तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करने दिल्ली आए थे। एक घंटे से अधिक चली इस बैठक में के. चंद्रशेखर राव ने अपने प्रदेश से संबंधित कई परियोजनाओं में केंद्रीय सहायता की मांग रखी। मुख्यमंत्री के अनुसार प्रधानमंत्री ने उनकी मांगों पर बहुत ही सकारात्मक रुख दिखाया। ये वही चंद्रशेखर राव हैं जिन्होंने हाल ही में देश में भाजपा और कांग्रेस विरोधी फेडरल फंट बनाए जाने की पुरजोर वकालत की थी और इस संदर्भ में उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित विरोधी दलों के कई नेताओं से मुलाकात की थी। फेडरल फ्रंट की सोच को आगे लाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ उनकी यह पहली मुलाकात थी।

आगामी लोकसभा चुनाव के बाद यदि भाजपा बहुमत के आंकड़े से दूर रह जाती है तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में भाजपा के नए संभावित सहयोगी कौन-कौन होंगे? इसी संदर्भ में के. चंद्रशेखर राव की नरेन्द्र मोदी से मुलाकात और नवीन पटनायक के प्रधानमंत्री के साथ सहमति व्यक्त करने वाले बयान को देखा जा सकता है।

26 जून को ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ करवाए जाने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सुझाव के साथ अपनी सहमति व्यक्त की। गौरतलब है कि नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल के एक पूर्व सांसद बैजयंत पांडा ने हाल ही में जब इसी तरह का बयान दिया था, तब उसे पार्टी विरोधी घोषित किया गया था। नवीन पटनायक उन नेताओं में से हैं जिन्हें भाजपा विरोधी दल लगातार ही अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा कभी साथ-साथ रहे बीजू जनता दल और भाजपा के बीच के रिश्तों में प्रादेशिक स्तर पर गहरी दरार आ चुकी है और बीजू जनता दल को भाजपा की तरफ से जोरदार टक्कर मिल रही है। ओडिशा की राजनीति में कांग्रेस के पराभव के बाद भाजपा ही बीजू जनता दल की मुख्य विरोधी पार्टी है।

क्या इन दोनों घटनाओं से भविष्य की कोई आहट मिल रही है या फिर ये एक मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री से मिलकर अपने राज्य की बेहतरी से संबंधित मांगें रखने की सामान्य प्रक्रिया थी? इसी तरह नवीन पटनायक का बयान किसी एक मसले पर प्रधानमंत्री से सहमति व्यक्त करना भर था? लोकसभा चुनाव सामने हैं और ऐसे समय में सामान्य राजनीतिक घटनाओं को भी भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं से जोड़कर देखा जाना स्वाभाविक ही है। ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा को अगले लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों की तरफ से जोरदार टक्कर मिल सकती है और ऐसी स्थिति की यह संभावना भी जताई जा रही है कि हो सकता है भाजपा को अपने बूते बहुमत नहीं हासिल हो पाए। ऐसे में जाहिर तौर पर फिर से सरकार बनाने के लिए उसे गठबंधन राजनीति की शरण में जाना पड़ सकता है। इस सच्चाई से हर कोई वाकिफ है कि शिवसेना नेता जितनी भी बयानबाजियां करें लेकिन यह एक राजनीतिक हकीकत है कि शिवसेना को भाजपा के साथ ही रहना होगा। तभी तो 2019 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का राग अलापने के बावजूद शिवसेना केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार में भाजपा की साझीदार बनी हुई है। बिहार में नीतीश कुमार की भी लगभग शिवसेना वाली ही स्थिति है और 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ने पर मिले दो लोकसभा सीट जनता दल-यू की राजनीतिक हैसियत को आईना दिखाने वाले थे। राजनीति में कुुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन अभी तक के जो हालात हैं उनमें स्पष्ट है कि शिवसेना, जनता दल-यू और अकाली दल 2019 के बाद बनने वाली सरकार मेंं भी भाजपा के ही साथ रहेंगे। लेकिन सवाल यह है कि इनकी मौजूदगी के बाद भी अगर बहुमत से दूर रह गए तो क्या होगा? कौन हो सकते हैं सरकार बनाने में भाजपा के संभावित सहयोगी? इसी संदर्भ में के. चंद्रशेखर राव की नरेन्द्र मोदी से मुलाकात और नवीन पटनायक के प्रधानमंत्री के साथ सहमति व्यक्त करने वाले बयान को देखा जा सकता है। यह एक सच्चाई है कि तेलंगाना की राजनीति में के. चंद्रशेखर राव का भाजपा के साथ कोई विशेष विरोध नहीं है। कांग्रेस प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल है और केसीआर कभी नहीं चाहेंगे कि देश में ऐसी कोई सरकार बने जिसमें कांग्रेस की प्रमुख भूमिका हो। उनकी सोच इस बात से भी जाहिर है कि कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर की सरकार बनने के बाद जब देश का संपूर्ण विपक्ष बेंगलूरू पहुंच गया था, तब भी चंद्रशेखर राव उससे दूर ही रहे थे। भाजपा के साथ उनके संबंध कभी भी टकराव वाले तो नहीं ही रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से अनौपचारिक तौर पर यह आरोप लगाया भी जाता रहा है कि केसीआर ने फेडरल फ्रंट का जो प्रस्ताव रखा उसका मुख्य उद्देश्य भाजपा विरोधी विपक्षी एकता की मुहिम को कमजोर करते हुए भाजपा को फायदा पहुंचाना था। इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप तो चलते ही रहते हैं लेकिन यह एक राजनीतिक सच्चाई है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद अगर भाजपा बहुमत के आंकड़े से दूर रह जाती है तो जिस नेता की ओर सबसे पहले नजर जाएगी वो के. चंद्रशेखर राव ही हैं।

