निर्देशक शशांक खेतान की ‘धड़क’ का ट्रेलर चर्चा का विषय बना हुआ है। यह फिल्म नागराज मंजुल की सुपरहिट मराठी फिल्म ‘सैराट’ पर आधारित है। जातिवादी मानसिकता में अंतर्निहित हिंसा किस तरह ‘आॅनर किलिंग’ के वीभत्स सामाजिकता में परिणत हो जाती है, इसे मार्मिकता से चित्रित कर मंजुले ने एक गंभीर सिनेमाई हस्तक्षेप किया था। महज चार करोड़ में बनी यह फिल्म बहुत जल्दी सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर गयी। इसे दर्शकों के साथ समीक्षकों की भी जोरदार सराहना हासिल हुई थी। अब देखना यह है कि रिंकू राजगुरु और आकाश थोसर की मुख्य भूमिकाओं वाली मराठी ‘सैराट’ के जादू को जाह्नवी कपूर और ईशान खट्टर की ‘धड़क’ किस हद तक दोहरा पाती है।

इस फिल्म पर लोगों की नजर कुछ और कारणों से भी है। मशहूर अदाकारा श्रीदेवी और वरिष्ठ फिल्मकार बोनी कपूर की बेटी जाह्नवी ‘धड़क’ के साथ फिल्मी दुनिया में कदम रख रही हैं। प्रख्यात ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की ‘बियोंड द क्लाउड्स’ में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके अभिनेत्री नीलिमा अजीम के बेटे और अभिनेता शाहिद कपूर के भाई ईशान खट्टर से भी काफी उम्मीदें हैं। करण जौहर द्वारा निर्मित फिल्म होने के कारण भी सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं।

‘धड़क’ से दर्शकों को काफी उम्मीदें हैं। कारण है, सुपरहिट मराठी फिल्म ‘सैराट’ पर आधारित होना। और हिन्दी दर्शकों के लिए स्व. श्रीदेवी की बेटी का फिल्म में काम करना। देखना यह होगा कि ‘धड़क’ उस मापदंड को पा पाती है जिसे ‘सैराट’ ने स्थापित किया है।

यह स्वाभाविक ही है कि हर स्तर पर ‘धड़क’ की तुलना ‘सैराट’ से हो रही है। इस संदर्भ में एक बात समझना जरूरी है कि ‘धड़क’ रीमेक नहीं है, बल्कि ‘सैराट’ का अडॉप्टेशन है। रीमेक में फिल्म अपनी पूर्ववर्ती फिल्म का ही रूप होती है यानी उसकी कॉपी होती है, पर अडॉप्टेशन में कहानी और किरदार पहले बनी फिल्म के ही होते हैं, लेकिन उसकी प्रस्तुति का अंदाज बदल जाता है। अडॉप्टेशन का अच्छा उदाहरण ‘हम आपके हैं कौन’ है, जो ‘नदिया के पार’ पर आधारित थी। अगर ‘धड़क’ के ट्रेलर को देखें, तो पहला अंतर यह दिखता है कि ‘सैराट’ की सादगी यहां ग्लैमर में बदल गयी है। पर ग्लैमर के बिना पॉपुलर बंबईया फिल्म की कल्पना भी मुश्किल है। यह स्वयं में कोई कमी भी नहीं है क्योंकि अनेक ग्लैमरस फिल्मों ने बहुत प्रभावी ढंग से सामाजिक संदेश देने में भी कामयाबी पाई है। फिर यह भी कि दोनों फिल्मों के बजट में जमीन-आसमान का फर्क भी है। शायद ही देश का कोई हिस्सा, चाहे वह गांव हो, शहर हो या महानगर हो, ‘आॅनर किलिंग’ की समस्या से अछूता हो। यह हर तबके और हर वर्ग में मौजूद है। यही कारण है कि मंजुले की फिल्म को बड़े पैमाने पर सराहा गया था। और इसी कारण जौहर जैसे निर्माता ने ऐसी फिल्म बनाने का फैसला लिया है।  

‘सैराट’ एक प्रेम कहानी भर नहीं है। वह एक ऐसी प्रेम कहानी है जो सिनेमा और समाज में बार-बार दोहराये जाने के बावजूद भी एक असंभावना है। इस असंभावना को संभाव्य बनाने की जब भी ईमानदार कोशिश होगी, उसे सराहना मिलेगी। ‘सैराट’ की सफलता की यह एक विवेचना है, जो शशांक और उनकी टीम के लिए एक चुनौती भी है। बीते दो दशकों से पूरे देश के स्थापित फिल्म उद्योगों में घिसे-पिटे फॉर्मूलों से इतर कुछ कहने, सुनाने और दिखाने का साहस और इससे जुड़ी बेचैनी बहुत सघन हो चली है। ‘धड़क’  इसी का एक नतीजा है।

अन्य फिल्म उद्योगों से उलट मुंबई स्थित हिंदी सिनेमा का कारोबार हमारे समाज के गहरे घावों, जिनमें जाति भी है, से परहेज करता रहा है। यह एक बड़ा कारण है कि आज ‘धड़क’ के ट्रेलर को सोशल मीडिया पर इतनी आलोचना मिल रही है क्योंकि इस टीजर से कथानक के मूलभाव का पता नहीं चल पाता है। अनेक लोगों का मानना है कि जौहर-खेतान की जोड़ी जाति के सवाल को हाशिये पर डालकर बस प्यार को दिखाकर तालियां बटोरना चाहती है। अपनी फिल्म के प्रचार के लिए हर फिल्मकार की अपनी एक रणनीति होती है। इस फिल्म के संदर्भ में भी ऐसा ही हो सकता है। मंजुले की कहानी को खेतान ने कैसा ट्रीटमेंट दिया है और कलाकारों ने अपना काम किस तरह से किया है, ऐसे मसलों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का कोई मतलब नहीं है। पर सोशल मीडिया की चंचलता का भी तो कोई उपाय नहीं है।  

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