विश्व भर में भारत की भूमि ही तपोभूमि (तपोवन) के नाम से विख्यात है। यहां अनेक संत, महात्मा और पीर-पैगम्बरों ने जन्म लिया। सभी ने भाईचारे, प्रेम और सद्भावना का संदेश दिया है। इन्हीं संतों में से एक संत कबीर  भी हुए हैं। इनका जन्म संवत्‌ा 1455 की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था। इसीलिए ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन देश भर में कबीर जयंती मनाई जाती है। इस बार 28 जून को कबीर जयंती मनाई गई।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

ये दो पंक्तियां ही कबीर की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सर्वस्वीकार्यता सिद्ध करती है। आज के इस दौर में जब अधिकांश लोग पराये दोष व पराई उपलब्धियों को देख-देखकर मानसिक रूप से रूग्ण हो जाते हैं, तब कबीर की ये पंक्तियां हमें एक नई ताजगी देती है। संत कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरूप अंधकारमय हो रहा था। देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक अवस्थाएं सोचनीय हो गई थीं।  ऐसे समय में संत कबीर का प्राक्ट्य समाज में व्याप्त शोषक व शोषित वर्ग के मध्य के तनाव व दूरियों को दूर करने वाला माध्यम बना। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं की भाषा इतनी सरल और सुबोध रखी, जो आम आदमी के घर कर गई। संत कबीर कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और उसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। लोककल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर दास जी एक सच्चे विश्व-प्रेमी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव और संत प्रवृति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है। कबीर जी संक्षेप में, ऐसा शीघ्र शॉर्टकट रास्ता दिखाते थे, जिसपर साधक सीधा अग्रसर हो सकता है।

कबीर दास के रचना संसार में संवेदना, चेतना व मानवीयता की महीन ग्रंथियों का समावेश सदैव जागृत भाव में उपस्थित रहा है। उनका यह कहना सर्वदा उचित है कि असली मानव-प्रेमी की पहचान यह है कि वह दूसरों के लिए लड़ता है। वह इतना दृढ़ निश्चयी होता है कि बेशक उसके शरीर का पुर्जा-पुर्जा कट जाए, फिर भी सद्कर्म से पीछे नहीं हटता-

सूरा सो पहचानिए जो लड़ै दीन के हेत।

पुरजा-पुरजा कट मरे, कबहूं न छाड़ै खेत।।

कबीर जी कहते हैं जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ पा ही लेते हैं। जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं-

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ।

मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ।।

कबीर को अनपढ़ माना जाता है। लेकिन, वे सर्वधर्म, शास्त्रों के ज्ञाता थे। मसि कागज छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ, के उनके कथन से अनुमान लगाया जाता है कि उन्होंने किसी रचना का स्वलेखन नहीं किया था। उनकी वाणी को उनके शिष्यों ने लिपिबद्ध किया था। कबीर ने मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा की। उन्होंने धैर्य, सहिष्णुता, कर्मयोग, गुरु का सम्मान, प्रेम, मानवता, आत्मा की पवित्रता, दीन-दुखियों की सेवा, नैतिकता के पालन को मानवीय कर्तव्य माना। कबीर ने ‘माली सींचे सौ घड़ा’ के माध्यम से धैर्य के साथ कर्म को महत्त्व दिया। उन्होंने ‘भृगु मारी लात’ द्वारा क्षमा के महत्त्व तथा ‘माटी कहे कुम्हार से’ द्वारा सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया। कबीर सच्चे अर्थों में कर्मयोगी थे। उन्होंने समाज को सचेत किया कि निर्बल को मत सताओ, नहीं तो उसकी हाय से सब कुछ नष्ट हो जायेगा।

निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय।  

मुई खाल की श्वांस सौं लौह भसम हो जाय ।।

आज 21वीं सदी के विश्व में भारत जहां अपनी पहचान स्थापित करना चाहता है। वहां नक्सलवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, सम्प्रदायवाद जैसी समस्याएं है। इस दौर में एक ‘समग्र भारतीय व्यक्तित्व’ के रूप में कबीर हमारे व्योम में जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं। ऐसे संत-महापुरुषों के आदर्शों व उपदेशों को जन-जन तक पहुंचाने व जीवन मूल्यों के निर्माण के उद्देश्य को लेकर प्रदेश सरकार ने कबीर जयंती के मौके पर जिलास्तरीय समारोह आयोजित किया। ताकि आम जनमानस भी कबीर के जीवन से प्रेरणा ले सकें।

लेखक हरियाणा के मुख्यमंत्री हैं।

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