New Delhi: Jammu and Kashmir Chief Minister Mehbooba Mufti calls on the Prime Minister Narendra Modi in New Delhi on Oct 5, 2016. (Photo: IANS/PIB)

सामान्यत: किसी प्रदेश में राज्यपाल शासन लागू होता है, तो उस पर आने वाली राजनीतिक प्रतिक्रियाएं काफी तीखी होती हैं। जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया किंतु उस तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं हमें सुनने को नहीं मिल रही हैं जिसके हम अभ्यस्त हो चुके हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार की विरोधी आलोचना तो कर रहे हैं, लेकिन उसमें लगभग यह स्वर गायब है कि राज्यपाल शासन लगाकर केन्द्र ने लोकतंत्र का गला घोंटा है। न प्रदेश की कोई पार्टी ऐसी बात कर रही है न राष्ट्रीय स्तर की। न दूसरी क्षेत्रीय भाजपा विरोधी पार्टियां ही। महबूबा मुफ्ती सरकार से भाजपा ने अपने को अलग करने का निर्णय किया लेकिन उनका या उनकी पार्टी का स्वर भी सामान्य है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने केवल यह कहा कि लंबे समय तक राज्यपाल शासन नहीं रहना चाहिए, जितनी जल्दी हो चुनाव करा लिया जाए। यह एक सामान्य सी बात है। इससे हर कोई सहमत होगा कि किसी भी प्रदेश में राज्यपाल शासन ज्यादा समय तक नहीं रहना चाहिए। जितनी जल्दी लोकतांत्रिक प्रक्रिया आंरभ हो जाए उतना ही अच्छा। हालांकि राज्यपाल शासन व्यवस्था भी हमारे लोकतांत्रिक संविधान का ही हिस्सा है। लेकिन प्रदेश में निर्वाचित सरकार कायम हो यह संसदीय लोकतंत्र में पूर्ण लोकतांत्रिक स्थिति मानी जाती है। तो देखना है केन्द्र इस दिशा में कब तक कदम उठाती है।

महबूबा इस्तीफा दे चुकी हैं और राज्य में राज्यपाल शासन लग चुका है। देश में इस बात को लेकर नकारात्मक प्रतिक्रियाएं नहीं देखी गर्इं। जाहिर है कि राज्यपाल शासन के बाद राज्य में आतंक एवं अलगाववाद से रणनीतिक तौर से निपटना प्रमुखता में होगा। यह रणनीति जितनी कारगर होगी जम्मू-कश्मीर और देश का उतना ही भला होगा।

किंतु इस पहलू पर विचार करते समय हमें जम्मू-कश्मीर की चिंताजनक स्थिति को नहीं भूलना चाहिए। महबूबा मुफ्ती ने 4 अप्रैल 2016 को मुख्यमंत्री का पद संभाला था। वे पीडीपी भाजपा गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहीं थीं। उसके पहले उनके पिता स्व. मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में 1 मार्च 2015 से दोनों पार्टियों की मिलीजुली सरकार थी। इस सरकार को यदि जाना पड़ा है, तो इसके कुछ निश्चित और वाजिब कारण हैं। जम्मू-कश्मीर की मूल समस्या मजहबी विचारधारा पर आधारित आतंकवाद और अलगाववाद है। भाजपा की घोषित नीति आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की रही है। उसने अपने चुनाव प्रचार में आतंकवाद एवं अलगाववाद को प्रमुख मुद्दा बनाया था। किंतु पीडीपी की नीति इन दोनों के प्रति नरम रवैया अपनाने की रही है। 2014 विधानसभा चुनाव के बाद मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आतंकवादियों एवं पाकिस्तान दोनों का यह कहते हुए शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने चुनाव को शांतिपूर्वक संपन्न होने दिया। यह सामान्य बात नहीं थी। चुनाव के हर चरण में आतंकवादियों ने बाधा डालने की कोशिश की। यह बात अलग है कि सुरक्षा बलों की चुस्ती से वे सफल नहीं हो सके। पाकिस्तान के पिट्ठु अलगाववादियों ने भी हर बार की तरह चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया। आतंकवादियों के भय और अलगाववादियों के आह्वान के बावजूद यदि 65 प्रतिशत मतदाता मतदान करने के लिए जान जोखिम में डालकर निकले तो इसका अर्थ था कि वे आतंकवादियों और अलगाववादियों के साथ नहीं हैं। वे प्रदेश में शांति चाहते हैं।

