पिछले सात दशक से अपनी रक्षा चुनौतियों को हम कितनी अगंभीरता से ले रहे हैं, इसका सबूत सभी तरह की रक्षा सामग्री के लिए हमारा विदेशों पर निर्भर रहना है। अभी हमने एक नौ सदस्यीय टीम विदेश यात्रा पर यह देखने के लिए भेजी है कि हम अपने सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए असॉल्ट राइफल और आमने-सामने की लड़ाई के लिए इस्तेमाल होने वाली कारबाइन कहां से खरीद सकते हैं। हमारी सेना इसकी मांग कुछ समय पहले से कर रही है। अभी अपने पड़ोसी पाकिस्तान और चीन की निरंतर बनी हुई रक्षा चुनौतियों को देखते हुए 72,400 एसॉल्ट राइफल और 93,895 सीक्यूबी कारबाइन त्वरित आधार पर खरीदने का निर्णय किया गया है। आमतौर पर रक्षा सामान की खरीद की प्रक्रिया में काफी समय लगता है। असॉल्ट राइफल और कारबाइन की जरूरत देखते हुए यह लंबी प्रक्रिया छोड़कर त्वरित आधार पर इन्हें खरीदने का फैसला हुआ। यह टीम अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात जाएगी और देखेगी कि हम कहां से उचित दाम पर और कम से कम समय पर इन्हें खरीद सकते हैं। यह टीम जिन राइफलों और कारबाइनों को सेना की आवश्यकता को देखते हुए ठीक समझेगी, उन्हें शेष परीक्षणों के लिए भारत लाएगी। सेना द्वारा हरी झंडी दिखाए जाने पर उनसे मोलभाव होगा और खरीदने का आॅर्डर दिया जाएगा। क्या यह विचित्र नहीं लगता कि भारत जैसे देश को इतनी बुनियादी रक्षा सामग्री के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़े। हमें इस बात की गहरी और निर्मम समीक्षा करनी चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। स्वतंत्र होते ही हमने इस बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया कि भारत जैसे विशाल और महान देश को रक्षा सामग्री के मामले में न केवल आत्मनिर्भर होना चाहिए, बल्कि अद्यतन और उन्नत हथियारों के उत्पादन में अग्रणी होना चाहिए।

क्या यह विचित्र नहीं हेै कि भारत जैसे विशाल देश को बुनियादी रक्षा सामग्री के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़े। भारत जैसे देश को रक्षा सामग्री के मामले में न केवल आत्मनिर्भर होना चाहिए, बल्कि अद्यतन और उन्नत हथियारों के उत्पादन में अग्रणी होना चाहिए।

