हात्मा गांधी की बात हो और चरखे की बात चले, यह अधूरा सा लगता है। चरखे को हथियार बनाकर ही देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी गई थी।

आज से सौ साल पहले इन्हीं दिनों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अहमदाबाद स्थित सत्याग्रह आश्रम में चरखा मिलने की खुशी मनाई जा रही थी। बहुत कोशिश के बाद गांधीजी को गंगा बाई नाम की महिला ने एक चरखा खोज कर दिया था। गांधी के नेतृत्व में फिर से चर्चित, संशोधित और विकसित चरखा आजादी की लड़ाई में आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बना। आज चरखा प्रासंगिक और जरूरी होते हुए भी देश के घरघर से बेघर होने लगा है, जबकि विदेशों में इसका निर्यात हो रहा है।

गांधी पूरी दुनिया में अहिंसा के लिए विख्यात हुए और उनके मुताबिक अहिंसा की कोई निशानी है तो वह चरखा है। गांधी हरेक सभा में कहते थे कि चरखा वह मंच है, जिसका चक्र घुमाते ही सब एक जैसे हो जाते हैं। काम ऐसा होना चाहिए, जिसे अनपढ़ और पढ़ेलिखे, भले और बुरे, बालक और बूढ़े, स्त्री और पुरुष, लड़के और लड़कियां, कमजोर और ताकतवर, फिर वे किसी जाति और धर्म के हों कर सकें। चरखा ही एक ऐसी वस्तु है, जिसमें यह सब गुण है। इसलिए जब कोई स्त्री या पुरुष रोज आधा घंटा चरखा चलाकर सूत काटता है, तब वह जन समाज की भरसक अच्छी से अच्छी सेवा करता है। आज गांधी जिंदा होते तो वे आज भी चरखा की वकालत करते।

देश में चरखे का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन इसमें उल्लेखनीय सुधार गांधीजी के जीवनकाल में हुआ। सबसे पहले 1908 में गांधी को चरखे की बात सूझी, तब वे इंग्लैंड में थे। वे चाहते थे कि कहीं से चरखा लाएं। 1916 में स्वदेश लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया। बड़ी मशक्कत से दो साल बाद 1918 में एक विधवा बहन गंगा ने गांधी को खोजकर चरखा दिया। गुजरात में अच्छी तरह भटकने के बाद गायकवाड़ के बीजापुर गांव में गंगा बहन को चरखा मिला। वहां कई घरों में चरखे थे, पर उन्होंने छत पर चढ़ा दिया था। मगन लाल गांधी की शोधक शक्ति ने चरखे में कई सुधार किए और चरखे और तकुए आश्रम में ही बनने लगे। हालांकि मिलों की प्रतिनिधियों ने गांधी को बहुत समझाने की कोशिश की कि वे कपड़े के लिए अधिक से अधिक मिल खोलने की बात करें। गांधी ने मिलों की दलाली करने से इनकार कर दिया और चरखा आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुट गए।

गांधी ने चरखे पर यह सोच कर जोर दिया कि इससे हिंदुस्तान की भूखों मरने वाली अर्ध बेकार स्त्रियों को काम दिया जा सकता है। चरखे में संशोधन हो इसके लिए 1923 में गांधी ने पांच हजार का पुरस्कार घोषित किया, लेकिन कोई विकसित नमूना प्राप्त नहीं हुआ। चरखे का आंदोलन बढ़ने लगा, तो 1925 में चरखा संघ की स्थापना हुई। 1929 में चरखा संघ की ओर से गांधी की शर्तों के अनुसार चरखा बनाने वाले को एक लाख रुपये का पुरस्कार घोषित किया। इसके बाद भी कोई अंतिम नमूना नहीं मिला। चरखे में आज भी संशोधन जारी है, लेकिन अब वह इस्तेमाल के बजाय प्रदर्शन की वस्तु बन गया है। दिल्ली कनाट प्लेस में 25 फीट लंबे 13 फीट ऊंचा और 8 फीट चौड़ा चरखा प्रदर्शन के लिए स्थापित किया गया है और इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर 30 फीट लंबा, 17 फीट ऊंचा और 9 फीट चौड़ा चरखा स्थापित किया गया है, जिसे अहमदाबाद के 42 बढ़ई ने 55 दिनों में तैयार किया। दिल्ली के कनाट प्लेस में सबसे पहले चरखा खोजकर लाने वाली गंगा बहन के नाम पर चरखा संग्रहालय भी बनाया गया है। गंगा संग्रहालय में अलगअलग तरीके के सौ चरखे रखे गए हैं इनमें से कई डेढ़ सौ साल से भी पुराने हैं।

अभी हाल में अमेरिका से चरखे की मांग आई, तो वहां 8090 तरीके के चरखों का निर्यात किया गया। वहां अब लोग चरखा चलाकर ध्यान करते हैं। प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक डॉ. रामजी सिंह कहते हैं कि चक्की, चूल्हा और चरखा हमारी संस्कृति के अंग हैं। गांधी ने चरखे को नया जीवन दिया और स्वतंत्रता और स्वाबलंबन से जोड़ा। चरखे के लिए गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता सेनानियों ने बहुत कुर्बानियां दी हैं। ब्रिटिश हुकूमत चरखे तोड़ती थी। खादी भंडारों पर हमले करती थी, लेकिन स्वाधीनता सेनानी पीछे नहीं हटे। उनके प्रयासों से घरघर चरखे चलने लगे थे। चरखा केवल चरखा नहीं था, वह सुदर्शन चक्र बन गया था और इस तरह देश आजाद हुआ।  

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here