राजनीतिक तौर पर देश की अर्थव्यवस्था की चाहे जितनी भी आलोचना की जाए, लेकिन पिछले वित्त वर्ष की आखिरी दो तिमाहियों में आर्थिक विकास दर के सात फीसदी और उससे अधिक होने से साफ हो गया है कि अब तक तमाम चुनौतियों का सामना कर रही देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है। पिछले वर्ष यानी 2017-18 की आखिरी तिमाही अर्थात जनवरी से मार्च 2018 की अवधि में देश की आर्थिक विकास दर 7.7 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गयी है। इससे जहां अर्थव्यवस्था के मजबूत होने की उम्मीद बनी है, वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले का यह आंकड़ा तमाम चुनौतियों और आलोचनाओं से जूझ रही केंद्र सरकार के लिए एक बड़े राहत के रूप में सामने आया है।

2016 की नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी के रूप में नई कर प्रणाली से निश्चित रूप से देश को आर्थिक मोर्चे पर बड़े झटके लगे थे। लेकिन, 2017-18 की आखिरी दो तिमाहियों में आर्थिक विकास दर ने सात फीसदी या इससे अधिक का आंकड़ा छू कर जाहिर कर दिया है कि अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार पर गयी है और अगर कोई बड़ी नकारात्मक बात नहीं हुई तो मौजूदा वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों तक पहुंच जायेगी। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) की ओर से चौथी तिमाही की विकास दर के जो आंकड़े जारी जारी किये गये हैं, वे इसके पहले की सात तिमाहियों में सबसे तेज उछाल दर्शाते हैं। जीडीपी की तिमाही वृद्धि दर नोटबंदी से पहले की तिमाही की रफ्तार से भी ज्यादा है। खास बात तो ये है कि पिछली कई तिमाहियों से सुस्त पड़े निवेश की रफ्तार भी अब तेज होने लगी है।

मैन्युफैक्चरिंग का कमाल

विकास दर में आयी इस उछाल के लिए मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि भी काफी उल्लेखनीय रही है, जो जीएसटी लागू होने के बाद से लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में भी 11.5 फीसदी की तेज रफ्तार ने आखिरी तिमाही में विकास दर की रफ्तार को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। केंद्रीय सांख्यिकी आयोग ने 2017-18 की आखिरी तिमाही के आंकड़े जारी करने के साथ ही पूरे वर्ष के लिए भी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े जारी किये हैं। 2017-18 के दौरान देश की जीडीपी 130.11 लाख करोड़ रुपये रही, जो इसके पहले के वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 6.7 फीसदी अधिक अधिक है। सीएसओ ने इसके पहले 28 फरवरी को 2017-18 के लिए विकास दर के 6.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। लेकिन, चौथी तिमाही में विकास दर में आयी जबरदस्त उछाल ने इस आंकड़े को बढ़ाकर 6.7 फीसदी कर दिया।

भारत की अर्थव्यवस्था नोटबंदी और जीएसटी से लगे झटकों के दुष्प्रभावों से उबर चुकी है। 2017-18 की आखिरी तिमाही में विकास दर 7.7 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर रही। साफ है कि देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज विकास वाली अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।

दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में माइक्रो इकोनॉमिक्स विभाग के प्रोफेसर डॉ. अभिजीत बनर्जी के मुताबिक देश में नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में जो नकारात्मक और निराशा का माहौल बना था, उसके बाद पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में विकास दर के 7.7 फीसदी के स्तर तक पहुंचने को अप्रत्याशित माना जाना चाहिए। लेकिन, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि पूरे साल की विकास दर 6.7 फीसदी रही है, जो पिछले चार साल के दौरान सबसे कम है। इसके पहले 2013-14 में विकास दर 6.4 फीसदी रही थी। उसके बाद केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद से ही विकास दर की रफ्तार बढ़ी थी और यह लगातार ऊपर चढ़ती रही थी।

मंदी की आशंका निर्मूल

डॉ. बनर्जी के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष की शुरुआती दो तिमाहियों में बने नकारात्मक माहौल से विकास दर के गिरकर छह फीसदी या उससे भी नीचे चली जाने की आशंका भी बन गयी थी। परंतु, आखिरी दो तिमाहियों में विकास दर में आयी उछाल ने इसको निर्मूल साबित कर दिया। 2017-18 की तीसरी तिमाही में विकास दर सात फीसदी रही। उसी वक्त अनुमान किया गया था कि देश की पूरे साल की विकास दर न्यूनतम साढ़े छह फीसदी रहेगी। इसके बाद आखिरी तिमाही में कृषि, निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के योगदान ने तमाम आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया और पूरे साल की विकास दर 6.7 फीसदी पर पहुंच गयी।

