केंद्र सरकार ने खरीफ की 14 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ा दिया है। न्यूनतम वृद्धि 3.7 फीसद और अधिकतम 52.5 फीसद तक की गई है। धान पर तो एक साथ 200 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। सरकार कोई कदम उठाये और विपक्ष विरोध न करे, ऐसा प्राय: नहीं होता। लिहाजा मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का विरोध- राग इस बार भी जारी है। कांग्रेस पार्टी एमएसपी में वृद्धि को ऊंट के मुंह में जीरा बता रही है। इस पर चर्चा करते समय आम पाठकों को एमएसपी के सामान्य मकसद बताना जरूरी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह निर्धारित कीमत है, जिस पर सरकार किसानों से उनकी उपज खरीदा करती है। काफी पहले 1965 में किसानों को बिचौलिओं से बचाने और देश में गेहूं और चावल जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के मकसद से यह कदम उठाया गया था। बाद में समय-समय पर इस सूची में और फसलें भी जुड़ती गईं।  इस उपाय से किसानों को लाभ पहुंचता रहा है। ऐसा भी होता है कि देश में इन अनाज का उत्पादन बंपर स्तर पर हो और इनकी कीमत में भारी गिरावट आ जाय। फसलों के दाम में भारी गिरावट की मार से किसानों को बचाने के काम में तब एमएसपी ही कारगर होती है।

आम तौर पर भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई देशभर में अनाज की खरीद और वितरण करता है। एफसीआई के जरिए सरकार ने पिछले साल कुछ सराहनीय काम किए थे। जब दालों के दाम बेतहाशा बढ़ रहे थे, आकर्षक एमएसपी के जरिए ही सरकार ने गत वर्ष  20 लाख टन दालों का बफर स्टॉक कर लिया। इससे दाल के दाम नियंत्रित करने में मदद मिली। साफ है कि एमएसपी दो स्तर पर कारगर सिद्ध होती है। एक तो किसानों को फसल की लागत के अनुरूप बेहतर मूल्य मिल जाता है। दूसरे बफर स्टॉक के चलते आम उपभोक्ताओं को भी महंगाई से राहत मिलती है। स्वाभाविक है कि एमएसपी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का कारगर कदम बन गया है। इसके निर्धारण में खास सावधानी बरतने की जरूरत भी हुआ करती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि इस बार 14 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने से सरकार के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर असर पड़ने वाला नहीं है। बजट में फूड सब्सिडी के लिए पहले से ही पर्याप्त प्रावधान हैं। इसके चलते सरकार राजकोषीय घाटे को बढ़ाये बिना एमएसपी पर इस अतिरिक्त खर्च का वहन कर लेगी।

लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद जनता के सवालों पर हुआ करते हैं और होने भी चाहिए। फिर भी ध्यान रखने की बात है कि जनकल्याण कोई एक बार अथवा अंतिम बार जैसा मसला नहीं हुआ करता। कांग्रेस पार्टी कहती है कि पिछले चार साल में देश के किसान और अधिक बदहाल हुए हैं। सरकार ने वादा किया था कि वह किसानों को लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देगी। दूसरी ओर सरकार दावा कर रही है कि एमएसपी में बढ़ोतरी से फसल की लागत के डेढ़ गुना कीमत देने का वादा पूरा हुआ है। दोनों के दावों के बीच धान की कीमत पर बात करें। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के मुताबिक धान की खेती में फिलहाल लागत 1,166 रुपये प्रति क्विंटल है। अब सामान्य किस्म के धान का एमएसपी प्रति क्विंटल 1550 से 1750 रुपये तय किया गया है। ऐसे में यह बढ़ोतरी लागत के हिसाब से 64 फीसद तक की दिखती है। अन्य फसलों पर एमएसपी कम-ज्यादा हो सकती है। फिर भी कांग्रेस को देखना होगा कि कृषि मूल्य पर जिस स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को वह पूरी तरह लागू करने की मांग कर रही है, 2006 में आई रिपोर्ट पर उसके नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार ने अपने कार्यकाल में 2014 तक कितना अमल किया था। उसके मुकाबले धान ही सही, नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे लागत के डेढ़ गुने से भी अधिक कर दिखाया है। उम्मीद है कि रबी फसल का समय आने पर गेहूं के मामले में भी ऐसा हो सकेगा। हां, सरकार को कुछ अन्य बातों पर भी विचार करना चाहिए। अभी तक सरकारी एजेंसियां फसल उत्पादन का महज 33 फीसद तक ही खरीद पाती हैं। कोशिश करनी चाहिए कि मंडी में आने वाले सारे कृषि उपज को समर्थन मूल्य मिल सके। फिलहाल खरीफ फसलों पर घोषित एमएसपी का स्वागत किया जाना चाहिए।

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