भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की साठ फीसदी आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। देश की जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा होने के कारण हर राजनीतिक दल का सबसे अधिक ध्यान किसानों को लुभाने पर ही रहता है। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आजादी के बाद से ही कृषि के क्षेत्र में इतना सुधार नहीं हो सका, जिससे कि देश के किसान आत्मनिर्भर हो सकें। आलम तो यह है कि पिछले 10 सालों में 40 हजार से अधिक किसानों ने खेती में हुए नुकसान के बाद हताशा में मौत को गले लगा लिया। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से प्राय: किसानों की खुदकुशी की खबरें आती रहती हैं।

सरकार ने किसानों से किये अपने वादे को पूरा कर दिया है। खरीफ फसलों की एमएसपी लागत की डेढ़गुनी कर दी गयी है। लेकिन किसानों के लिए अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

किसानों की दशा सुधारने के इरादे से ही केंद्र सरकार ने अपने बजट में किसानों को उनकी लागत का न्यूनतम डेढ़ गुना कीमत दिलाने का वादा किया था। इसी वादे के मुताबिक केंद्र सरकार ने खरीफ की फसलों के बढ़े हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की है। खरीफ की सभी 14 फसलों की लागत में कम से कम 50 फीसदी लाभ जोड़कर एमएसपी का ऐलान किया गया है। सरकार ने ये वादा अपने बजट में किया था, इसलिए लंबे समय से इस बात का इंतजार किया जा रहा था कि कब सरकार बढ़े हुए एमएसपी की घोषणा करेगी। यह इंतजार इसलिए भी था, क्योंकि विपक्षी दलों के नकारात्मक प्रचार की वजह से किसी को इस बात पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि सरकार इस वादे को पूरा करेगी। लेकिन सरकार ने जो वादा किया था, उसका सही समय पर ऐलान भी किया।

एमएसपी में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

आजादी के बाद से ही समय-समय पर फसलों के एमएसपी में बढ़ोतरी की घोषणा की जाती रही है। कृषि विशेषज्ञ रामलुभावन गुप्ता के मुताबिक कुछ साल पहले तक एमएसपी में होने वाली मामूली बढ़ोतरी को भी सरकार की लोकलुभावन घोषणा के तौर पर देखा जाता था। ऐसे में उपज की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी तय होना, एक बहुत बड़ी बात कही जा सकती है। खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान के एमएसपी में पिछले साल के मुकाबले 200 रुपये प्रति क्विंटल की रिकॉर्ड बढ़ोतरी की गयी है। इसी तरह बाजरा के समर्थन मूल्य में प्रति क्विंटल 525 रुपये की बढ़ोतरी की गयी है। पिछले सीजन में बाजरे का एमएसपी 1425 रुपये था, जो अब बढ़कर 1950 रुपए हो गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में प्रतिशत के लिहाज से सबसे बड़ी बढ़ोतरी रागी में हुई है। रागी का एमएसपी पिछले सीजन में 1900 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अब 52.5 फीसदी बढ़कर 2897 रुपये हो गया है।

गुप्ता कहते हैं कि कृषि क्षेत्र की हालत देश में हमेशा ही एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। पिछले 10 सालों से किसानों की हालत ने पूरे देश को झकझोरा है। खासकर एनडीए की सरकार आने के बाद राजनीतिक वजहों से भी किसानों के मुद्दे को काफी हवा दी गयी है। ऐसे में समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी करने का यह फैसला किसानों को काफी राहत पहुंचाने वाला हो सकता है।

हालांकि यह भी तय है कि विपक्ष इस समर्थन मूल्य से भी संतुष्ट नहीं होने वाला है। कांग्रेस ने तो इसकी खुलकर आलोचना की है और इसे किसानों की जरूरत के हिसाब से अपर्याप्त बताया है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी सरकार ने किसी भी उपज की लागत मूल्य तय करने के बाद उसमें 50 फीसदी की बढ़ोतरी कर एमएसपी की घोषणा की है।

फॉर्मूले से निकली लागत

केंद्र सरकार द्वारा जारी बयान में बताया गया है कि फसलों की लागत का आकलन कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने किया है। इसी आकलन के आधार पर सरकार ने एमएसपी की गणना की है। इस साल फसलों की लागत की गणना के लिए ए-2 प्लस एफएल का फॉर्मूला अपनाया गया है। इस फॉर्मूले के तहत कृषि उत्पादन के सभी खर्चों के साथ किसान परिवार के श्रम का मूल्य भी जोड़ा जाता है। इस तरह खेती के काम में की गयी मजदूरी, बैलों तथा कृषि उपकरणों पर आने वाला खर्च, पट्टे पर ली गयी जमीन का किराया, सिंचाई खर्च, खाद, बीज और परिवार के प्रति व्यक्ति के श्रम को भी इस में जोड़ा गया है। इस आधार पर जो राशि निकली है, उसमें सरकार ने न्यूनतम 50 फीसदी का लाभ जोड़कर एमएसपी का ऐलान किया है। चूंकि इसमें खेती के सभी खर्चों और श्रम के मूल्य का भी आकलन किया गया है, इसलिए इस फैसले पर विवाद की गुंजाइश काफी कम है।

