कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के उपचुनाव को भले ही अगले आम चुनावों का सेमीफाइनल बताया जा रहा हो, लेकिन 2019 में गठबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राह रोक पाना मुश्किल होगा। चुनाव परिणामों का बारीकी से विश्लेषण करने से पता चलता है कि विपक्षी दलों की तमाम घेरेबंदी के बाद भी नूरपुर में 2017 के मुकाबले भाजपा ने 10,000 वोट अधिक हासिल किए। कैराना में भी ऐसे ही हालात रहे हैं। वहां कम मत प्रतिशत भाजपा की हार का कारण बन गया। विपक्ष मिलकर भी 2014 चुनावों में मिले वोट भी हासिल नहीं कर पाया।

प्रदेश में उपचुनाव जीतकर विपक्षी दल खुश हैं। उनकी एकता विजयी जरूर हुई है, पर गठबंधन की राह इतनी आसान नहीं लग रही है। 2019 की जंग से पहले प्रदेश में सीटों के बंटवारे पर घमासान मचना तय है।

कैराना लोकसभा में शामिल पांच विधानसभाओं में से तीन शामली और दो सहारनपुर जनपद में पड़ती है। 2014 के लोकसभा चुनावों में 73 प्रतिशत मतदान के साथ सपा को 3,29,081, बसपा को 1,60,414 और रालोद को 42,706 वोट हासिल हुए थे। इन तीनों ने मिलकर 5,32,201 वोट जुटाए। जबकि अकेले भाजपा को उस समय 5,65,909 वोट मिले। जबकि 2018 के उपचुनाव में मतदान प्रतिशत गिर गया। इन चुनावों में रालोद गठबंधन को मात्र 4,81,182 वोट ही मिल पाए और भाजपा को 4,36,564 वोट मिले। इसी तरह से बिजनौर जनपद की नूरपुर विधानसभा में 2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को 1,14,510 वोट हासिल हुए। इनमें रालोद के 2,172, सपा के 66,434 और बसपा के 45,920 वोट शामिल थे। उस समय भाजपा को 79,172 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 12,736 रहा। उस समय 66 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि 2018 के उपचुनाव में कम मतदान प्रतिशत के बावजूद भाजपा को 2017 के मुकाबले दस हजार अधिक मत मिले। 2018 में भाजपा को 89,213 वोट हासिल हुए। जबकि विपक्षी दल 94,875 वोट हासिल कर पाए।

कम मतदान बना मुसीबत

आम जनमानस में भी धारणा है कि मतदान प्रतिशत ज्यादा होने पर ही भाजपा प्रत्याशियों को जीत मिलती है। कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले कम मतदान हुआ। कैराना लोकसभा सीट पर इस बार केवल 54.17 प्रतिशत मतदान हुआ। वर्ष 2014 में 73.05 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि बिजनौर जनपद की नूरपुर विधान सभा में इस बार 61 प्रतिशत वोट पड़े, जबकि 2017 में 66.82 प्रतिशत मतदान हुआ था। कम वोट पड़ने के कारण भी भाजपा प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में अगर 2019 में मतदान प्रतिशत बढ़ गया, तो विपक्षी दलों के पास भाजपा को रोकने का कोई हथियार नहीं बचेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता ने सपा, बसपा जैसे धुरविरोधियों को एक मंच पर आने को मजबूर कर दिया। इनके साथ कांग्रेस, रालोद जैसे दल भी मिल गए। 2014 और 2017 के चुनावों में इन दलों को मिली करारी हार और 2019 के चुनावों में अपनी दुर्गति से बचने के लिए सभी दल गठबंधन का दिखावा करने में लगे हैं।

बंटवारे से मचेगा बवाल

भले ही उपचुनाव जीतकर विपक्षी दल इठला रहे हों, लेकिन 2019 की जंग से पहले यूपी में सीटों के बंटवारे पर उनमें घमासान मचना तय है। बसपा मुखिया मायावती किसी भी कीमत पर कम सीटों पर समझौता नहीं करेगी। वह खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश कर रही हैं और 60 से कम सीटों पर समझौता नहीं करेगीं। ऐसी ही स्थिति सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की है। वह भी 80 लोकसभा सीटों में से 60 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में पेश कर दिया है, उससे साफ लगता है कि कांग्रेस भी यूपी में 20 सीटों की दावेदारी करेंगी। कैराना सीट जीतकर रालोद भी खुद को किंग मेकर मानकर चल रहा है। उसकी निगाह भी 2019 में वेस्ट यूपी की दस लोकसभा सीटों पर होगी। इससे साफ है कि भविष्य में सीटों के बंटवारे को लेकर इन सभी दलों में सियासी घमासान मचना तय है। इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को ही होगा। दूसरे इन सभी दलों के सामाजिक समीकरण भी गठबंधन में बाधा पैदा करेंगे।  

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