खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना वह नाम हैं, जिसको शायद ही कोई खादी प्रेमी न जानता हो। वे खादी को जन-जन तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। क्या रविवार, क्या शनिवार विनय सक्सेना का कार्यालय हर दिन खुला रहता है। काम के प्रति उनका झुकाव यह साफ दर्शाता है कि वह नित नये प्रयोगों के द्वारा खादी पर पड़ी वर्षों की धूल को साफ करने में पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं। खादी ग्रामोद्योग की वर्तमान स्थिति को लेकर श्वेतांक पांडेय ने युगवार्ता के लिए उनसे यह बातचीत की।  पेश है बातचीत के प्रमुख अंश-


2014 के पहले और बाद के खादी को बताना है, तो आप क्या कहना चाहेंगे?

2014 से पहले खादी ग्रामोद्योग की दर महज दो प्रतिशत से अधिकतम 8 प्रतिशत के बीच में रहती थी। ये दुर्भाग्य की बात है कि उस दौरान खादी ग्रामोद्योग की वृद्धि ने कभी दहाई का आंकड़ा नहीं छुआ था। लेकिन 2014 के बाद इन चार सालों के कार्यकाल में खादी की बिक्री 32.95 प्रतिशत तक की वृद्धि हासिल कर ली। आज खादी की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। साथ ही गांव और खादी ग्रामोद्योग उत्पादों के निर्यात में

लगभग 133 प्रतिशत उछाल आया है। कहने का अर्थ यह है कि खादी जन-जन तक पहुंच रही है। लोगों में खादी की स्वीकार्यता बढ़ी है। विपक्ष सोच भी नहीं सकता कि सरकार नें खादी को कहां पहुंचा दिया है।

आपने बताया कि सामान्य जन तक खादी पहुंच रही है। यह किस तरह के कदम थे जिससे यह मुमकिन हो सका ?

व्यवस्थाएं तो पहले भी थीं, लेकिन इच्छाशक्ति में कहीं ना कहीं कमी रह गई थी। पिछली सरकार ने खादी को सिर्फ एक मुखौटे के रूप में उपयोग किया। खादी कांग्रेस के लिए सिर्फ एक चिह्न था। जिसका उपयोग वह लोगों की भावनाओं को अपने हित में उपयोग करने के लिए करती थी। लेकिन मोदी सरकार ने खादी की वृद्धि के बारे में सोचा। उदाहरण के तौर पर अगर हम चरखे को लें, तो यह चरखा खादी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। पिछली सरकार के कार्यकाल में 2004 से लेकर 2014 तक सिर्फ 175 चरखे बांटे गये। लेकिन पिछले चार सालों में हमने 30,767 चरखे बांटे। इससे समझा जा सकता है कि खादी की मुख्य कड़ी (चरखा) को वर्तमान सरकार ने कितनी संजीदगी से पुनर्जीवित किया। यह पहला काम था जिससे खादी ने अपनी मूल स्थिति प्राप्त की। इसके बाद हमने उन संस्थाओं को फिर से शुरू किया जो लंबे समय से बंद हो चुकीं थीं। इन संस्थाओं के एक बार फिर से शुरू होने से खादी का उत्पाद बढ़ा। जिससे खादी की पहुंच बहुत बड़े वर्ग तक हो गयी।

उन बंद संस्थाओं के बारे में बताइए जिनको आपने फिर से शुरू किया?

जी जरुर। (मुस्कुराते हुए) आपने बेहद ही महत्वपूर्ण प्रश्न किया है। सरकार ने यह देखा कि पूरे देश में खादी से जुड़ी कई संस्थाएं बंद पड़ीं हैं। हमने उन पर बड़े स्तर पर काम किया। 375 संस्थाओं को शुरू किया। कई ऐसी संस्थाएं भी थीं जिनको खुद महात्मा गांधी ने शुरू किया था। जिसमें, मैं खास तौर पर वाराणसी के सेवापुरी में स्थित संस्था का जिक्र करना चाहूंगा। यह संस्था महात्मा गांधी के द्वारा स्थापित की गई थी। कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि कर्नाटक के मैसूर जिले से 19 किलोमीटर दूर बदनावालू में स्थित एक खादी की संस्था है। उसका इतिहास ऐसा है कि 1926 में महात्मा गांधी जी ने जब चरखा संघ की स्थापना की तो उस वक्त उन्होंने आह्वान किया कि लोग खादी से जुड़ें और चरखे से काती हुई खादी को अपनाएं।

पिछली सरकार ने खादी को सिर्फ एक मुखौटे के रूप में उपयोग किया। खादी कांग्रेस के लिए एक चिह्न था। इसका उपयोग वह लोगों की भावनाओं को अपने हित में उपयोग करने के लिए करती थी। लेकिन मोदी सरकार ने खादी की वृद्धि के बारे में सोचा। उदाहरण के तौर पर अगर हम चरखे को लें, तो यह चरखा खादी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। पिछली सरकार के कार्यकाल में 2004 से लेकर 2014 तक सिर्फ 175 चरखे बांटे गये। लेकिन पिछले चार सालों में हमने 30,767 चरखे बांटे।

इसका असर ये हुआ कि 1927 में 4 दलित महिलाओं ने यहां खादी बनाने की संस्था स्थापित की। यह क्षेत्र बेहद पिछड़ा हुआ था। खुद गांधीजी यहां इन महिलाओं के काम को देखने आए थे। लेकिन 1993 में जातीय संघर्ष के कारण यह संस्था पूरी तरह से समाप्त हो गई। मोदी सरकार ने पिछली फरवरी को इस संस्था को पुन: स्थापित किया और आज की तारीख में सौ की संख्या में चरखे वहां चल रहे हैं। जिससे 210 लोगों को वहां रोजगार मिला हुआ है।

खादी के माध्यम से कितने लोग लाभान्वित हैं या रोजगार प्राप्त कर चुके हैं?