कॉमोडिटी मार्केट एक्सपर्ट श्यामलाल बजाज के मुताबिक विपक्षी नेता और किसानों के मुद्दे को लेकर अपनी राजनीति करने वाले लोग अपनी राजनीतिक मजबूरियों की वजह से एमएसपी पर आपत्ति जता रहे हैं। साथ ही उपज की लागत तय करने के फॉर्मूले पर भी सवाल उठाया जा रहा है, लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब किसानों को भी लग सकता है कि खेती करना घाटे का सौदा नहीं है। अभी तक बार-बार कहा जा रहा था कि खेती से किसानों को अपनी लागत की राशि भी नहीं मिल पाती है। इसी कारण लोग खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसके साथ ही किसानों की खुदकुशी के मामले को भी इससे जोड़ा जाता रहा था। लेकिन, अब लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य मिलने पर किसान अपना जीवन बेहतर बनाने की दिशा में सोच सकेंगे।

सुधार अभी बाकी है

बजाज कहते हैं कि पिछले चार साल के कार्यकाल में इस सरकार ने खेती की लागत घटाने से लेकर पैदावार बढ़ाने तक कई उपाय किये थे। लेकिन, फसल की कीमत को लेकर सरकार को लगातार कठघरे में खड़ा किया जाता रहा। अब एमएसपी में ऐतिहासिक बढ़ोतरी करके सरकार ने इस मुद्दे को भी साध लिया है। इस क्रम में यह भी याद रखना चाहिए कि सिर्फ फसलों की खरीद लाभकारी मूल्य पर करने से ही खेती की दशा में सुधार होने वाला नहीं है। खेती को आकर्षक पेशा बनाने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है।

सरकार को सबसे पहले इस विषय पर ध्यान देना होगा कि किसान आधुनिक ढंग से खेती करें। सबसे बड़ी बात तो ये है कि उपज के भंडारण और उनके परिवहन पर भी ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है। अभी खाद्यान्न के साथ-साथ फलों और सब्जियों के भंडारण करने तथा उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। यह भी एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से कई बार किसानों की फसल बिकने के पहले ही खराब हो जाती है और उन्हें नुकसान का सामना करना पड़ता है।

कैसे निकलती है फसल की लागत

० फसल की लागत तय करने के तीन फॉर्मूले हैं। इन्हें ए-2, ए2 + एफएल तथा सी-2 के नाम से जाना जाता है।

० ए-2 फॉर्मूले में किसानों की ओर से किये गये हर तरह के भुगतान (चाहे वो नकद हो या फिर किसी वस्तु के रूप में हो) के साथ बीज, कीटनाशक, ईंधन, खाद, सिंचाई का खर्च, मजदूरों की मजदूरी को जोड़कर लागत का निर्धारण किया जाता है।

० ए2 + एफएल फॉर्मूले में ए-2 फॉर्मूले की लागत में परिवार के सदस्यों द्वारा कृषि

कार्य में की गई मेहनत को भी उनके श्रम मूल्य के रूप में जोड़ा जाता है, जिससे कि मजदूरों से इतर श्रम मूल्य की भी कुल लागत में गणना हो सके।

० सी-2 फॉर्मूले में जमीन की कीमत के साथ ही कृषि कार्य में लगी स्थाई पूंजी पर लगने वाले ब्याज की भी गणना की जाती है।

० किसानों के लिहाज से सी-2 फॉर्मूले को सबसे बेहतर माना जाता है। अभी जो भी किसान संगठन एमएसपी का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि लागत की गणना सी-2 फॉर्मूले के तहत की जानी चाहिए। लेकिन इसमें व्यावहारिक दिक्कत जमीन के कीमत को लेकर है। देश के हर जिले में जमीन की कीमत अलग-अलग होती है। ऐसे में सी-2 फॉर्मूले का उपयोग कर लागत की गणना करने से हर जिले में उपज की लागत अलग अलग होगी और ऐसा होने पर सरकार को हर जिले के लिए अलग-अलग एमएसपी का ऐलान करना पड़ेगा। लेकिन ऐसा करना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है।

एमएसपी पर ध्यान देना जरूरी

कॉमोडिटी एक्सपर्ट वीरेंद्र सकलेचा एमएसपी में हुई बढ़ोतरी को एक सकारात्मक कदम मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि केंद्र सरकार को राज्य सरकारों से भी ये सुनिश्चित करने का आग्रह करना चाहिए कि किसानों की उपज एमएसपी पर ही बिके तथा फसलों की बिक्री का पैसा भी किसानों को तुरंत मिल सके। इसी तरह कृषि उपज की खरीद-बिक्री की समुचित बुनियादी व्यवस्था का निर्माण करना भी जरूरी है। हालांकि, बजट में केंद्र सरकार ने पूरे देश में छोटी मंडियों की स्थापना करने का ऐलान किया है और यह काम तत्परता के साथ पूरे देश में किया जाना जरूरी है। ऐसा होने पर ही साल 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा और किसानों की जिंदगी में खुशहाली लायी जा सकेगी।

एक बड़ा मुद्दा खरीफ फसलों के एमएसपी के कारण होने वाली महंगाई का भी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का फैसला महंगाई दर पर भी असर डालेगा। ऐसे में सरकार को इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा, जिससे कि देश में महंगाई न बढ़े। इस दिशा में कोई भी चूक महंगाई दर को बढ़ा सकती है, जिससे कि किसानों का होने वाला फायदा अर्थहीन हो जायेगा। साथ ही आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

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विनय के पाठक
रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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