भारतीय अधिकारियों, सैन्य अधिकारियों और परमाणु वैज्ञानिकों ने जिस सावधानी और गोपनीयता के साथ पोखरण परीक्षण की तैयारी की और सफल परीक्षण किये, ‘परमाणु: द स्टोरी आॅफ पोखरण’ उसकी तनावभरी बेचैन गतिविधि की कहानी है।


वास्तविक घटनाओं से जुड़े व्यक्तियों, तथ्यों और सूचनाओं को विश्वसनीय तरीके से परदे पर मनोरंजक कहानी के रूप में पेश करना फिल्मकारों के लिए हमेशा से बड़ी चुनौती रही है। जब ऐसी कोई घटना राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के दांवपेंच से लबरेज हो और उसके अनेक हिस्सों के बारे में पूरे इत्मीनान से कह पाना मुमकिन हो, तो कहानी के भटक जाने का खतरा भी रहता है। इन दोनों आधारों पर अभिषेक शर्मा कीपरमाणु: स्टोरी आॅफ पोखरणएक उपलब्धि मानी जायेगी। बीस बरस पहले राजस्थान के पोखरण इलाके में 1998 में 11 और 13 मई को भारत ने पांच परमाणु परीक्षण किये थे। यूं तो 1974 में इसी पोखरण में परीक्षण कर भारत ने अपनी परमाणु क्षमता का अहसास दुनिया को करा दिया था, परंतु 1998 के परीक्षणों ने उसे परमाणु क्षमता से लैस चुनींदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर दिया था।

परीक्षण का निर्णय और उसे कार्यान्वित करना आसान काम नहीं था। दो पड़ोसी देशचीन और पाकिस्तानभारत के साथ युद्ध लड़ चुके हैं। चीन पहले से ही परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र है। भारत को 1990 के दशक के शुरुआती सालों से ही ऐसे संकेत मिलने लगे थे कि पाकिस्तान परमाणु हथियार पाने की जुगत लगा रहा है। ऐसे में भारत के राजनीतिक नेतृत्व पर काफी दबाव था। आखिरकार, 1995 में परीक्षण करने की तैयारियां भी कर ली गयी थीं। अब चुनौती यह थी कि परीक्षण से पहले इसकी जानकारी किसी को हो। एक अत्याधुनिक अमेरिकी सैटेलाइट भारत पर लगातार नजर भी रखे हुए था। भारतीय अधिकारियों, सैन्य अधिकारियों और परमाणु वैज्ञानिकों ने जिस सावधानी, मुस्तैदी और गोपनीयता के साथ तैयारी की और सफल परीक्षण किये, ‘परमाणुउसकी तनावभरी बेचैन गतिविधि की कहानी है।

हालांकि फिल्म में कलात्मक छूट लेते हुए कुछ तथ्यात्मक हेरफेर करते हुए गल्प के तत्व भी शामिल हैं, पर मूल घटनाक्रमों को ईमानदारी के साथ पेश किया गया है। इसके बड़े हिस्से का फिल्मांकन पोखरण के साथ दिल्ली और मुंबई में हुआ है। जॉन अब्राहम, डायना पेंटी, बोमन ईरानी आदि कलाकारों का अभिनय भी उम्दा है। निर्देशक अभिषेक शर्मा के साथ साइविन क्वाद्रास और संयुक्ता चावला शेख ने पटकथा लिखी है जिसमें घटनाओं के सिलसिले में दिलचस्पी बनाये रखने के इरादे से सस्पेंस और मेलोड्रामा का संतुलित इस्तेमाल हुआ है। परमाणु हथियारों की जरूरत या पोखरण के मामले पर एक राय नहीं है, पर फिल्म 1998 की घटना को उसके संदर्भों में सही ठहराती है, और ऐसा करते हुए वह उग्र या उन्माद का सहारा नहीं लेती है।

भयानक गर्मी में जलते रेगिस्तान में साजोसामान लाना, हथियारों को जमीन के बहुत नीचे गाड़ना, उन्हें लंबे तारों से नियंत्रण कक्ष से जोड़ना, दिल्ली, मुंबई और पोखरण के बीच लगातार संवाद और समन्वय बनाये रखनाइन गतिविधियों को बहुत प्रभावी तरीके से फिल्म में दर्शाया गया है। यह सब करते हुए इस परियोजना में लोगों को अमेरिकी सैटेलाइटों और जासूसों को छकाना भी था। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश और दुनिया को सफल परीक्षणों की जानकारी दी, तो सभी स्तब्ध रह गये थे। अमेरिका की विख्यात गुप्तचर संस्था सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआइए) को बहुत शर्मिदगी उठानी पड़ी थी, क्योंकि जमीन से लेकर आकाश तक फैले उसके संजाल भारतीयों की तैयारी को भांपने में बुरी तरह से नाकाम रहे थे।

अनुभवी संदीप चौटा का पार्श्वसंगीत कहानी के तनाव और तनातनी को भावपूर्ण बनाता है। संस्पेंसथ्रिलर फिल्मों में गाने कहानी को समृद्ध करने के साथ कथानक को बीचबीच में शिथिल कर किरदारों के साथ दर्शकों को भी राहत देने का काम करते हैं। सचिनजिगर और जीत गांगुली के संगीत से सजे वायु, रश्मि विराग, सचिन सांघवी और कुमार विश्वास के गीत सुकून देते हैं। असली लोकेशनों को शानदार ढंग से असीम मिश्र और जुबिन मिस्त्री ने कैमरे में कैद किया है। फिल्म वैसे तो काफी पहले बन कर तैयार हो गयी थी, पर निर्माताओं के आपसी विवाद के कारण रिलीज में देर होती रही है। लेकिन यह भी अच्छा है कि फिल्म ऐसे मौके पर सिनेमाघरों में आयी है, जब पोखरण परीक्षण के बीस साल पूरे हो रहे हैं। अभिषेक शर्मा के लिएपरमाणु‘ ‘तेरे बिन लादेनके बाद बड़ी उपलब्धि है।नो स्मोकिंगऔरमद्रास कैफेके बाद जॉन अब्राहम का अभिनय भी उम्दा है।

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