आज भारत हथियारों के मामले में विश्व का सबसे बड़ा खरीदार है। अपने लोगों की मेहनत और कौशल से हमें जो विदेशी मुद्रा मिलती है, उसका एक बड़ा हिस्सा हमें हथियारों की खरीद पर खर्च करना होता है। रक्षा उद्योग के मामले में अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है। हथियारों के विश्व बाजार पर उसका और रूस का एकाधिकार जैसा है। हथियारों के विश्व बाजार में अमेरिका का भाग 35 प्रतिशत है और रूस का 25 प्रतिशत। इसलिए हमारी टीम हथियारों की खरीद के लिए इनमें से किसी देश जाए तो समझा जा सकता है। दो महायुद्धों ने इन दोनों देशों के रक्षा उद्योग को खड़ा होने का अवसर दे दिया था और एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धा में वे अपने हथियारों को अधिक से अधिक उन्नत करने में लगे रहे हैं। लेकिन हमारी टीम अन्य जिन देशों में जा रही है, वे हमारे गंतव्य क्यों हुए? इजराइल छोटा-सा देश है। उसकी सुरक्षा की स्थिति बहुत कठिन है। जिस तरह से अरब उससे दुश्मनी साधे रहे हैं, उसके लिए अपना रक्षा उद्योग खड़ा करना आवश्यक था। लेकिन हमारी रक्षा चुनौती भी कोई कम नहीं है। फिर छोटा-सा देश इजराइल उन्नत हथियार बना सकता है, हम नहीं, ऐसा क्यों है? दक्षिण कोरिया को भी उत्तर कोरिया से युद्ध लड़ना पड़ा। इसलिए उसे भी अपना रक्षा उद्योग खड़ा करने की आवश्यकता दिखाई दे गई। आॅस्ट्रेलिया की रक्षा चुनौती कभी वैसी नहीं रही, फिर भी वह हमारी टीम का गंतव्य बनने में समर्थ हो गया। संयुक्त अरब अमीरात तो एक बाजार की तरह है। इसलिए उससे तुलना की आवश्यकता नहीं है। क्या ऐसा है कि हमारे अब तक के नेता देश की रक्षा चुनौतियों को लेकर गंभीर नहीं थे? अगर ऐसा है तो यह बहुत चिंता की बात है।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने रक्षा उद्योग खड़ा करके देश को हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया था। अभी तक मोदी सरकार को उस दिशा में कोई विशेष सफलता नहीं मिली। हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि जिन भी देशों को अपने यहां रक्षा उद्योग खड़ा करने में सफलता मिली है, उन्होंने यह सफलता कैसे हासिल की? हम सब जानते हैं कि अमेरिका को इसका सबसे पहले अहसास हो गया था कि यूरोपीय शक्तियां परस्पर स्पर्धा करते हुए आपस में लड़ेगी। 1900 के आसपास लड़ाई की कल्पना करते हुए जितना लोकप्रिय साहित्य अमेरिका में लिखा गया और कहीं नहीं लिखा गया। यूरोप की वैज्ञानिक उपलब्धियों को तकनीक में बदलने का काम भी वहीं हुआ। पहले और दूसरे महायुद्ध के अधिकांश शस्त्र अमेरिका से ही खरीदे गए थे। रूस तक ने माना कि अमेरिका से हथियारों की पूर्ति न हुई होती तो मित्र देश जीत नहीं सकते थे। अमेरिकी कंपनियां मुनाफा कमाने के लिए हथियार बना रही थीं। लेकिन रूस को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। उसने अपने राज्यतंत्र और वैज्ञानिकों में देशभक्ति की भावना पैदा की और अमेरिका से बराबरी का संकल्प जगाया। इसी कारण कम साधनों के बावजूद रूस अपना रक्षा उद्योग खड़ा करने में सफल हो गया। अमेरिका उन्नत हथियारों के विकास में अग्रणी अवश्य है, लेकिन रूस भी बहुत पीछे नहीं है। शेष दुनिया में रक्षा उद्योग खड़ा करने में इन दोनों देशों की भूमिका रही है। इजराइल से लेकर दक्षिण कोरिया तक हथियार बनाने के कारखाने अमेरिकी कंपनियों या तकनीक का सहारा लेकर ही खड़े किए गए हैं। चीन को आरंभ में रूस से मदद मिली, उसके बाद उसने भी चीनी युवकों और वैज्ञानिकों में राष्ट्रीय भावना जगाकर अपना रक्षा उद्योग खड़ा कर लिया। 1970 के बाद उसके अमेरिका से भी संबंध सुधरे और अमेरिकी तकनीक की नकल में उसने अपने आपको सिद्धहस्त कर लिया।