यानी जो पार्टी सत्ता में आती है, उसकी यह जिम्मेदारी थी कि वह हर हाल में प्रदेश को हिंसा और भय से मुक्त करें, अलगाववादियों को कमजोर करें। जो चुनाव परिणाम थे उसमें कोई सरकार बन सकती थी, तो भाजपा एवं पीडीपी की ही। दोनों की जम्मू-कश्मीर संबंधी विचारधारा एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत थी। पर जो जनादेश था उसमें उनको पास आना पड़ा। हालांकि सरकार गठन में ढाई महीने से ज्यादा का समय लगा। किंतु पीडीपी के नेतृत्व के कारण यह सरकार मुख्य जिम्मेदारी को प्राथमिकता में लेकर काम करने पर फोकस नहीं कर सकी। चाहे वह मुफ्ती सईद हों या महबूबा मुफ्ती। भाजपा ने चुनाव में जम्मू और लद्दाख की अब तक हुई अनदेखी का भी मुद्दा उठाया था। सरकार में भाजपा शामिल थी, तो इन दोनों क्षेत्रों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए था। यह भी पूरी तरह नहीं हो पा रहा था। भाजपा चाहती थी कि आतंकवादियों एवं अलगाववादियों के साथ कड़ाई से पेश आया जाए जबकि दोनों पिता पुत्री इनके साथ नरम व्यवहार के पक्षधर थे। केन्द्र सरकार ने सेना एवं अर्धसैनिक बलों को खुली छूट देने का कदम उठाया, तो पीडीपी ने वहां इनके मार्ग में रोड़े अटकाने की कोशिश की। सेना प्रमुख ने पत्थरबाजों के खिलाफ बयान दिया। महबूबा को यह नागवार गुजरा। केन्द्र की अनुमति से सेना ने आतंकवादियों के विरुद्ध आॅपरेशन आॅल आउट आरंभ किया। यह लगातार सफलता पा रहा था, पर महबूबा को यह स्वीकार नहीं था। 8 जुलाई 2016 को आतंकवादी बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत आतंकवाद विरोधी लड़ाई की बड़ी सफलता थी, लेकिन महबूबा के लिए उसका मारा जाना गलत कदम था। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने उसे आतंकवादी मानने से इन्कार किया। सेना को शाबाशी देने की जगह परोक्ष तौर पर उन्होंने सेना को इसके लिए दोषी ठहराया। यह पूरे देश की सोच के वितरीत मत था।