लगभग वैसी ही स्थिति नवीन पटनायक की भी है जिनकी पार्टी को प्रादेशिक स्तर पर भले ही भाजपा से मुख्य मुकाबला करना पड़ रहा हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दलों के संबंधों में बहुत कम खटास देखी गई है और सामान्य तौर पर संसद में बीजू जनता दल ने नरेन्द्र मोदी सरकार के साथ सहयोगात्मक रवैया ही बनाए रखा है। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि 2019 में चुनावी गर्मी शांत होने के बाद बीजू जनता दल और भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर पहले की तरह दोस्त बन जाएं। हां, अगर देश में गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी सरकार बनने की संभावना नजर आने लगे तो बात अलग है।

इस संदर्भ में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू का नाम भी जेहन में आता है। हालांकि, हाल ही में बड़ी ही कड़वाहट के साथ तेलुगू देशम भाजपा के नेतृत्व वाले राजग से अलग हुआ है, फिर भी इस बात की संभावना तो बनी ही हुई है कि जरूरत पड़ने पर भाजपा और तेलुगू देशम एक बार फिर से एक-दूसरे का हाथ थाम सकते हैं। चंद्रबाबू नायडू अतीत में कई पलटियां मार चुके हैं। राष्ट्रीय मोर्चा प्रमुख होते हुए भी वे राजग में शामिल हो गए थे और फिर चुनाव के वक्त अलग भी हो गए थे। वैसे क्या होगा यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि 2019 के लोकसभा एवं आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों में तेलुगू देशम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस में से किसका प्रदर्शन बेहतर रहेगा। जिसके पास भी अधिक सांसद होंगे वह आसानी से भाजपा के पाले में आ सकता है। हालांकि, मायावती और भाजपा के बीच पहले कई बार गठजोड़ हो चुके हैं लेकिन अभी की जो स्थिति है और दोनों के बीच इतनी दूरियां कायम हो चुकी हैं कि दोनों के साथ आने की बात दूर की कौड़ी ही लगती है, लेकिन राजनीति में कुछ भी दावा नहीं किया जा सकता। जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में दोस्ती हो सकती है तो फिर वह कोई विश्व का आठवां आश्चर्य नहीं होगा, अगर भविष्य की किसी राजनीतिक जरूरत के मद्देनजर भाजपा और बसपा भी एक-दूसरे के करीब आ जाएं।

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