ह योग की व्यापकता ही है कि इसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित होने में बहुत समय नहीं लगा। याद करें तो प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए इसके लिए पहल  की थी। उन्होंने कहा था- योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है, मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है, विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है  लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं। प्रधानमंत्री ने जब इस तरह का आह्वान किया, उसके 90 दिन से भी पहले, उसी साल 11 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र ने इसके लिए अपनी मंजूरी दे दी। संयुक्त राष्ट्र संघ में यह किसी भी प्रस्ताव को स्वीकृति देने का सबसे कम समय है। अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस प्रस्ताव के पहले 2011 से ही देश के कुछ योग गुरुओं ने एक योग परिसंघ के साथ मिलकर दुनिया के स्तर पर इस तरह का एक संयुक्त अभियान शुरू कर दिया था।

दिमाग और शरीर के बीच सामंजस्य की लोकहितकारी कोशिश भी विरोध से बच नहीं पायी। हाल यह है कि योग का विरोध नहीं होने पर भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के योग के तरीके का मखौल उड़ाते हैं।

प्रचीन भारतीय परंपरा में मन और शरीर को  स्वस्थ रखने का यह ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों के माध्यम से लगातार जीवंत रहा है। सामाजिक अथवा यूं कहें कि इसे राजनीतिक स्तर पर विश्वव्यापी रूप 2015 में ही मिला, जब पहली बार विश्व योग दिवस मनाया गया। यह उस समय शुरू हुआ, जब उसके पहले यह बात सार्वजनिक हो चुकी थी कि योग हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दैनिक जीवन का भी महत्वपूर्ण अंग है। वह अपनी दिनचर्या योग से ही शुरू करते हैं। मोदी का योग, जैसा उन्होंने खुद कहा है, बदलती जीवन- शैली में चेतना बनकर,जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करता है। दरअसल, यह एक बुनियादी सत्य को प्रस्तुत करने का मोदी का अपना ढंग था। सच तो यह है कि उन्होंने इस सत्य को जनसुलभ बनाने की कोशिश की। इस क्षेत्र में कुछ योग गुरु काम कर रहे थे। जरूरत थी कि इसे कोई जनप्रिय व्यक्ति प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर योग के फायदे बताये तो लोगों के जेहन में यह बात आसानी से उतरती गई। अलग बात है कि उनके योग के ढंग का राजनीतिक रूप से विरोध भी हुआ। फिर भी राजनीतिक विरोध, योग- विरोध नहीं बन सका।

योग विरोध के टिक नहीं पाने का कारण भी साफ था। केंद्र सरकार और खासकर मोदी विरोधियों का तर्क था कि जन समस्याओं से लोगों का ध्यान भटकाने का यह मोदी-योग है। विरोध करने वालों को जल्द यह बात समझ में आने लगी कि स्वास्थ्य भी एक राष्ट्रीय मुद्दा है। फिर इस मुद्दे पर भारतीय दृष्टिकोण विश्वव्यापी बन रहा है। ऐसे में विपक्ष, खासकर कांग्रेस नेता इतिहास के पन्ने पलटने लगे। इलाहाबाद के आनन्द भवन में और कुछ किताबों की शोभा बढ़ा रही वह फोटो तेजी से वॉयरल होने लगी, जो शीर्षासन करते जवाहर लाल नेहरू की है। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ही नहीं, उसके पहले नेहरू भी योग किया करते थे। जगह-जगह शीर्षासन के फायदे बताते पंडित नेहरू के कथन उद्धृत किए जाने लगे। बताया जाने लगा कि नेहरू ने लिखा था ”शीर्षासन के दौरान सिर के बल खड़ा होना होता है।… सिर के नीचे अपनी हथेलियों से सहारा देने की वजह से हाथों और उंगलियों के इंटरलॉक खुलते हैं। मेरा मानना है कि शारीरिक व्यायाम का यह सबसे अच्छा आसन है। मैं इसे पसंद करता हूं। मुझे इससे बहुत फायदा मिला है। योग करने से मेरी मानसिक शक्ति अच्छी होती है और साथ ही दिमाग शांत रहता है, जिससे परेशानी के दौर में भी सहनशीलता की शक्ति विकसित होती है।”

