The Prime Minister, Shri Narendra Modi delivering the keynote address at Shangri La Dialogue, in Singapore on June 01, 2018.

कु समय से शांगरी ला संवाद रणनीतिक विषयों पर बात करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म हो गया है। लंदन से संचालित होने वाली इस संस्था इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज से अब तक 28 देश जुड़ चुके हैं। इसमें एशिया और यूरोप के अधिकांश महत्वपूर्ण देश सम्मिलित हैं। अब तक उसमें भारत का प्रतिनिधित्व कनिष्ठ स्तर पर ही हो रहा था। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विदेश नीति को अपनी प्रगति के लिए एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में इस्तेमाल करना आरंभ किया है। इसलिए सिंगापुर में एक से तीन जून को आयोजित इस बार के संवाद में मुख्य वक्ता के रूप में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भागीदारी की। सदस्य और आमंत्रित देशों सहित इस बार के संवाद में कोई 50 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स माटिस भी इस बैठक में भाग लेने पहुंचे थे। भारत की रणनीतिक दृष्टि को स्पष्ट करने के लिए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस संवाद में आमंत्रित किया गया था। उनसे अमेरिका और चीन दोनों को ही यह अपेक्षा थी कि प्रधानमंत्री का भाषण उनकी दृष्टि के अनुकूल होगा। विशेष रूप से चीनी नेताओं को यह अपेक्षा रही होगी, क्योंकि पिछले दो महीने से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनौपचारिक और एकांतिक शिखर वार्ताएं हुई हैं। दूसरी तरफ अमेरिका हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत को चीन की संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरते देखना चाहता है। इसलिए उसने अब तक इस क्षेत्र के लिए व्यवहार में लाए जा रहे एशियाप्रशांत नाम को बदलकर हिंदप्रशांत कर दिया और अब चीन को छोड़कर अधिकांश देश इसी नाम का उपयोग कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में मध्य मार्ग अपनाना ही उचित समझा और उन्होंने अपने वक्तव्य को नीति केंद्रित बनाए रखा। उन्होंने अपने भाषण में मुख्यत: तीन बिंदुओं पर सबका ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की। उन्होंने भारतीय सभ्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि कैसे वह व्यापारिक और सांस्कृतिक साधनों का उपयोग करते हुए इस बड़े क्षेत्र को प्रभावित करने में सफल रही थीं। उन्होंने गुजरात के लोथल बंदरगाह का उल्लेख करते हुए कहा कि वह संसार के सबसे पुराने व्यापारिक केंद्रों में से एक था। भारत का व्यापार पूर्व और पश्चिम दोनों ही दिशाओं में सुदूर क्षेत्रों तक फैला था और उसने स्थानीय आबादी को समृद्ध करने में अपना योगदान दिया। इसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि वह भी बड़ी सहजता से सुदूर क्षेत्रों तक फैला। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों से मेल बैठाने में उसे कोई समस्या नहीं हुई। उसने अन्य जातियों और समाजों को भी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से उन्नत होने में सहायता दी। बौद्ध धर्म का प्रसार उसके उन्नत चिंतन के कारण हुआ कि उसे किसी ने बलपूर्वक फैलाया। व्यापार और धर्म के अलावा भारत की समृद्ध संस्कृति और कलाकौशल भी अन्य समाजों में ग्राह्य हुए। इस तरह भारतीय सभ्यता का प्रसार एक सकारात्मक घटना ही थी। उसने विभिन्न समाजों को नैतिक और भौतिक रूप से आगे बढ़ने में सहायता की।

वैश्विक पटल पर रणनीतिक विषयों पर बात करने के लिए मशहूर ‘शांगरी ला संवाद’ में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी बात रखी। अमेरिका और चीन दोनों को ही यह अपेक्षा थी कि मोदी का भाषण उनकी दृष्टि के अनुकूल होगा।

प्रधानमंत्री ने दूसरी बात यह कही कि इस पूरे क्षेत्र में भारत सदा सबको जोड़ने वाली शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहा है। आज भी वह इस पूरे क्षेत्र को एक सूत्र में जोड़े रखने की भूमिका निभा रहा है और सभी देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इस सिलसिले में उन्होंने हिंदप्रशांत क्षेत्र का उल्लेख किया। इस क्षेत्र को चीन और अमेरिका अलगअलग दृष्टि से देखते हैं। चीन उसे एशिया और प्रशांत सागर के बीच के व्यापारिक मार्ग के रूप में देखता है और अमेरिका उसे हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले सामुद्रिक मार्ग के रूप में। लेकिन नरेंद्र मोदी ने उसका विस्तार करते हुए उसे अफ्रीका से लगाकर अमेरिका तक को जोड़ने वाले व्यस्ततम सामुद्रिक मार्ग के रूप में दिखाया। उन्होंने कहा कि भारत के लिए तो उसका और भी बड़ा महत्व है क्योंकि भारत का नब्बे प्रतिशत व्यापार इसी मार्ग से होता है। संसार के इस व्यस्ततम व्यापारिक मार्ग को खुला, स्वतंत्र और सर्वसुलभ रहना चाहिए। इसी में सभी देशों का हित है। कोई भी इसमें बाधा पहुंचाता है तो वह अपने और अन्य देशों के हितों के विरुद्ध आचरण करने वाला माना जाएगा। प्रधानमंत्री ने यह बात निश्चय ही चीन को ध्यान में रखकर कही थी। चीन का नाम लिए बिना उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि चीन दक्षिणी चीन सागर के द्वीपों और जलमार्गों को नियंत्रित करने की जिस तरह कोशिश कर रहा है, भारत उसे उचित नहीं मानता। दक्षिण चीन सागर को नियंत्रित करने के लिए चीन जो कुछ कर रहा है, उस पर वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया आदि अनेक देशों ने आपत्ति की है। भारत के इस सर्वज्ञात दृष्टिकोण ने इन सब देशों को आश्वस्त किया होगा। लेकिन अपने इस भाषण में उन्होंने अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया और भारत को मिलाकर एक चतुर्भुज बनाए जाने की जो कोशिश की जा रही है, उसका संभवत: जानबूझकर उल्लेख नहीं किया। भारत अमेरिका और जापान से इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर रणनीतिक सहयोग कर ही रहा है। मालाबार नौसैनिक अभ्यास में यह देश साथ हैं। आॅस्ट्रेलिया ने चीन के दबाव में कुछ समय पहले अपने को इससे अलग कर लिया था। अब वह फिर जुड़ना चाहता है, लेकिन भारत उतावली के पक्ष में नहीं है।