विकास दर के संबंध में दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में पब्लिक इकोनॉमिक्स विभाग के प्रोफेसर डॉ. राम सिंह का कहना है कि इस बढ़ोतरी के लिए कृषि क्षेत्र में रबी फसल के उत्पादन को अहम माना जा सकता है। इस साल रबी के रिकॉर्ड उत्पादन के कारण कृषि क्षेत्र की विकास दर 4.5 फीसदी हो गयी है। इसी तरह हाईवे सेक्टर में सरकारी निवेश में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके परिणामस्वरुप निर्माण क्षेत्र की विकास दर भी बढ़कर 11.5 फीसदी हो गयी है। इतना ही नहीं मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर भी बढ़कर 9.1 फीसदी हो गयी है। यह आंकड़ा देश के विकास को लेकर एक उम्मीद जगाता है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर लगभग दो साल बाद इस स्तर पर पहुंच सकी है। अन्यथा नोटबंदी के बाद लगातार दो तिमाहियों में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर नकारात्मक हो गयी थी। जीएसटी लागू होने के ठीक पहले वाली तिमाही में भी इसकी वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गयी थी, लेकिन उसके बाद से इस क्षेत्र की वृद्धि दर लगातार बढ़ रही है।

और सुधारों की जरूरत

अभी भी कुछ क्षेत्र हैं, जहां 2016-17 की आखिरी तिमाही की तुलना में वृद्धि दर कुछ कम रही है। कृषि, वानिकी मत्स्य क्षेत्र में विकास दर तब 7.1 फीसदी थी, जो अभी 4.5 फीसदी है। खनन में विकास दर 18.83 थी जो गिरकर महज 2.7 फीसदी रह गयी है। बिजली, जलापूर्ति अन्य सेवाओं के क्षेत्र में भी तुलनात्मक रूप से 0.4 फीसदी की कमी आयी है। लोक प्रशासन, रक्षा अन्य सेवाओं के क्षेत्र में 2016-17 की आखिरी तिमाही में 16.4 फीसदी की वृद्धि दर रही थी, जो 2017-18 की आखिरी तिमाही में 13.3 फीसदी रही है।

आर्थिक विश्लेषक डॉ. जेवी मीनाक्षी के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में सरकार ने पूरे साल की विकास दर 7.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। इस दौरान देश में निवेश की रफ्तार बढ़ने से भी इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उच्च विकास दर कायम रहेगी। 2017-18 की चौथी तिमाही में जीडीपी के मुकाबले ग्रौस कैपिटल फॉर्मेशन बढ़कर 32.2 फीसदी हो गया है, जो 2016-17 की आखिरी तिमाही में 30.3 फीसदी था। यह निवेश की दृष्टि से एक सकारात्मक संकेत है।

आयात बिल से चिंता

डॉ. मीनाक्षी का कहना है कि सरकार के फैसलों का अर्थव्यवस्था को लाभ मिल रहा है, यह बात विकास दर और निवेश के आंकड़ों से स्पष्ट है। इस साल मौसम विज्ञानियों ने भी मानसून के सामान्य रहने की संभावना जताई है। इसके अलावा आठ बुनियादी क्षेत्रों के विकास दर में वृद्धि दर्ज होने से इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार आने वाले दिनों में बरकरार रहेगी। लेकिन सरकार के लिए आयात बिल में इजाफा होना चिंता की बात है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में हुई बेतहाशा वृद्धि ने देश के आयात बिल को काफी बढ़ा दिया है।

जानकारों का कहना है कि विकास दर पर आयात बिल का नकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि, वैश्विक बाजार से आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमत में कमी आने के संकेत मिल रहे हैं। इसमें पांच से सात डॉलर प्रति बैरल तक की नरमी भी चुकी है और उम्मीद की जा रही है कि अगले दो महीनों में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल तक की और कमी हो सकती है। भारत अपनी जरूरत का तीन चौथाई कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमत मौजूदा स्तर पर बनी रही, तो इससे विकास दर भी प्रभावित होगी। लेकिन, जैसे संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमत में कमी आयी, तो यह भारत के आर्थिक विकास के लिहाज से काफी अच्छा होगा।  

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विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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