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि सरकार में साथ होते हुए भी पीडीपी राष्ट्र की भावना तथा जम्मू-कश्मीर से आतंकवाद एवं अलगाववाद के साथ संघर्ष करने की नीति में साथ नहीं थी। जिन लोगों ने करीब तीन साल के सफर पर नजर रखा है, उन्हें पता है कि किस तरह की कशमकश भाजपा नेताओं में रही है। हालांकि गठबंधन में साथ होने के कारण कभी विरोधी बयान नहीं दिया गया, लेकिन अंदर ही अंदर मतभेद साफ थे। इस समय सरकार गिरने का तात्कालिक कारण यही मतभेद बना है। केन्द्र ने महबूबा का आग्रह मानकर रमजान के महीने में सैन्य कार्रवाई को निलंबित करने का फैसला किया। यानी इस दौरान सुरक्षा बल अपनी ओर से कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। इस एक महीने का अनुभव अत्यंत बुरा आया। हालांकि आतंकवादी हमलों का तो सुरक्षा बलों ने जवाब दिया और आतंकवादी मारे भी गए। आतंकवादियों के हमलों से साफ था कि उन्हें स्वयं अपने रमजान की भावना से कोई लेना-देना नहीं था। इसमें एक बड़े पत्रकार की इफ्तार के लिए जाते समय श्रीनगर के बीच चौराहे पर हत्या कर दी गई। महबूबा ने वहां दुख व्यक्त तो किया, लेकिन इतना भी बोलने का साहस नहीं किया कि जो भी इस हत्या में शामिल है, उसे उसके किए की सजा दी जाएगी। उसी दिन अपने घर ईद मनाने जा रहे जम्मू के फौजी औरंगजेब की आतंकवादियों ने अपहरण करके हत्या कर दी, लेकिन मुख्यमंत्री ने कोई कड़ा बयान नहीं दिया। इस तरह से तो कोई शासन नहीं चल सकता। उस पर भी महबूबा का मत था कि सैन्य कार्रवाई का जो निलंबन है जिसे सामान्यत: संघर्ष विराम कहा गया वह जारी रहे। यह विचित्र तर्क था। यानी आतंकवादियों को, पत्थरबाजों को मजहब और आजादी के नाम पर हिंसा का नंगा नाच करने की खुली छूट जारी रहनी चाहिए। इसका समर्थन करना या इसे स्वीकार करना मुश्किल था। यह कश्मीर एवं भारत के लिए घातक होता। केन्द्र के लिए इस पर राजी होना संभव नहीं था। उसके बाद यह स्पष्ट हो गया कि महबूबा इसे मुद्दा बनाकर कुछ समय बाद स्वयं इस्तीफा देंगी। वो अपने समर्थकों से सहानुभूति पाना चाहतीं थीं। वे चाहती थीं कि लंबी पत्रकार वार्ता बुलाकर इस्तीफा का नाटक करें और बताएं कि भाजपा कैसे शांति के पक्ष में नहीं थीं। भाजपा के लिए महबूबा को इसका अवसर देना राजनीतिक रूप से आत्मघात जैसा होता। इसलिए उसने दांव चला और मोदी एवं अमित शाह की जोड़ी फैसला करने में देर लगाती नहीं। 19 जून को कुछ घंटे में सरकार से अलग होने का फैसला हो गया तथा राज्यपाल को पत्र भी सौंप दिया गया।

यह निश्चय ही महबूबा के लिए भी भौचक करने वाला निर्णय था। किसी को भी भाजपा ने इसकी भनक न लगने दी। देश को इसका पता तब चला जब भाजपा महासचिव राम माधव ने पत्रकार वार्ता में इसकी जानकारी दी। महबूबा मुफ्ती को राज्यपाल ने भाजपा के सरकार से अलग होने की सूचना पहले दी। इस तरह देखे तो भाजपा से सरकार का अलग होना बिल्कुल वाजिब मुद्दे पर हुआ है। पूरा देश चाहता है कि कश्मीर में अलगावाद, आतंकवाद एवं पत्थरबाजी के साथ सख्ती से निपटा जाए। हां, जो अपनी भूल स्वीकार कर मुख्यधारा में आना चाहते हैं उनको स्वीकार करने में समस्या नहीं है। आॅपरेशन आॅल आउट में कार्रवाई के साथ आतंकवाद की दिशा में चले गए नौजवानों को वापस बुलाकर उनके परिवार से मिलाने का कार्यक्रम भी शामिल था। ऐसे कई नवजवानों को सेना और पुलिस ने वापस लाकर परिवार को सौंपा भी है। किंतु जो युद्ध करने की उन्माद से ग्रस्त होकर आया है, उसका उपचार तो मुठभेड़ ही हो सकता है। कश्मीर के बारे में यह ध्यान रखना जरूरी है।