साफ है कि नेहरू ने लिखा था कि शीर्षासन उन्हें बहुत सुकून देता है। शीर्षासन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण वह इसे पसंद करते हैं। नेहरू यह बताते उद्धृत किए गये कि इस मजेदार मुद्रा से उनका हास्य बोध भी बढ़ता है और जीवन में वे ज्यादा सहिष्णु बन पाये हैं। नेहरू की फोटो और उनके कथन के जरिए कांग्रेस नेता उन्हें पहला योगी प्रधानमंत्री बताने में लग गये, तो कांग्रेस सहयोगी और आगे बढ़ आये। तब बिहार के डिप्टी सीएम और राजद नेता तेजस्वी यादव ने नेहरू की वह तस्वीर अपने ट्वीटर हैंडल पर डाली और बीजेपी नेताओं को चुनौती दी। उन्होंने मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों को नेहरू जैसा शीर्षासन कर दिखाने को कहा। तेजस्वी का ट्वीट राजनेताओं के योग वाली बहस में रोचकता शामिल करने तक ही रहा। रोचकता तो बाबा रामदेव के कथन में भी थी। तब उन्होंने कहा कि गांधी-नेहरू परिवार में जिसने योग किया, वह सत्ता में पहुंच गया। जो इससे दूर रहा, सत्ता भी उससे दूर ही रही। रामदेव ने पंडित नेहरू की शीर्षासन वाली तस्वीर आने के पहले ही कहा था कि नेहरू और इंदिरा गांधी के योग करने के प्रमाण मिलते हैं। सोनिया भी कुछ हद तक योग करती हैं। राहुल गांधी योग से दूर हैं। रामदेव ने तो राहुल गांधी को योग सिखाने की पेशकश भी कर दी। उन्होंने योग विरोधी नेताओं को सावधान किया कि वे योग के कार्यक्रम का राजनीतिक विरोध भले करें, योग के विरोध से बचें।

असल में इसके पहले भारतीय राजनीति में योग बहस का मुद्दा नहीं बना।  प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सार्वजनिक तौर पर भी योग कार्यक्रम में रुचि लेते रहे। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 1957 का एक दुर्लभ वीडियो सामने आया। उस वीडियो में प्रधानमंत्री नेहरू अलग-अलग मुद्राओं का प्रदर्शन करते योगियों को तन्मयता के साथ देख रहे हैं। वीडियो में योगी भी गजब के हैं। कोई भारी मात्रा में पानी पीकर बाहर निकाल रहा है तो कोई अपने मुंह से कई मीटर लंबी रस्सी बाहर निकाल रहा है। एक योगी के ऊपर से तो रोडरोलर गुजर जाता है और उसका बाल भी बांका नहीं होता।

यह संयोग ही है कि नेहरू की योगप्रियता के प्रमाण जुटाने के दौरान ही दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की योग मुद्रा वाली एक तस्वीर भी सामने आई। हालांकि यह तस्वीर कांग्रेस नेताओं ने तब कम ही दिखाई थी। वैसे भी आज की कांग्रेस में गांधी- नेहरू परिवार की बात ही आती है। वहां  नेहरू के बाद इंदिरा गांधी की छवि उभरती है। यह भी रोचक है कि पिता और पुत्री, दोनों के एक ही योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी थे। जगह-जगह विवरण मिलते हैं कि इंदिरा गांधी रोज करीब आधा घंटा योग के लिए देती थीं। हमेशा ठंडे पानी से नहाना भी उनकी दिनचर्चा का अंग था, जिसे योग का ही हिस्सा माना जाता है।  अपनी हत्या के दिन भी सुबह उन्होंने धीरेंद्र ब्रह्मचारी की देखरेख में योग किया था। यह भी कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू को शीर्षासन की सीख उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने दी थी। उन्होंने ही जेल से लिखे अपने पत्र में पोती इंदिरा को भी योग करने की सलाह दी थी।

ऐसा नहीं कि नेहरू ले लेकर मोदी के दौर तक राजनेताओं के योग करने के तथ्य किसी वाद और विचारधारा तक सीमित रहे। वाद और विचार विरोधियों ने जरूर एक-दूसरे की योग विधि को कमतर ठहराने की कोशिश की। इनसे अलग भी बड़े राजनेता सहज तरीके से योग को अपने जीवन का अंग बनाये रहे। रुद्रांगशु मुखर्जी लिखित पुस्तक ‘नेहरू बनाम सुभाष’ की पुस्तक बताती है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की रुचि भी रामकृष्ण और विवेकानंद के पठन-पाठन तक ही सीमित नहीं थीं उन्होंने उनके जीवन, लेखन और शिक्षा पर चर्चा के लिए छात्रों का एक समूह बनाया। …वे योग और साधुओं की तरफ भी खिंचे चले गये। इतिहास में इस तरह के और भी संदर्भ मिल सकते हैं। ये इस बात का प्रमाण हैं कि योग के तरीके बहुत हैं, योग की सार्थकता में कोई संदेह नहीं है।  

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डॉ. प्रभात ओझा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में परास्नातक करने के बाद पीएचडी। आज, दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे समाचार पत्रों के बाद एम एच वन और हरियाणा न्यूज जैसे चैनलों भी में कार्य किया है। इस दौरान कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ‘शिवपुरी से श्वालबाख तक’ पुस्तक लेखन के अलावा कई अन्य पुस्तकों का संपादन किया है। इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी से जुड़े हैं। फिलहाल युगवार्ता साप्ताहिक के सहायक संपादक हैं।

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