अगर अभी देखें तो हमारे 4,10,025 लोग खादी से रोजगार पाकर लाभान्वित हो रहे हैं। वर्ष 2014 के पहले खादी के नाम पर 11 लाख 60 हजार संस्थाएं चल रहीं थीं। असलियत में उनके नाम पर संस्थाएं सिर्फ सब्सिडी लिया करती थीं। लेकन मोदी सरकार ने निर्णय लिया कि इस पूरी व्यवस्था को डिजिटलाइज किया जाएगा। हमने इन संस्थानों के बैंक खातों को आधार कार्ड से लिंक करना शुरू किया। जिसके बाद 11 लाख 60 हजार संस्थाओं की संख्या घटकर मात्र 4 लाख 42 हजार पर आ गई। इसका मतलब जितने भी फेक संस्थाएं थीं वह बाहर हो गईं। इस निर्णय के बाद खादी की जितनी भी वाजिब संस्थाएं हैं अब उनमें सीधा पैसा पहुंच रहा है। जिनके नाम पर गलत तरीके से पैसे लिए जा रहे थे वह संस्थाएं बंद हो गई हैं। पिछले साल हम लोगों ने 153 करोड़ की सब्सिडी बचाई है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके इस बात की खुशी जाहिर की थी।  

आने वाले समय में आप खादी के भविष्य को कैसे देख रहे हैं? आगामी क्या योजनाएं खादी को लेकर शुरू करने वाले हैं ?

हमारा लक्ष्य खादी को 5000 करोड़ के टर्नओवर पर ले जाना है। पिछले 3 सालों में हमने पहली बार कॉपोर्रेट के साथ भी टाइअप किया है। आदित्य बिड़ला, अरविन्द मील, रेमंड, एबीएफएल सहित कई कंपनियां हमसे लाखों मीटर कपड़ा खरीद रही हैं। जिससे खादी को एक नया आयाम मिला है। हमने मॉल्स में अपने स्टॉल खोले हैं। जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। नोएडा से लेकर दिल्ली तक कई जगहों पर मॉल्स में खादी बड़ी आसानी से उपलब्ध है। जहां पहले कभी देखने को भी नहीं मिलती थी। पहले कभी खादी की फ्रेंचाइजी नहीं बांटी गई। लेकिन आज हम फ्रेंचाइजी दे रहे हैं। इसके साथ रोजगार अपने आप जुड़ जाता है। कई लोग इससे लाभांवित हो रहे हैं। खादी जन-जन तक पहुंचे यही सोच हमारे प्रधानमंत्री की है। यह कभी सिर्फ बुजुर्गों और नेताओं की पोशाक बनकर रह गई थी। यह कहने में मुझे बेहद खुशी हो रही है कि हम कुछ हद तक इस काम में सफल भी हुए हैं। खादी की स्थिति भी बेहद दयनीय हो चली थी। जब से मैंने इस विभाग को संभाला उसके बाद से इसकी स्थिति कुछ हद तक सुधरी है। खादी सिर्फ ऐशो-आराम की संस्था बनकर रही गई थी, लेकिन अब आॅफिस हर दिन खुला रहता है। लगातार यहां काम चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खादी से जुड़े पांच कार्यक्रम अभी पाइप लाइन में हैं। जल्द ही वह मूर्त रूप ले लेंगे।

खादी के विषय में अब तक के कार्यकाल में आपने जो महसूस किया उसका सार क्या है ?

जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कहते हैं कि खादी के एक वस्त्र का उपयोग हर व्यक्ति को करना चाहिए। मैं भी यही संदेश देना चाहूंगा। क्योंकि इसके पीछे का उद्देश्य बड़ा ही सुंदर है। जब आप खादी का कोई सामान उपयोग करते हैं, तो सिर्फ आप वह सामान ही उपयोग नहीं करते बल्कि आप देश की विरासत को पहनते हैं, उसको सजोते हैं। उसके साथ-साथ देश का वह गरीब व्यक्ति जो देश के किसी सुदूर गांव में है, जहां पर कोई भी मूलभूत व्यवस्था नहीं है। वहां पर बैठा व्यक्ति या महिला जो चरखा चला रही है। आपकी इस खरीद का असर सीधे उसके जीवन पर पड़ता है। आपके खादी के कपड़े को खरीदने से वह पैसा कहीं ना कहीं उस व्यक्ति तक पहुंचता है। जिससे उसके जीवन में एक उजाला आता है। खादी देश की विरासत है जिसको बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

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