पूरी दुनिया की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, बेमौसम आंधी, तूफान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है। साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। दुनिया भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है। पिछले दो सालों में देश के कई इलाकों में बेमौसम बरसात और सूखे की वजह से किसानों की बड़ी आबादी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है। पिछले साल अचानक आई बेमौसम बारिश ने कहर ढाते हुए कई राज्यों की कुल 50 लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दिया था। मौसम में तीव्र परिवर्तन हो रहा है, ऋतु चक्र बिगड़ चुके हैं। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है। सच्चाई यह है कि देश में कृषि क्षेत्र में मचे हाहाकार का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। दुनियाभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रहे हैं, परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणति होती दिखाई नहीं दे रही है।

इस बार भारत ने 44वें विश्व पर्यावरण दिवस की मेजबानी की जिसका केंद्रीय विषय ‘‘बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन’’ है। दुनिया भर में इसी केंद्रीय विषय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन का उद्देश्य पर्यावरण की महत्ता एवं उसके संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक बनाना है। प्लास्टिक नॉनबॉयोडिग्रेडेबल होता है। नॉनबॉयोडिग्रेडेबल ऐसे पदार्थ होते हैं, जो बैक्टीरिया के द्वारा ऐसी अवस्था में नहीं पहुंच पाते जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान हो। कचरे की रिसाइक्लिंग बेहद जरूरी है क्योंकि प्लास्टिक की एक छोटी सी पॉलीथीन को भी पूरी तरह से छोटे पार्टिकल्स में तब्दील होने में हजारों सालों का समय लगता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर वर्ष दुनियाभर में 500 अरब प्लास्टिक बैग उपयोग होते हैं, जो सभी प्रकार के अपशिष्टों का 10 प्रतिशत है। हमारे देश में प्रतिदिन 15,000 टन प्लास्टिक अपशिष्ट निकलता है, जिसकी मात्रा निरंतर बढ़ती जा रही है। प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि पूरे विश्व में इतना प्लास्टिक हो गया है कि इस प्लास्टिक से पृथ्वी को पांच बार लपेटा जा सकता है। समुद्र में करीब 80 लाख टन प्लास्टिक बहा दिया जाता है, जिसका अर्थ है कि प्रति मिनट एक ट्रक कचरा समुद्र में डाला जा रहा है। यह स्थिति पृथ्वी के वातावरण के लिए बेहद हानिकारक हो सकती है, क्योंकि प्लास्टिक को अपघटित होने में 450 से 1000 वर्ष लग जाते हैं। अरबों पाउंड प्लास्टिक पृथ्वी के पानी स्त्रोतों खासकर समुद्रों में पड़ा हुआ है। 50 प्रतिशत प्लास्टिक की वस्तुएं हम सिर्फ एक बार काम में लेकर फेंक देते हैं। प्लास्टिक के उत्पादन में पूरे विश्व के कुल तेल का 8 प्रतिशत तेल खर्च हो जाता है।

हमारे जीवन की सबसे सुविधाजनक चीज प्लास्टिक पर्यावरण के लिए खतरनाक समस्या बन गई है। इस बात पर ध्यान खींचने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘बीट प्लास्टिक’ का नारा दिया गया।

कार्बन उत्सर्जन में कमी

नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। दुनियाभर में कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुंचाया है, एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5 से 2.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग आॅर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा।

खाद्य उत्पादन में कमी  

पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स आॅफ नेशनल एकेडमी आॅफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने सरकार, कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है।

एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा। इस बार पर्यावरण दिवस की थीम ‘‘बीट प्लास्टिक’’ है, ऐसे में हमें प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करने का संकल्प लेना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक का उपयोग कम करने के लिए कुछ उपाय भी अपनाने होंगे। प्लास्टिक बैग और पोलिएस्ट्रीन फोम को कम से कम इस्तेमाल करने की कोशिश करें। इनका रिसायकल रेट बहुत कम होता है। मिट्टी के पारंपरिक तरीके से बने बर्तनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दें। प्लास्टिक बैग्स से होने वाले नुकसान की जानकारी अपने आप में नाकाफी है, जब तक इसके नुकसान जानने के बाद ठोस कदम उठाए जाएं। सरकार और पर्यावरण संस्थाओं के अलावा भी हर एक नागरिक की पर्यावरण के प्रति कुछ खास जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें अगर समझ लिया जाए तो पर्यावरण को होने वाली हानि को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। खुद पर नियंत्रण इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।

(लेखक राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और टेक्निकल टुडे मैगजीन के संपादक हैं)

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here