जैसे-जैसे समय बीत रहा है कि पाकिस्तान की जम्हूरियत (लोकतंत्र) की परीक्षा की घड़ी की सुईयां तेज आवाज के साथ घूमती-अटकती नजर आ रही हैं। हालांकि पाकिस्तान के लोगों में यह उम्मीद तो जरूर होगी कि उनके देश में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे पूरी तरह से संशयमुक्त हों। शायद वे अब पाकिस्तान की सेना, खुफिया एजेंसी आईएसआई और न्यायपालिका की गतिविधियों को देखते हुए इत्मीनान नहीं कर पा रहे होंगे। वास्तव में इस समय पाकिस्तान के जो हालात हैं, उनमें ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी आर्मी व आईएसआई ‘गेम प्लान’ कर रही है। न्यायपालिका भी अब उनके प्लान का हिस्सा बनती दिख रही है। कारण यह कि एक याचिका के आधार पर लाहौर हाईकोर्ट ने नवाज शरीफ के साथ-साथ शाहिद खाकान अब्बासी और इंटरव्यू लेने वाले डॉन के पत्रकार सिरिल अल्मीडा के खिलाफ नोटिस जारी कर जवाब देने के लिए कहा है। इसमें उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने का निर्देश दिये जाना का आग्रह किया गया है। सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में नवाज शरीफ ने ऐसा कुछ कहा था कि उन पर देशद्रोह का वाद लगाया जा सके। या फिर उनके बयान से सेना और आईएसआई की पोल खुलती हुयी नजर आयी थी। इसलिए अब वे नवाज को जेल का रास्ता दिखाना चाहती हैं जिसमें न्यायपालिका उनका साथ दे सकती है?

नवाज शरीफ का ‘द डॉन’ को दिए गये साक्षात्कार के दौरान यह कबूल कर लेना कि मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ था, पाकिस्तानी सियासत की दिशा मोड़ रहा है। इस बीच सवाल यह है कि इससे भारत और खुद नवाज शरीफ को क्या लाभ-हानि होने जा रहा है।

पाकिस्तान में सेना और आईएसआई, जिनके संयुक्त अनाधिकृत ढांचे के लिए ‘डीप स्टेट’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। दरअसल, ये नवाज या उनकी पार्टी को दोबारा सत्ता में नहीं देखना चाहतीं। इसलिए वह अपने प्यादे तलाश रही हैं। इमरान खान जैसे कच्चे-पक्के खिलाड़ी इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि वे ही असली सिपहसालार (सही अर्थों में प्यादे) हैं। ऐसे में नवाज शरीफ का ‘द डॉन’को दिए गये साक्षात्कार के दौरान यह कबूल कर लेना कि मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ था, पाकिस्तानी सियासत की दिशा मोड़ देता है। लेकिन अभी इस बयान के संबंध में यह विचार करने की जरूरत है कि नवाज शरीफ ने यह पत्ता फेंका क्यों? क्या नवाज सेना-आईएसआई-कट्टरपंथ की तिकड़ी को दुनिया के सामने लाने की चाल चलकर अपने ऊपर निरन्तर पड़ रहे दबावों को कमजोर करना चाहते हैं। या फिर वजह कोई और है? दरअसल, 12 मई को पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मुल्तान रैली से पहले अपने और अपने परिवार के खिलाफ एकाउंटबिलिटी प्रक्रिया का संदर्भ रखते हुए पाकिस्तानी अखबार ‘द डॉन’ को एक साक्षात्कार दिया था। इस साक्षात्कार में उन्होंने यह स्वीकार किया था कि 26/11 की घटना में पाकिस्तान का हाथ था।

नवाज शरीफ ने साक्षात्कार के दौरान सबसे पहले यह बात रखी कि यदि आपके देश में दो या तीन समानांतर सरकारें हैं, तो आप देश नहीं चला सकते। केवल एक ही सरकार हो सकती है, मात्र संवैधानिक। उन्होंने इसी साक्षात्कार के दौरान कहा कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि उन्हें उससे बेदखल किया गया। उन्हें बेदखल किसने किया? उनका इशारा था कि किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा नहीं या जनता ने उन्हें बेदखल नहीं किया। ऐसा कहते समय उनका इशारा सेना (शायद न्यायपालिका भी) की तरफ था। उनका कहना था कि कई बार समझौते करने के बाद भी मेरे विचारों को स्वीकार ही नहीं किया गया। वे कह रहे थे अफगानिस्तान के नैरेटिव को मान लिया जाता है, लेकिन हमारे नहीं। नवाज शरीफ ने इस बात को पूरी तरह से नकार दिया कि नाकाम रहने के चलते उन्हें पद से जाना पड़ा। उनका कहना था कि देश में संविधान सबसे ऊपर है। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। हमने एक तानाशाह (परवेज मुशर्रफ) पर केस चला दिया। ऐसा पाकिस्तान में पहले कभी नहीं देखा गया था। इस साक्षात्कार के दौरान ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। आप उन्हें नॉन-स्टेट एक्टर्स कह सकते हैं। उनका कहना था कि उन्हें (नॉन स्टेट एक्टर्स को) सीमा पार जाने और मुंबई के 150 लोगों की हत्या करने की छूट क्यों दी जानी चाहिए थी? मुझे स्पष्ट करें। रावलपिंडी के एंटी टेररिज्म कोर्ट में मुंबई हमले से जुड़े मुकदमे के लम्बित होने का संदर्भ देते हुए उनका कहना था कि अभी तक ट्रॉयल पूरा क्यों नहीं किया जा सका? उन्होंने बात को यहीं पर समाप्त नहीं किया, बल्कि यह भी कहा कि हम तो पूरा केस भी नहीं चलने देते।

