देश के सबसे बड़े कर सुधार गुड्स ऐंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) ने पहला साल पूरा कर लिया है। भारत सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देख रही है। भारत जैसे विशाल देश में एक नई टैक्स प्रणाली की शुरुआत करना और उसे एक साल की अवधि में ही सफलतापूर्वक क्रियान्वित कर लेना एक बड़ी कामयाबी ही है। सरकार इसे आजादी के बाद के सबसे बड़े टैक्स सुधार की संज्ञा दे रही है, तो इसे भी पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।

जीएसटी लागू हुए एक साल हो गया है। तमाम आलोचनाओं के बावजूद न केवल टैक्स कलेक्शन बढ़ा है, बल्कि टैक्सपेयर्स की संख्या भी बढ़ी है। इसके बावजूद इसमें अभी कई सुधार जरूरी हैं।

यह ठीक है कि जब जुलाई 2017 में जीएसटी को लागू किया गया था, तो शुरुआती दौर में नयी व्यवस्था होने और तकनीकी दिक्कतों की वजह से व्यापारियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और टैक्स का काम करने वाले अन्य लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। लेकिन जैसे-जैसे परेशानियां सामने आती गयीं, वैसे-वैसे उनका निपटारा भी होता गया। इन समस्याओं के कारण कारोबारियों में काफी नाराजगी थी और उनकी नाराजगी का राजनीतिक फायदा उठाने की भी लगातार कोशिश की गयी। गुजरात विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कारोबारियों की सहानुभूति हासिल करने के लिए जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स की संज्ञा देते हुए इसकी खुलकर आलोचना की थी।

आर्थिक विश्लेषक सुंदर वत्स का कहना है कि जीएसटी की आलोचनाओं और कारोबारियों की नाराजगी को केंद्र सरकार ने एक चुनौती के रूप में लिया, जिसके कारण एक साल में ही इसके प्रावधानों की जटिलता को दूर करने में काफी हद तक कामयाबी भी मिली। हालांकि कुछ समस्याएं अभी भी शेष हैं, लेकिन सरकार उन्हें भी दूर करने की कोशिश में लगी हुई है। अगर जीएसटी की कामयाबी की बात अगर करें, तो चालू वित्त वर्ष 2018-19 में भारत सरकार के कुल कर संग्रह में लगभग चार लाख करोड़ रुपये तक की बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है। सच्चाई तो यह है कि सरकारी खजाने को भरने के लिए सरकार ने अभी तक जितने भी कदम उठाये हैं, उनमें जीएसटी सबसे अधिक सफल होता हुआ नजर आ रहा है।

अगले एक साल में जीएसटी के पूरी तरह से सेटल हो जाने की उम्मीद की जा रही है। जिसके बाद टैक्स कलेक्शन में और भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसमें कोई शक नहीं है कि पहला साल कारोबारियों के लिए परेशानियों का साल रहा, क्योंकि जीएसटी अभी भी पूरी तरह से स्थिर टैक्स प्रणाली नहीं बनी है। एक साल में जीएसटी प्रणाली से जुड़ी लगभग 100 अधिसूचना जारी की गयीं। इस वजह से उपभोक्ता और व्यापारी निश्चिंत होकर काम नहीं कर सके। जरूरत इस प्रणाली में स्थिरता लाने की है, ताकि उपभोक्ता और कारोबारी दोनों निश्चिंत होकर काम कर सकें।

हालांकि टैक्स कंसल्टेंट लक्ष्मी रतन गोस्वामी का कहना है कि जीएसटी कि मौजूदा स्थिति से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है। जीएसटी लागू करते वक्त कहा गया था कि टैक्स स्लैब कम रखे जायेंगे। लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स स्लैब भारत में ही है। भारत में 0, 3, 5, 12, 18 और 28 फीसदी के कुल छह टैक्स स्लैब बनाये गये हैं। इसी तरह कहा गया था कि जीएसटी के बाद सिर्फ एक टैक्स की व्यवस्था होगी, लेकिन आज भी राज्यों में पेट्रोल, डीजल, प्राकृतिक गैस, शराब, एटीएफ जैसी चीजों पर अलग-अलग टैक्स वसूला जाता है। स्टांप शुल्क की दरें भी हर राज्य में अलग-अलग हैं। सेस को समाप्त करने की बात भी कही गयी थी, लेकिन महंगी कारों, गुटखा, सिगरेट जैसी चीजों पर अभी भी सेस लागू है। सरकार का दावा जीएसटी का नेटवर्क सरल बनाने का भी था, परंतु अभी भी ये सरलता के साथ काम नहीं कर रहा है। रिटर्न भरने की अंतिम तिथि में जब ज्यादा लोड पड़ता है, तो कई बार नेटवर्क क्रैश हो जाता है और रिटर्न भरने की आखिरी तारीख बढ़ानी पड़ती है।