नरेंद्र मोदी के व्याख्यान का तीसरा बिंदु अंतरराष्ट्रीय राजनीति की नई समस्याओं पर भारतीय दृष्टि को स्पष्ट करना था। भारत को इस समय एक तरफ अमेरिकी संरक्षणवाद समस्या लग रहा है, तो दूसरी तरफ चीन की आक्रामक व्यापारिक और सामरिक नीतियां। इन दोनों समस्याओं के बारे में प्रधानमंत्री ने बिना लागलपेट के भारतीय दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संरक्षणवाद की जो नई प्रवृत्ति उभर रही है, वह दुनिया के आर्थिक विकास में बाधा पहुंचाएगी। दुनियाभर की आर्थिक प्रगति के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाने में परस्पर सहयोग की आवश्यकता है, कि संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की। स्पष्ट था कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों का उल्लेख और उसकी आलोचना कर रहे थे, जिसके कारण एक तरह के व्यापारिक युद्ध की आशंका पैदा हो गई है। ट्रम्प की नीतियों के खिलाफ चीन ही नहीं यूरोपीय संघ, मैक्सिको और कनाडा जैसे अमेरिकी सहयोगी भी आवाज उठा रहे हैं। भारत भी उसके कुछ कदमों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन में गया है। इसके अलावा मोदी ने उन प्रवृत्तियों की आलोचना की, जो अपनी नीतियों से दूसरे देशों को कर्ज में डुबोती चली जा रही है और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है। यह चीन की तरफ इशारा था, जो अपनी वन बेल्टवन रोड योजना के जरिये अन्य देशों को कर्ज के जाल में फंसाता जा रहा है और दक्षिणी चीन सागर के द्वीपों को सामरिक अड्डों में परिवर्तित कर रहा है। नरेंद्र मोदी द्वारा अमेरिका और चीन दोनों की यह आलोचना नीति केंद्रित थी और उन्होंने सीधे किसी का नाम नहीं लिया।

इस सबके बाद नरेंद्र मोदी ने भारतचीन संबंधों की मर्यादा खींचते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच परस्पर विश्वास और सहयोग एशिया को एक महत्वपूर्ण शक्ति केंद्र के रूप में उभारने के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि दृष्टिकोण में अंतर हो सकता है, पर उसे विवाद के रूप में परिवर्तित नहीं होने देना चाहिए। इसी तरह प्रतिस्पर्धा होना अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन अगर वही संघर्ष का रूप ले ले तो वह दोनों को हानि पहुंचा सकती है। नरेंद्र मोदी की इन बातों को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने सकारात्मक बताया और राज्य नियंत्रित चीनी मीडिया में उसकी प्रशंसा हुई। अपनी आर्थिक प्रगति के इस संक्रमण काल में भारत चीन के साथ ऐसा कोई नया विवाद नहीं चाहता, जैसा पिछले दिनों डोकलाम में हुआ था। सम्मेलन के अंतिम दिन प्रधानमंत्री की अमेरिकी रक्षामंत्री जेम्स माटिस से एकांत वार्ता हुई। दोनों ने परस्पर हितों से संबंधित प्रश्नों पर चर्चा की। अमेरिकी रक्षामंत्री ने भारत को इस पूरे क्षेत्र की अग्रणी शक्ति बताया और कहा कि इस पूरे क्षेत्र में संतुलन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमेरिका की इस समय सबसे बड़ी चिंता दक्षिणी चीन सागर में चीन की आक्रामकता है। उसे संतुलित करने के लिए अमेरिका भारत को एक सहयोगी शक्ति के रूप में देखता है। भारत के राष्ट्रीय हित इसी में हैं कि दक्षिणी चीन सागर को चीन के नियंत्रण में पड़ने से रोका जाए। लेकिन ऐसा वह स्वतंत्र शक्ति के रूप में ही करेगा, किसी गोलबंदी में पड़कर नहीं।

पिछले दिनों भारत और अमेरिकी संबंधों में निकटता बढ़ी है। भारत में इस बात पर संतोष जताया गया है कि अमेरिका पाकिस्तान के आतंकवादी तंत्र से नाराज है और वह पाकिस्तान से अपने हाथ खींच रहा है। इसी तरह चीन की आक्रामक शैली को लेकर अमेरिका में जो चिंता व्यक्त की जा रही है, उसे भी भारत में सकारात्मक माना जा रहा है। लेकिन इधर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस तरह के फैसले ले रहे हैं, उससे अमेरिकी नीति में काफी अनिश्चितता गई है और वे ट्रम्प के संकीर्ण दृष्टिकोण और पूर्वग्रहों का परिणाम लगते हैं। इसने भारत के राजनैतिक और राजनयिक प्रतिष्ठान को सशंकित किया है और उसके अनुरूप ही भारत अपनी विदेश नीति को पुनर्योजित कर रहा है।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here