नवाज शरीफ की इस स्वीकारोक्ति से भारत को कोई बड़ा फायदा होने वाला नहीं है क्योंकि अब नवाज शरीफ स्वयं स्टैब्लिसमेंट से बाहर और कुछ हद तक उसके खिलाफ हैं। दूसरी बात यह कि इस सच को दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आतंकवाद की नाभि है। लेकिन इसके बाद भी दुनिया का नजरिया नहीं बदला। अब क्या इसके बाद चीन पाकिस्तान के आतंकी सरगनाओं को लेकर नजरिया बदलेगा? क्या सऊदी अरब, रूस व अमेरिका आदि सभी देश अब उसके खिलाफ खड़े हो जाएंगे अथवा पाकिस्तान का एंटी टेररिज्म कोर्ट दबाव में आकर ट्रायल पूरा कर आतंकियों को सजा सुना देगा? स्पष्टतया नहीं। हां नवाज शरीफ ने इसके जरिए एक खेल अवश्य खेल दिया है। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने एकाउंटबिलिटी मामले में न्यायिक प्रक्रिया से परे जाकर सजा सुनाई क्योंकि सुनवाई पूर्ण होने से पहले सजा सुनाना प्राकृतिक न्याय की श्रेणी में नहीं आता। दूसरी बात यह कि पार्टी अध्यक्ष का पद कौन सा संवैधानिक पद था जिससे भी उन्हें बेदखल किया गया। ध्यान रहे कि नवाज शरीफ सेना को वैसे भी बहुत ज्यादा पसंद नहीं थे। मुशर्रफ रेजीम के अफसर उन्हें हजम नहीं कर पा रहे थे। दूसरे वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओथ डिप्लोमैसी का हिस्सा बने, उन्होंने उफा में आतंकियों के वॉयस सैम्पल देने की हामी भरी, वे कुछ हद तक भारत के साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहें …आदि। जो बात सेना को सबसे ज्यादा अखरी, वह थी सर्जिकल स्ट्राइक और उसका प्रचारवादी पक्ष। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई इसके लिए नवाज शरीफ को दोषी ठहराने में जुट गयी। यहीं से नवाज शरीफ का काउंट डाउन शुरू हो गया। इसके लिए गेम प्लान किया गया सेना द्वारा, मोहरे बने इमरान खान व अन्य और रेफरी का काम किया कोर्ट ने जिसका झुकाव सेना की तरफ था।  

एक बात और नवाज शरीफ ने आतंकवाद के मामले पर अपना बयान देकर सही अर्थों में किसे कठघरे में खड़ा किया? स्वाभाविक रूप से सेना और आईएसआई को। इमरान खान और उनकी पार्टी भी इस दायरे में आ गयी जो शुरू से ही जमात-उद-दावा सहित कई कट्टरपंथी संगठनों का सिजदा कर रही है। शायद नवाज शरीफ को लग रहा हो कि इसके बाद अमेरिकी प्रशासन उनके प्रति एक सॉफ्ट और प्रोटेक्टिव कॉर्नर निर्मित करे। यह भी हो सकता है कि चीन भी उनका साथ दे, क्योंकि वे जिन अधिसंरचनात्मक परियोजनाओं की सफलता की ओर इशारा कर रहे थे, वे चीन द्वारा चलायी जा रही हैं। यदि ऐसा हुआ तो नवाज शरीफ सेना से सौदेबाजी करने की स्थिति में आ जाएंगे जिसका लाभ उन्हें आम चुनाव में मिल सकता है।

कुल मिलाकर नवाज शरीफ का साक्षात्कार के दौरान दिया गया बयान राजनीतिक था, लेकिन उसमें सच्चाई भी थी। नवाज शरीफ का बयान यह बताता है कि 26/11 के मामले में ट्रायल आज तक पूरा नहीं हुआ, जबकि उनके मामले में ट्रॉयल पूरा होने से पहले ही फैसला सुना दिया गया। आखिर क्यों? सच तो यह है कि इससे उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। पहला डीप स्टेट (यानी सेना और आईएसआई) और उनके प्रशस्तिकरों के खिलाफ साधा है। दूसरा निशाना अपने सुरक्षा कवच के लिए है जिसमें वे दुनिया को यह बताकर वैश्विक समर्थन हासिल करने के लिए यह बताना चाहते थे कि वे पाकिस्तान में बढ़ती आंतकी सक्रियता से बेहद चिंतित हैं। फिलहाल तो पाकिस्तान की सेना की सेहत पर इससे कोई असर पड़ने वाला नहीं है, लेकिन नवाज शरीफ भी टेस्ट ट्यूब बेबी आॅफ जिया-उल-हक हैं, इसलिए सियासी पैंतरों के साथ-साथ पाकिस्तानी स्टैब्लिसमेंट की संरचनात्मक कमजोरी को समझते हैं। अब देखना यह है कि पाकिस्तानी सेना न्यायपालिका के जरिए नवाज को समाप्त करती है या नवाज पाकिस्तान में बड़े राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में उभरते हैं। जो हो मामला दिलचस्प लेकिन पेचीदा है। देखते हैं कि सेना और इमरान खान के बीच हुयी मैच फिक्सिंग को बेपर्दा करने में वे सफल हो पाएंगे या नहीं और न्यायपालिका अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाएगी या फिर सेना के दबाव वाले रेफरी की?  

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