गोस्वामी का कहना है कि जीएसटी लागू करने के पहले जितना होमवर्क किया जाना चाहिए था, उतना काम नहीं हुआ था। यही कारण है कि जैसे-जैसे परेशानियों का पता चला, वैसे-वैसे सरकार उन परेशानियों को लेकर नयी अधिसूचना जारी करती रही। एक साल में जीएसटी प्रणाली से जुड़ी 100 अधिसूचना जारी की गयीं। यानी औसतन हर तीसरे दिन एक नयी अधिसूचना जारी हुई। इसी तरह जीएसटी एक्ट और जीएसटी नेटवर्क में तालमेल का अभाव बना रहा। इसमें एक क्रेडिट लेजर और एक कैश लेजर बनाने का प्रावधान था, लेकिन छह तरह के कैश लेजर बनाना पड़ा। एक बड़ी परेशानी इनपुट टैक्स क्रेडिट की भी है। यह अभी भी इलेक्ट्रॉनिक नहीं हुआ है। इसके लिए कारोबारियों को बार-बार टैक्स अधिकारियों के पास जाना पड़ता है।

वहीं टैक्स कमिश्नर रह चुके मनोहर श्याम का कहना है कि जीएसटी से जितनी परेशानी हुई है, उससे ज्यादा फायदे हुए हैं। पहले जिन राज्यों में टैक्स की दर कम हुआ करती थी, कारोबारी वहां का एनवॉयस दिखाकर दूसरे राज्यों में अपना माल बेचते थे। यानी राज्यों की बीच भी जमकर माल की तस्करी होती थी, लेकिन अब राज्यों के बीच होने वाली तस्करी पूरी तरह से बंद हो गयी है। इसी तरह विक्रेता का चालान और इनपुट टैक्स क्रेडिट आपस में जुड़ जाने से फर्जी चालान उपर क्रेडिट का दावा करना असंभव हो गया है। जीएसटी के कारण इंस्पेक्टर राज पूरी तरह से बंद हो गया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि 10 लाख रुपये तक के टर्नओवर वाले व्यापारियों को कर मुक्त कर दिया गया है। इससे व्यापार शुरू करना आसान हो गया हो गया है।

टैक्स भी बढ़ा,टैक्सपेयर भी बढ़े

जीएसटी की अच्छी बातों में टैक्स कलेक्शन के साथ ही टैक्स पेयर्स की संख्या में बढ़ोतरी होना भी है। टैक्स कलेक्शन पहले की तुलना में बढ़ गया। जीएसटी से पहले औसतन 81.91 हजार करोड़ रुपये प्रतिमाह का टैक्स कलेक्शन होता था, जो जीएसटी लागू होने के बाद औसतन 91.38 हजार करोड़ रुपये प्रतिमाह हो गया है। इसी तरह 2016-17 में कर देने वाले कुल कारोबारियों की संख्या लगभग 64 लाख थी, जो 2017-18 में बढ़कर 70 लाख हो गयी। इसी तरह प्रति व्यापारी हर महीने का औसत कर भुगतान 2016-17 में 1,12,370 रुपये था, जो 2017-18 में बढ़कर 1,17,143 रुपये हो गया है। स्पष्ट रूप से प्रति व्यापारी औसत टैक्स कलेक्शन में मासिक 4,733 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इन आंकड़ों से उत्साहित केंद्र सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के हर महीने में न्यूनतम एक लाख करोड़ रुपये की जीएसटी वसूली का लक्ष्य तय किया है, ताकि पूरे साल में  बारह लाख करोड़ रुपये की जीएसटी वसूली जा सके।

टैक्स कंसल्टेंट संतोष केसरी का कहना है कि जीएसटी को अभी और सरल बनाने की जरूरत है। सरकार को रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म जैसी लंबित व्यवस्थाओं पर भी आगे बढ़ने की तैयारी करनी होगी। लेकिन ऐसा करते समय इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि जीएसटी या ई-वे बिल अपनाते समय जैसी समस्याएं आयी थीं, वैसी समस्याओं का सामना न करना पड़े। जीएसटी के एक साल पूरा होने के बाद इस बात की भी स्टडी होनी चाहिए कि टैक्स चोरी के तौर-तरीकों पर कितनी लगाम लगी। अगर टैक्स चोरी अभी भी हो रही है, तो उन पर प्रभावी लगाम लगाने पर विचार करना जरूरी है। इसके साथ ही रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया को भी आसान बनाना जरूरी है। जीएसटी का एक साल पूरा होकर अगला साल शुरू हो गया है। किसी भी नयी प्रणाली के लिए दो साल का समय पर्याप्त होता है। इसलिए सरकार को ध्यान देना होगा कि जल्द ही इस प्रणाली को पूरी तरह दुरुस्त कर दिया जाये और इसके लिए कानून संबंधी जितने भी बदलाव होने हैं, उन्हें शीघ्र निपटा लिया जाये। एक बड़ी बात जीएसटी स्लैब को कम करने की भी है। कई चीजें जीएसटी के स्लैब में लायी जानी बाकी हैं। ऐसी चीजों में पेट्रोलियम उत्पादों और शराब की चर्चा सबसे पहले होती है। इस बारे में कोई भी भ्रम की स्थिति नहीं रहनी चाहिए। क्योंकि कोई भी भ्रम अंतत: सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।

शेयर करें
पिछला लेखसाइकिल पर कलेक्टर साहब
अगला लेखअभिसार शर्मा का झूठ
विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here