसानी से समझ सके, पढ़ सके। पुस्तक में एक सरिता की तरह सहजता और सरलता हो इसका मैंने ख्याल रखा है। मैंने इसकी शुरुआत बोस्टन से की है। लेकिन मेरे जन्म की कहानी दूसरे अध्याय से शुरू होती है। मेरी आत्मकथा सिर्फ अकेली की नहीं है, इसमें समय है, समाज है और राज्य है। यानी सत्ता है। व्यक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं है, व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण, व्यक्ति के चेतना का निर्माण उस समाज में होता है, उन परिस्थितियों में होता है जिसमें वह जन्म लेता है। समाज विशेष या परिस्थिति विशेष या परिवार विशेष में जन्म लेना किसी व्यक्ति का चयन नहीं होता। लेकिन समय, समाज, परिस्थिति और परिवार को यथावत ही रहने दिया जाए तो व्यक्ति वहां अपराधी होता है। व्यक्ति उन परिस्थितियों को बदलने, उसमें सुधार लाने के लिए संघर्ष करे। यह व्यक्ति का चयन होता है। मैंने अपनी आत्मकथा में अपनी सीमाओं को अपनी क्षमता के अनुसार लांघने की कोशिश की है।

अक्सर आत्मकथा का आरंभ जन्म से होता है लेकिन आपने अंत से शुरू किया है?

यह काफी दिलचस्प है। जब मैंने 2013 के अंत में लिखना शुरू किया तो उस समय मेरी उम्र करीब 72-73 की हो गई थी। मैंने सोचा कि यह मेरे जीवन का अंतिम पड़ाव है। अब जीवन में मुझे कुछ खास करना नहीं है। लेकिन संयोग से 2016-2017 में मैं बीमार पड़ता हूं, मुझे ब्रेन स्ट्रोक होता है। मुझे यह लगा कि मैंने अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण कार्य कर चुका हूं। किसी भी व्यक्ति के आत्मकथा में उसके जीवन का सार तत्व जाए। इसी को ध्यान में रखकर मैंने इसे अंत से शुरू किया। यह अलग बात है कि मैंने अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने नातिन के जन्म से आत्मकथा शुरू किया है।

इस पुस्तक का शीर्षक लोगों को आकृष्ट करता है, इसका चुनाव कैसे किया?

इस पुस्तक का शीर्षक एक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूपक है। बोनसाई एक जापानी पौधा होता है। लोग इसे अपने ड्राइंग रूम में सजाकर रखते हैं। इसका आकार बढ़ता है, घटता है। हमेशा यथावत रहता है। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि मध्यम वर्ग की नियति भी लगभग ऐसी ही होती है। मध्यम वर्ग के अधिकांश लोग ऐसे ही होते हैं जो समय को बदल नहीं पाते। आज तक जितने भी क्रांतिकारी निकले वे मध्य वर्ग से निकले। लेकिन अधिकांश मध्य वर्ग के लोग अपने जीवन में यथावत ही बने रहना चाहते हैं। यानी वो व्यवस्था को चुनौती नहीं दे सकते। मैंने महसूस किया कि मेरी भी नियति अब समाप्त सी हो गई है। मैं भी एक बोनसाई बनकर रह गया हूं। मध्य वर्ग का एक सजावटी पौधा। क्योंकि जीवन में मैंने जो सोचा था वह नहीं कर पाया। इसलिए मैंने अपनी आत्मकथा का शीर्षक रखा हैमैं बोनसाई अपने समय का

आपका कई राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से संबंध रहा, आप कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, फिर भी आपने अपने को बोनसाई कहा है! राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से जो मेरे संबंध रहे वो मेरे प्रोफेशनल रिलेशन थे। मैं उनके साथ एक पत्रकार के रूप में दुनिया भर में गया। इससे खुद का ही फायदा हुआ। इससे मेरा ग्लैमर या रूतबा ही बढ़ा, लेकिन समाज के लिए मैंने कुछ नहीं किया। मूल सवाल तो यह है कि मैंने समाज के लिए क्या किया? मैंने संघर्ष किया लेकिन खुद के लिए किया। मैंने सोचा था कि समाज को बदलेंगे। समाज से गरीबी, विषमता और गैरबराबरी को खत्म करेंगे लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हुआ। आप इसे सामूहिक विफलता भी कह सकते हैं। भले ही मेरा संबंध इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी से रहा, लेकिन यह मेरी पेशेगत उपलब्धियां हैं। भले ही एक समय मैं पांच सितारा पत्रकार था, लेकिन मैं जो समाज को देना चाहता था, वह नहीं दे पाया। इसे मैं अपनी नाकामी मानता हूं। इसलिए मैंने अपने को बोनसाई कहा है।

आपकी जीवन यात्रा एक बाल

स्वयंसेवक से वामपंथी कैडर तक की है, फिर भी आप अपने जीवन को असफल मानते हैं। ऐसा क्यों­­?