भारत भी इस दूसरे तरीके से ही अपना रक्षा उद्योग खड़ा कर सकता है। भारत के पास संसार की दूसरी सबसे बड़ी सेना है और उसकी अपनी आवश्यकताएं कम नहीं हैं। भारत हर वर्ष औसतन 3.6 अरब डॉलर के हथियार खरीदता है। पाकिस्तान और चीन मिलाकर भी इतने हथियार नहीं खरीदते। चीन इसलिए कि वह अपना रक्षा उद्योग विकसित करने में सफल हो गया है। भारत को हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर एक सुस्त सरकारी उद्योग तंत्र खड़ा किया गया। भारत में चार सरकारी रक्षा उद्योग हैं, 41 आॅर्डिनेंस फैक्टरी है और 49 डीआरडीओ अर्थात रक्षा संबंधी शोध और विकास के संस्थान हैं। लेकिन अब तक उनका कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं है। केंद्र सरकार अब उनसे नाराज होकर निजी उद्योगों के सहयोग से रक्षा उद्योग विकसित करने की कोशिश कर रही है, पर उसकी अपनी समस्याएं हैं। आमतौर पर वही देश इस दिशा में सफल हो पाते हैं, जो अपने यहां बनाए जा रहे हथियारों को निर्यात करने में सफल हो जाते हैं। भारत दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और मध्य एशिया को अपने यहां पैदा होने वाले हथियारों के बाजार के रूप में विकसित कर सकता है। लेकिन उसके लिए लंबी तैयारी चाहिए। अभी हम विश्व की कुछ बड़ी कंपनियों को अपना कुछ उत्पादन भारत में करने के लिए तैयार कर रहे हैं। इसमें कुछ सफलता भी मिली है। क्योंकि भारत में उत्पादन की लागत कम आती है और भारत के पास तकनीकी कुशलता वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। लेकिन यह प्रयास नींव तैयार करने जैसा ही है। अंतत: हमें अपने उद्योग तंत्र को ही इस काम में लगाना होगा। लेकिन रक्षा उद्योग अन्य उद्योगों से अलग तरह का उद्योग है। उसके लिए पहले ऐसा सक्षम तंत्र खड़ा करना पड़ता है, जो अद्यतन तकनीक में अपनी प्रवीणता सिद्ध करे और फिर आज के हथियारों की अगली पीढ़ी का विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है।

भारत में वैज्ञानिक और प्रोद्यौगिकीय प्रतिभा की कमी नहीं रही है। यह दो क्षेत्रों में हमारी उल्लेखनीय सफलता से समझा जा सकता है। सीमित साधनों के बावजूद हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत को उन्नत देशों की श्रेणी में रखे हुए है। बहुत कम लागत पर हम अपने उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने में सफल रहे हैं। इसी तरह हमारा मिसाइल कार्यक्रम हमें संसार की अग्रणी शक्तियों में बनाए हुए हैं। कुछ ही दिनों में हम अग्नि-5 को अपने रक्षा तंत्र में शामिल करने वाले हैं। यह दोनों कार्यक्रम हमारे कुछ अत्यंत कुशल वैज्ञानिकों की प्रतिभा और दूरदर्शिता के कारण सफल हो पाए। ऐसा अन्य क्षेत्रों में क्यों नहीं हो पाया? इसके कारण राजनैतिक अधिक है। अब तक की कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारों में संकल्प की कमी थी। हमारे आरंभिक नेताओं की अदूरदर्शिता और अविवेकपूर्ण आदर्शवाद का भी इसमें कुछ योगदान रहा है। मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) वी.के. पलित ने काफी समय पहले टाइम्स आॅफ इंडिया में जवाहर लाल नेहरू से भेंट का अपने एक लेख में उल्लेख किया था। वे नेहरू से यह आग्रह लेकर मिले थे कि स्वतंत्र भारत को जो सेना मिली, वह अंग्रेजों ने अपने उद्देश्य के लिए बनाई थी। उसका भारतीयकरण किया जाना चाहिए। नेहरू ने जो उत्तर दिया, उसकी किसी प्रधानमंत्री से कल्पना तक नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि हमें सेना क्यों चाहिए? हम शांतिवादी देश हैं। इस विवेकहीन शांतिवादिता के फेर में नेहरू ने तिब्बत चीन को हड़पने दिया और 40 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान को। आज यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती हैं। 1962 में चीन के हाथ हमारी पराजय भी नेहरू की अदूरदर्शिता का परिणाम थी। साधनों के मामले में हमारी सेना को सदा पिछड़ा रखा गया, जबकि शौर्य के मामले में वह संसार की अग्रणी सेना है। रक्षा उद्योग के क्षेत्र में सफलता के लिए अब हमें अपने पूरे तंत्र में देश की रक्षा चुनौतियों का अहसास और देश के प्रति दायित्व की भावना जगानी होगी। वरना मोदी सरकार की यह कोशिश भी ढाक के तीन पात की तरह होकर रह जाएगी।

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