महबूबा का एकपक्षीय दृष्टिकोण

सच कहा जाए तो महबूबा ने अपनी नीतियों से भाजपा को राजनीतिक रूप से भी खत्म करने की स्थिति में लाने की कोशिश की। उदाहरण के लिए कठुआ में एक अवयस्क बालिका के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले को जिस तरह उन्होंने कश्मीर की अपराध शाखा से जांच करवाकर मजहबी रंग दे दिया, उसका पूरे जम्मू में गलत संदेश गया। भाजपा के दो मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफा दे दिया। कारण, पूरे जम्मू में यह संदेश गया कि अपराध शाखा जानबूझकर मंदिर में घटना को घटित होना साबित करके हमें बदनाम कर रही है, गलत तरीके से हिन्दुओं को फंसा रही है…और भाजपा मूक दर्शक बनी हुई है। इस मामले से पूरे जम्मू में आक्रोश पैदा किया। भाजपा के विरुद्ध वातावरण बना। महबूबा ने पत्थरबाजों से मुकदमे वापस ले लिए, आसिया अंद्राबी जैसी पाकिस्तान का झंडा लेकर भारत के खिलाफ आग उगलने वाली को बचाए रखा। लेकिन श्रीअमरनाथ जमीन के लिए संघर्ष करने वाले युवाओं पर से भाजपा की लगातार मांग के बावजूद मुकदमे नहीं हटाए। भाजपा रोहिंग्याओं के खिलाफ थी, महबूबा उनके साथ खड़ी थीं। जम्मू क्षेत्र में गुज्जर बक्करवालों से जमीन खाली करवाने के लिए बड़ा आंदोलन चला, लेकिन महबूबा इसके लिए तैयार नहीं थीं। उन्होंने एक भी आतंकवादी या अलगाववादी या पत्थरबाज के खिलाफ मुकदमे में सक्रियता नहीं दिखाई। लेकिन सेना के जवानों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करवाने में आगे रहीं। यही नहीं केन्द्र ने जितने पैकेज दिए उसमें जम्मू और लद्दाख को जितना हिस्सा विकास में मिलना चाहिए, नहीं मिल पाया।

इस्लामीकरण का खतरनाक पहलू जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद को वैश्विक जेहादी आतंकवाद का भाग बना देता है। जाकिर मूसा ने यही तो कहा कि हम जेहाद कर रहे हैं। हमारा मकसद कश्मीर में इस्लामी राज्य कायम करना है। जो हमारे साथ नहीं है उसका हम अंत करेंगे। ऐसे तत्वों के साथ कोई राज्य अगर नरम व्यवहार करता है, तो उसका अर्थ है कि वह उसके मकसद एवं लड़ाई के साथ है।  

इसमें यदि भाजपा सरकार से अलग होकर राज्यपाल शासन लागू करने एवं सुरक्षा बलों को कार्रवाई के लिए स्वतंत्रता नहीं देती तो न यह कश्मीर के हित में होता न देश के। न स्वयं उसकी राजनीति के लिए ही अनुकूल होता। यह बात ठीक है कि राज्य में चुनाव की प्रक्रिया आरंभ करने को ज्यादा लंबा नहीं खींचना चाहिए। लेकिन भय और आतंक तथा मजहबी उन्माद के प्रभाव को जितना कम कर सकेंगे उतना ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया सामान्य होगी। इसलिए इस समय उस पर फोकस किया जाना जरूरी है। सीमा पर पूरी चौकसी हो रही है, ताकि आतंकवादियों की घुसपैठ को या तो रोक दिया जाए या न्यूनतम कर दिया जाए। अंदर शिकारी की तरह आतंकवादियों का शिकार किया जाए, उनके रास्ते आने वाले पत्थरबाजों को भी कानून के शिकंजे में लाया जाए। अलगाववादियों को जितना कमजोर किया जा सकता है, किया जाए। आतंक एवं अलगाववाद के विरुद्ध ये चार स्तरीय रणनीति जितनी कारगर होगी, जम्मू-कश्मीर और देश का उतना ही भला होगा। महबूबा ने अपने इस्तीफे के बाद पत्रकार वार्ता में कहा कि कश्मीर में बल प्रयोग की नीति नहीं चल सकती। यहां कोई दुश्मन नहीं रहते। वाह! तो क्या आतंकवादियों का फूलमालाओं से स्वागत किया जाए? उन्होंने अपनी सरकार की जो उपलब्धियां बताईं उनमें कहीं भी शांति व्यवस्था कायम करने की कोशिशों की बात नहीं है। वे कह रहीं थी कि भाजपा के साथ रहते हुए हमने 11 हजार पत्थरबाजों से मुकदमे वापस लिए, संघर्ष विराम करवाया, 370 को बचाया, पाकिस्तान के साथ भारत की वार्ता करवाई…। वाह रे सरकार! आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई उनकी सरकार की उपलब्धि नहीं है। अलगाववादियों के विरुद्ध आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में एनआईए की कार्रवाई उनके बयान में कहीं शामिल नहीं है। सीमा पर संघर्ष विराम लगातार तोड़ने वाले पाकिस्तान की आलोचना भी उनकी नजर में आवश्यक नहीं है। इस तरह का विचार रखने वाली नेता और उसकी पार्टी के साथ इतने दिन गठबंधन कायम रह गया, यह कम नहीं है।

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