हाराष्ट्र में भाजपाशिवसेना के गठजोड़ पर रहरहकर कयास लगाये जाते रहे हैं। यह फिर हुआ, जब शिवसेना ने इस बार के उपचुनाव में भाजपा के सामने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए। नये हालात पर केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का बयान काबिलेगौर है। वे कहते हैंतेरे बिना हमारा चलता भी नहीं है और तुम्हारे हमारे बीच बनता भी नहीं है। गडकरी का यह बयान बहुत मायने रखता है। असल में इस गठबंधन को अटूट रखने का मुख्य कारण हिंदुत्व है। इसी फेवीकोल वाले जोड़ ने इन दोनों दलों को एकसाथ रहने पर मजबूर किया हुआ है।

राज्य में पालघर भंडारागोंदिया लोकसभा उपचुनाव में दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर एकबार फिर से तकरार सामने आई। शिवसेना ने भाजपा की परंपरागत लोकसभा सीट पर प्रत्याशी उतारा और भाजपा के साथ ढाई दशक पहले के गठबंधन को चुनौती देते हुए खुद के बल पर चुनाव लड़ने की हुंकार भरी। इस उपचुनाव में दोनों दल एक दूसरे के सामने थे। चुनाव प्रचार के दौरान शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच भी आरोपप्रत्यारोप हुए। राज्य के परिवहन मंत्री दिवाकर रावते ने विदर्भ में शिवसेना पदाधिकारियों नेताओं की बैठक कर अगला चुनाव अकेले दम पर लड़ने की घोषणा कर दी। हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बयान दिया कि गठबंधन की बात सिर्फ शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से ही की जाएगी।

भाजपा  व शिवसेना के चुनावी गठबंधन को सबसे पुराना माना जाता रहा है। हिंदूत्व को अहम स्थान देते हुए  इस गठबंधन की नींव भाजपा नेता प्रमोद महाजन व शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने रखी था।

इसके बाद यह फिर से दोनों दलों का अंदरूनी मामला बन गया है। गठबंधन की नींव रखे जाते समय प्रमोद महाजन और बालासाहेब ठाकरे के बीच हिंदुत्व की रक्षा के लिए 80 फीसदी राजनीति के लिए सिर्फ 20 फीसदी काम करने का महत्वपूर्ण फार्मूला तय किया गया था। विवाद तो बालासाहेब ठाकरे प्रमोद महाजन के जीवित रहते भी हुए थे। पार्टियों के निचले स्तर पर गठबंधन को लेकर विवाद उठे,लेकिन बाद में बालासाहेब ठाकरे प्रमोद महाजन  ने इस विवाद को इसी हिंदुत्व के नाम पर सुलझा लिया था। इसी  मुद्दे को मूल में रखने की वजह से दोनों पार्टियों का राज्य में विकास हुआ। 1980 में भाजपा का उदय हुआ था। उसे भी अपनी पार्टी का हर स्तर पर विस्तार करना था। इसी तरह  शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी, लेकिन पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिल सकी थी। हिंदुत्व के मुद्दे पर जैसे ही दोनों दल साथ आए, इनका तेजी से विस्तार हुआ। ये 1990 में राज्य में विपक्षी दल तथा 1995 में राज्य की सत्ता तक पहुंच गए। हिंदुत्व का असर इतना प्रभावी रहा है कि आज राज्य से कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस जैसी प्रमुख पार्टियां हांसिए पर पहुंच गई हैं। आम तौर पर पहले शहरों तक सीमित दोनों दलों का जनाधार अब ग्रामीण स्तर पर भी हो गया है।

भारतीय जनता पार्टी इस समय ग्रामसभा , ग्रामपंचायत, नगरपंचायत, नगरपालिका से लेकर महानगरपालिका तक अपना वर्चस्व स्थापित कर चुकी है। कमोबेश शिवसेना भी इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में अपना विस्तार कर चुकी है। इन दोनों दलों ने हिंदुत्व को अपनाते हुए कांग्रेस सहित अन्य दलों के परंपरागत वोट को अपनी ओर मोड़ने में सफलता प्राप्त किया है। आम तौर पर सफलता मिलने के बाद हर दल पुराने मुद्दे को भूल कर नए मुद्दे की तलाश करना चाहता है। इस समय गली से दिल्ली तक भाजपा सहयोगी दलों की सरकार है और शिवसेना भी इसमें सहभागी है। लेकिन सत्ता में रहते हुए सत्ताविरोधी बयानबाजी शिवसेना की ओर से बारबार की जा रही है। इससे भाजपा के दूसरी तीसरी कतार के नेताओं के सुझाव गठबंधन तोड़ लेने के पक्ष में आते हैं। इस बाबत राज्य के मंत्री सुधीर मुनगंटीवार, गिरीश महाजन और यहां तक कि मुंबई भाजपा अध्यक्ष आशीष शेलार भी अकेले दम पर अगला चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं।  इसके बावजूद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व गठबंधन की जरूरत को समझ रहा है। आरपीआई नेता रामदास आठवले भी आगामी लोकसभा चुनाव दोनों दलों के साथ लड़ने की वकालत कर रहे हैं। प्रदेश के राजस्व मंत्री चंद्रकांत दादा पाटील भी गठबंधन टूटने पर कांग्रेस का लाभ देखते हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तो गठबंधन की चर्चा अब सिर्फ शिवसेना अध्यक्ष से करने का बयान देकर गेंद उद्धव ठाकरे की ओर डाल दिया है। उम्मीद है कि उद्ध ठाकरे हिंदुत्व से अलग नहीं होंगे।  

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