अपने जीवन में भौतिक उपलब्धियों को लेकर मुझे कोई शिकायत नहीं है। मेरे जीवन में भौतिक उपलब्धियों, मानसम्मान और पुरस्कारों की कोई कमी नहीं है। लेकिन जब मैं सोचता हूं कि मैं समाज को क्या दे पाया तो मुझे निराशा हाथ लगती है। मैंने बाल स्वयं सेवक से अपनी यात्रा शुरू की, उसके बाद मैं दरियागंज जनसंघ इकाई का उपाध्यक्ष भी रहा हूं, लेकिन जब हमें लगा कि इससे समाज में परिवर्तन नहीं होगा तो मैं वामपंथ की तरफ गया। मैंने सोचा कि समाजवाद से देश और समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है लेकिन मैं समाज में कोई परिवर्तन नहीं ला पाया तो यह मेरी विफलता ही है।

क्या आप मानते हैं कि कोई भी विचारधारा आज पूर्ण नहीं है?

अब मैं यह मानता हूं कि कोई भी विचारधारा, चाहे वह दक्षिण पंथ की हो या वाम पंथ की, वह अपने आप में परिपूर्ण नहीं है। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती है तो उसका विचारधाराओं पर भी असर पड़ता है। अब जिस 21 वीं सदी में हम रह रहे हैं यहां कोई भी विचारधारा संपूर्ण नहीं है। चाहे वह हिन्दुत्व की विचारधारा हो या मार्क्सवाद की विचारधारा हो, चाहे गांधीवाद की हो या अंबेडकर की हो। क्योंकि अब वर्ग की संरचना बदल रही है, जातियों का डायनामिक्स बदल रहा है। ऐसी स्थिति में हमें नए विकल्पों पर सोचने की जरूरत है। अब हमें कई विचारधाराओं को एक साथ लेकर चलना होगा।  इसमें मार्क्सवाद भी होगा, गांधीवाद भी होगा। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आज हम किसी भी मामले में संकीर्ण बने नहीं रह सकते। आज अगर कोई विचारधारा है तो वह मानवतावाद है, जो बहुलता की बात करता है, उदारता की बात करता है, जिसमें सबको साथ ले चलने की बात है।

आपने इसे ‘एक कथा आत्मभंजन की’ कहा है, इससे क्या तात्पर्य है?

आत्मभंजन का अर्थ होता है अपनी छवि या मूर्ति तोड़ना, लेकिन मैंने इसका प्रयोग यहां स्वयं को अनावृत करने और अपने बारे में बताने के लिए किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक जीवन में जो मेरी छवि या मूर्ति बनी है, मैंने अपनी आत्मकथा में उसे पूरी तरह से ध्वस्त किया है।

आप अपने जीवन में कई भूमिकाओं

में रहे, किस भूमिका में रहना आपको ज्यादा पसंद था?

मुझे एक परिवर्तन कर्मी, एक क्रांतिकारी एक्टिविस्ट बने रहना ज्यादा पसंद था।  

आप समाज के लिए पत्रकार और मीडिया शिक्षक की भूमिका को कैसे देखते हैं?

मैं जब समाज में अपनी भूमिका पत्रकार और मीडिया शिक्षक को एक मानकर देखता हूं तो मुझे अपने जीवन में एक संतोष होता है। अगर मैं केवल पत्रकार होता या सिर्फ शिक्षक होता तो भी मुझे संतोष नहीं मिलता। मैंने 1999 में सक्रिय पत्रकारिता छोड़ा। उसके बाद देश के प्रथम पत्रकारिता विश्वविद्यालय में मैं प्रोफेसर रहा। इस तरह मैं अपनी दोनों भूमिकाओं को जब एक साथ देखता हूं तो मैं अपने को एक सार्थक पत्रकार शिक्षक के रूप में पाता हूं। और मुझे अपने जीवन में एक ठोस संतोष मिलता है।  

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संजीव कुमार
परिवर्तनकारी गतिविधियों में रुचि रखने वाले संजीव अखबार नहीं आंदोलन कहे जाने वाले 'प्रभात खबर' से अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। उसके बाद 'प्रथम प्रवक्ता' पाक्षिक पत्रिका के मुख्य सहायक संपादक सह विशेष संवाददाता और 'यथावत' पत्रिका में समन्वय संपादक के रूप में कार्य किया। इन दिनों ‘युगवार्ता’ साप्तहिक के संपादक हैं।

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