नागपुर में ही जवाब दूंगा। प्रणब मुखर्जी ने अपनी आलोचनाओं और बिन मांगी सलाहों के जवाब में यही कहा था। जैसा कहा, वैसा किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निमंत्रण वे स्वीकार करेंगे इसकी आशा जिन लोगों ने नहीं की थी वे चौंके। आपे से बाहर हुए। उन पर सवालों की झड़ी लगा दी। उनके भाषण से पहले सरसंघचालक मोहन भागवत ने प्रसंगवश बताया कि यह हर साल की तरह का ही एक आयोजन है। इसे तूल देना व्यर्थ की कोशिश है। वे उस विवाद को बेमतलब बता रहे थे जो प्रणब मुखर्जी के आने के कारण पैदा किया गया। भले ही मोहन भागवत ने हर साल होने वाले दीक्षांत समारोह जैसा इसे बताया होे और यह भी हो सकता है कि उनकी दृष्टि में कुछ भी असामान्य हो। लेकिन दूसरे ऐसा नहीं मानते। तभी तो जैसेजैसे विवाद को हवा मिली वैसेवैसे उत्सुकता बढ़ती गई।

पहला प्रश्न था कि क्या प्रणब मुखर्जी वहां जाएंगे? जब इसका जवाब उन्होंने दे दिया और कहा कि जो कुछ बोलना है मैं वहीं बोलूंगा। इससे स्पष्ट हो गया कि वे निमंत्रण को स्वीकार करने से पहले ही सोच चुके थे। पुनर्विचार का कोई प्रश्न नहीं था। दूसरा प्रश्न जो था वह देशदुनिया में कौतूहल का कारण बना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रणब मुखर्जी ने जो नहीं सोचा होगा वह हुआ। दुनिया भर की मीडिया नागपुर में पहुंची। उसका सीधा प्रसारण हुआ। अनगिनत लोगों ने करीब ढाई घंटे उसे देखा और सुना। ऐसा इसलिए हुआ कि प्रणब मुखर्जी का संघ के निमंत्रण पर नागपुर पहुंचना अत्यंत आश्चर्यजनक समझा गया। जिसका ही यह प्रभाव था कि हर कोई उस अवसर का साक्षी बनने के लिए आतुर था। इस तरह जो साधारण सा हर साल होेने वाला समारोह था वह असाधारण हो गया। यह भारत के लोकतांत्रिक समाज की बड़ी महिमा है। इसे आलोचकों का एक उपकार भी मान सकते हैं।

संवाद न टूटे, वह चलता रहे, भले ही सहमति न हो, इसे जिस तरह प्रणब मुखर्जी ने चिह्नित किया उससे उन्होंने आलोचकों को एक पाठ पढ़ाया। वह लोकतंत्र का मूल मंत्र है।

प्रणब मुखर्जी ने साहस का परिचय दिया। आलोचनाएं झेलीं। अपने निर्णय से हटे नहीं। वहां वही बोले जो उनके जीवन के अनुभव का निचोड़ है। इससे किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ होगा। प्रणब मुखर्जी को आधी सदी से ज्यादा के सार्वजनिक जीवन का अनुभव है। कांग्रेस चाहे इंदिरा गांधी के समय की हो या सोनिया गांधी की, उसे संकटों से उबारने में प्रणब मुखर्जी की भूमिका निर्णायक रही है। तूफानों में से कांग्रेस की नाव बचाई है। पर यह जाननेसमझने वाले कांग्रेसी उन्हें पहले रोक रहे थे और बाद में सलाह देने लगे कि वे वहां क्या बोले। क्या उनकी सलाह का प्रणब मुखर्जी पर कोई प्रभाव पड़ा? उनके भाषण से ऐसा नहीं लगता। कांग्रेसियों के इस मनोभाव को सूक्ष्मता से देखने पर एक ऐसा तथ्य सामने आता है जो उनके अलोकतांत्रिक और फासिस्ट होने का प्रमाण देता है। इसे दूसरे तरह से भी कह सकते हैं कि कांग्रेसी एक पूर्व राष्ट्रपति को निजी निर्णय लेने में रुकावट डाल रहे थे। उनकी अभिव्यक्ति की आजादी को रोक रहे थे। इस तरह उनके सार्वजनिक जीवन जीने के अधिकार पर हमला कर रहे थे। प्रणब मुखर्जी ने अपने निर्णय से सिद्ध कर दिया कि वे राष्ट्र नेता हैं।

उन्होंने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। भारत में स्वस्थ लोकतंत्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के प्रवाह को उन्होंने बढ़ाया है। उनका कहा हुआ हर शब्द मूल्यवान है। संवाद टूटे, वह चलता रहे, भले ही सहमति हो, इसे जिस तरह उन्होंने चिह्नित किया उससे आलोचकों को एक पाठ पढ़ाया। वह लोकतंत्र का मूल मंत्र है। कह सकते हैं कि इस पर जोर देकर उन्होंने उन लोगों को जवाब दे दिया है जो उन्हें मना कर रहे थे। इसलिए मना कर रहे थे क्योंकि वे लोग मानते हैं कि प्रणब मुखर्जी के नागपुर जाने से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वैधता मिलेगी। बात दूसरी है। ऐसे लोग एक मानसिक भ्रमजाल में फंसे हुए हैं। उससे निकल नहीं पा रहे हैं। इन्हें भ्रम है कि वे जिसे कहेंगे वही सेकुलर माना जाएगा। प्रणब मुखर्जी ने इस भ्रमजाल को तोड़ा है। इसी मायने में नागपुर में उनका जाना और बोलना बड़ी घटना हो गई है। दूसरी जो बड़ी बात सरसंघचालक मोहन भागवत ने कही है वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में मौलिक परिवर्तन की सूचना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दू सहित पूरे समाज की एकता और एकात्मता के लिए कार्य कर रहा है। नागपुर से बदलते समय की सूचना निकली है।

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