पुरी के सागर तट पर निकलने वाली जगन्नाथ रथयात्रा के समय आस्था का जो विराट वैभव देखने को मिलता है, वह और कहीं दुर्लभ है। इसीलिए यह दस दिवसीय महामहोत्सव न केवल भारत अपितु विदेशों से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को पुरी से शुरू होने वाली जगतपालक की यह लोकयात्रा केवल दक्षिण भारत ही नहीं वरन देशभर के सबसे बड़े धार्मिक उत्सवों में से एक है जिसमें प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पूरी आस्था से शिरकत करते हैं। इस वर्ष इस पावन यात्रा का शुभारम्भ 14 जुलाई को हो रहा है।

रथयात्रा वस्तुत: एक सामुदायिक पर्व है। यहां किसी प्रकार का जातिभेद नहीं है। जगन्नाथ को चढ़ाया हुआ चावल कभी अशुद्ध नहीं होता, इसे ‘महाप्रसाद’ की संज्ञा दी गयी है।

यह एक ऐसा पर्व है जब जगन्नाथ जी चलकर खुद जनता के बीच आते हैं और दसों अवतारों का रूप धारण कर सभी भक्तों को को दर्शन देते हैं। रथयात्रा महोत्सव के दौरान भक्तगण जब इन रथों को खींचते हैं तो एक अलग ही समां बंध जाती है। भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी के 800 वर्ष पुराने जगन्नाथ मंदिर में श्री भगवान, उनके भाई बलराम व बहन सुभद्रा के काष्ठ निर्मित अधूरे विग्रह प्रतिष्ठित हैं, जिनके भव्य दर्शन करने का सौभाग्य आम जनमानस को इस रथयात्रा के दौरान मिलता है। भव्य रथ घुमावदार मार्ग पर आगे बढ़ते हैं तथा गुण्डीच मन्दिर में सात दिन तक रुकते हैं। आषाढ़ की दसवीं तिथि को रथों की मुख्य मन्दिर की ओर पुर्नयात्रा प्रारम्भ होती है। इसे ‘बहुदा यात्रा’ कहते हैं। सभी रथों को मन्दिर के ठीक सामने लाया जाता है, परन्तु प्रतिमाएं अभी एक दिन तक रथ में ही रहती हैं। अगले दिन एकादशी को मन्दिर के द्वार देवी-देवताओं के लिए खोल दिए जाते हैं, तब इनका श्रृंगार विभिन्न आभूषणों से किया जाता है। इस धार्मिक कार्य को ‘सुनबेसा’ कहा जाता है।  

महायात्रा का तत्वदर्शन

इस महायात्रा का तत्वदर्शन बहुत गहरा है। इस रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होता है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। यह यात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत कर आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। नीलांचल धाम, श्री क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र व शंख क्षेत्र के नाम से विख्यात जगन्नाथपुरी के बारे में स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति रथयात्रा में जगन्नाथ जी का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा तक जाता है वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि चार धामों की यात्रा करने वाले श्रद्धालु पहले बद्री नारायण, फिर द्वारका उसके बाद पुरुषोत्तम धाम जगन्नाथ पुरी व अंत में रामेश्वरम जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि जगन्नाथ जी बद्रीनाथ में स्नान करते हैं, द्वारका में श्रृंगार, जगन्नाथ पुरी में आहार के बाद रामेश्वरम में शयन करते हैं।

महोत्सव की तैयारियां

इस दस दिवसीय रथयात्रा महोत्सव की तैयारियां अक्षय तृतीया के दिन से श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ प्रारम्भ हो जाती हैं। इस निर्माण कार्य से पूर्व कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण ‘दारु’ वृक्ष की लकड़ियों से होता है। इसमें कोई भी कील या कांटा, किसी भी धातु का नहीं लगाया जाता। रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से ‘वनजगा’ महोत्सव से प्रारम्भ होता है तथा लकड़ियां चुनने का कार्य इसके पूर्व बसन्त पंचमी से शुरू हो जाता है। रथ निर्माण का कार्य 58 दिनों तक चलता है। इन रथों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी से परंपरागत कारीगर ही बनाते आ रहे हैं। समारोह के लिए 45, 44 व 43 फीट ऊंचे तीन रथ तैयार किये जाते हैं। जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’ 16 पहियों का, बलभद्र जी का रथ ‘तालध्वज’14 पहियों का और सुभद्रा का रथ ‘देवदलन’ 12 पहियों का बनता है। रथों को सजाने के लिए लगभग 1090 मीटर कपड़ा लगता है। रथयात्रा वस्तुत: एक सामुदायिक पर्व है। यहां किसी प्रकार का जातिभेद नहीं है। जगन्नाथ को चढ़ाया हुआ चावल कभी अशुद्ध नहीं होता, इसे ‘महाप्रसाद’ की संज्ञा दी गयी है।  

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